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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह33 / 156

साखी कणां की-33

दीने जागो दीने जागो, ओ गुरु परगट आयो

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

दीने जागो दीने जागो, ओ गुरु परगट आयो ।१।

हे सज्जनों ! अब जग जाओ ! सूर्योदय हो चुका है, अब दिन हो गया है रात्रि का अन्धकार अब नहीं रहा क्योंकि स्वयं विष्णु ही गुरु के रूप में प्रगट हो चुके है ।१।

संभराथलि सतगुरु प्रकाश्यो, चोचक आण फिरायो ।२।

गाफल भूल रहया भूलावे, करणी साध चेतायो ।३।

सम्भराथल पर सतगुरु ने ज्ञान का प्रकाश किया है और यही ज्ञान चारों तरफ फैल चुका है, इस जम्बूद्वीप में मर्यादा बांधी जा रही है किन्तु आप लोग अब तक सो रहे है। गाफिल मूर्ख लोग तो सद्मार्ग को भूल चुके है और दूसरों को भी भुलावे में डालकर धर्म से विमुख कर रहे है। सतगुरु ने आकर कर्त्तव्य कर्म का पाठ पढ़ाकर सचेत किया है। साधु जन तो सावधान हो चुके है ।३।

गाफल थूल अभेद मूरखा, क्यूं परचे परचायो ।४।

शैतान की तो कुबध्या ही खेती है वे लोग तो स्थूलता, मूर्खता, भेदभावपना ही अपना धर्म कर्म मान बैठे है उन्हें कैसौ मार्ग में लाया जा सकता है। ये लोग अपना स्वभाव छोड़ने के लिये तैयार नहीं है ।४।

गुरु न चीन्हो पंथ न पायो, अहलो जलम गुमायो ।५।

इन लोगों ने तो न ही गुरु को ही पहचाना और न ही पंथ को ही अपनाया व्यर्थ में जन्म खो दिया ।५।

करणी हीन कुचील कुबधी, मिनखां रतन गुमायो ।६।

कर्त्तव्य हीन कुचील कुबध करने वाले ऐसे लोग तो इस संसार में आकर हानि को ही प्राप्त हुए है। क्योंकि मानव जन्म रूपी रत्न को इन्होनें खो दिया ।६।

रहे निरंतर नर निरहारी, भल तीर्थ निज बाणी ।७।

यहां सम्भराथल पर सतगुरु आये है निरंतर यहीं पर ही निवास करते है किन्तु निराहारी है। सांसारिक भोग्य वस्तुओं की आवश्यकता उन्हें नहीं है। उनके यहां पर निवास करने से अच्छा तीर्थ बन चुका है। उनकी वाणी भी अपनी निजी अनुभूति है इसलिये निराली ही है ।७।

खुद्यिया तिसना निन्द्रा नाही, न पीवै गोरस अन्न पाणी ।८।

भूख, प्यास, निन्द्रा आदि उन्हें नहीं सताती इसलिये भोजन आदि ग्रहण नहीं करते। वे तो सदा अमृत रस का ही पान करते है ।८।

सुरगा पुर का माघ बतावै, इसड़ा लहो रे बिनाणी ।९।

स्वर्ग तथा वैकुण्ठ जाने का रास्ता बता रहे है। हे प्राणी ! ऐसे सतगुरु की शरण ग्रहण करो। जो जन्म मृत्यु के चक्कर से छुड़ा दे ।९।

सतगुरु निंदे देवल बिंदे, धोके काठ पखाणी ।१०।

कुछ लोग सतगुरु के सिद्धान्त को नहीं अपनाते किन्तु सतगुरु की निंदा करते है और पत्थर आदि की बनी हुई मूर्तियों के आगे जाकर सिर पटकते है। चेतनमय ज्योति, जागती ज्योति को छोड़कर पत्थर पूजा कहां तक उचित है ।१०।

तीरथ न्हावै पिंड छलावै, जोय जोय नीर निवाणी ।११।

तथा अन्य कुछ लोग तीर्थों में जाकर या अपने घरों में ही बैठे हुए धोक लगाते है पूजा करते है। गयादि में जाकर पिण्ड भराते है। मृतक को अन्न जल देते है। ये लोग तो जल की भांति निरंतर नीचे ही गिरते जा रहे है ।११।

सुरगां पुर का माघ न जाणै, भूला भुंवै इवाणी ।१२।

स्वर्ग पूरी का मार्ग तो जानते ही नहीं परन्तु इस लोक में ही भूले हुए भटक रहे है। ऐसे लोगों का जीवन व्यर्थ है। खाली ही रह गये कुछ भी प्राप्त नहीं कर सके ।१२।

अश्वपति गजपति जातां दीठा, कोटां रा सिरदारा ।१३।

इस संसार में अब तक कौन स्थिर रहा है, अनेकों हाथी घोड़ों के मालिक भी अपनी संपति को छोड़कर जाते हुए देखे गये है तथा बड़े-बड़े कोट किलों के मालिक भी चले गये ।१३।

ते राजिन्दर जातां दीठा, चिण चिण बंक दवारा ।१४।

वे राजेन्द्र भी जाते देखे है जिन्होनें अपने रहने के लिये बड़ी बड़ी हवेलियां, किले बनाये थे। सुरक्षा का प्रबन्ध युक्ति से किया था परन्तु उनकी सुरक्षा नहीं हो सकी ।१४।

जांरी आण दुहाई फिरती, छतर सिर छतर धारा ।१५।

जिन राजाओं का संसार में आदेश अन्य राजा लोग माना करते थे उनके भय से लोग डर जाया करते थे, वे सम्राट थे जिनके सिर पर दिव्य छत्र मुकुट रखा जाता था वे भी चले गये ।१५।

धंधो करंता जुवरै मूवां, पड़िया रहया पसारा ।१६।

अनेकों धंधा करके धन जोड़ा जाता था किन्तु काल ने उनको नहीं छोड़ा। उनका किया हुआ पसारा यहीं रह गया और साथ लेकर कुछ भी नहीं गये ।१६।

सुर तेतीसूं कर मिलावो, म्हारे उमाहो गुरु अपारा ।१७।

वीनतड़ी ऊदो बोले, सेवक विसन तुम्हारा ।१८।

हे देव ! हमें तो तेतीस करोड़ देवताओं से मिला दो। हमें तो उनसे मिलने की बड़ी उम्मीद एवं उमंग है। ऊदोजी विनती करते हुए कहते है हे विष्णु ! मैं तो आपका ही सेवक हूं। मुझे अन्य किसी से कोई आशा नहीं है ।१८।