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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह110 / 156

साखी हिंडोलणो- 110 (राग मलार)

सरस हिंडोलणो सम्भराथल, झूलै हो साध

कवि: हीरानन्द जी

कवि परिचय — हीरानन्द जी

हीरानन्द जी जन्म संवत् 1750-1800, इनको प्रसिद्ध रचना हींडोलणो प्राप्त हुई है जिसमें हजूरी कवि भक्तों तथा संतों के नाम गिनाये है इसलिये इस रचना का महत्व है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

सरस हिंडोलणो सम्भराथल, झूलै हो साध ।टेर।

दोय शील संयम थंभ रोपे, नांव बेड़े आधार । चार डांडी सरल सुन्दरी, वेद के झणकार । सत्य धीरज बणे मरवो, जड़त प्रेम सवार । सुरत पटड़ी बैठ कर, थे झूलो जम्भ द्वार ।१।

लोहट हांसा भाव पूरे, जिण लियो उर लाय । नौरंगी के भात लाये, संग साल्हिया आय । सिरिया झीमां रूपा मिरिया, पूर्व प्रीत विचार । दोय कंवर आगै धरै, लाछां आये झूलण वार ।२।

भूवा तांतू चली झूलण, नायकी लीवी बुलाय । अजब देश वीर ते तहां, झाली पोहती आय । लोचा गवरां अवर मांगू, पालै वचन विचार । उदो अतली हेत सेती, झूले जम्भ द्वार ।३।

राव दूदा टोहा ठकरा, केल्हण वरसंग लेख । लोहा पांगल भींया परच्या, सोवन नगरी देख । रावण गोविंद लक्ष्मण पांडु, मोतिये के भाय । रणधीर अली सैसा साल्हा, सहजे देत झुलाय ।४।

खींया नाथा पूर्व झीमां, राणा प्रीत विचार । कोजा बूढ़ा लूणा सायर, आये पूल्ह पुंवार । धन्नो बिछू सुरगण भंवरा, चेला कुलचंद पियार । पहलाद की परतंग्या कारण, विसन को अवतार ।५।

महाराज दाउद घाटम पूरो, थापन हर खेता । धारू चोखा वैरा प्रीत, हिरदै धरी मंगला रेड़ा । हासम कासम संता सेती, सदा रहे सहाय । तास सैंसो उदो दासा, आयो पांचा को समझाय ।६।

रावल जेतसी सांगा राणा, लूणों मालदे राव । महमद खान मुल्ला सधारी, आये परसे पांव । शाह सिकंदर राव सांतल, शेख सदू जांण । कान्हा तेजा अल्लू चारण, बलि बलि करत बखाण ।७।

हुकम उदो दीन बोल्यो, वील्ह कियो उपदेश । सुजा सुरजन आलम केशव, ज्ञान का उपदेश । चन्दन रायचंद जसो पंचायण, शब्द का आचार । हीरानन्द की अरजी एती, संगत पार उतार ।८।

आनन्द रस से परिपूर्ण हींडोला सम्भराथल पर लगा हुआ है जिससे कोई कोई विरले साधुजन ही हींड रहे है । यह हींडोला किसका बना हुआ है, यह आगे बतला रहे है । शील संयम रूपी दो खंभे रोपे गये है । परमात्मा विष्णु का नाम ही इस बेड़े रूपी झूले का आधार है । झूले की चार डंडियां ही चार वेद रूपी शब्दवाणी है । वेदों की भांति ही स्वर लय की झणकार हो रही है । कहा भी है- 'मोरे सहजे सुन्दर लोतर वाणी' सत्य तथा धीरज रूपी सौम्य सुगन्धमय मरवे के नीचे झूला बांध रखा है । सत्य एवं धीरज की छत्रछाया में झूला झूल रहे है । झूले में अनेकों चित्रकारी की गई है । वह सरल शुद्ध सुन्दर प्रेम भाव को प्रगट कर रही है । सुरति यानि चितवृति के पटड़े पर बैठकर जाम्भेश्वर जी के द्वार सम्भराथल पर झूला अवश्य ही झूलें सभी के लिये ही दरवाजा खुला हुआ है ।१। अब आगे इस हींडोलने में हींडने वाले उन साधु भक्तों का नाम गिनाये गये है । जिन्होनें सम्भराथल आकर समय समय पर झूला झूले है । ये सभी नाम स्पष्ट है हजूरी शिष्य ही नहीं जाम्भोजी के माता-पिता से आरम्भ करके अन्तिम आलम सूजा सुरजन रायचन्द आदि संतों कवियों को भी गिनाया है, कुल नामों की संख्या ८३ गिनाई गई है । इनमें जिन लोगों के नाम आये है उनकी कथा जम्भसार में वर्णित है तथा कुछ भक्त सन्तों का जीवन चरित्र विस्तार से प्राप्त नहीं हुआ है । प्रायः सभी सन्तों एवं भक्तों का नाम यहां एक ही साखी में कवि ने बड़ी ही चतुरता से किया है । यह साखी अपने ढंग की एक ही सम्पूर्ण जाम्भाणी साहित्य में उपलब्ध हुई है । इसलिये इनका अपना महत्व निराला ही है ।