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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह99 / 156

साखी राग धनाश्री-99

पंनरासै अवतार लियो, गुरु आठम सोम अठोतरै

कवि: सुरजनदास जी पूनियां

कवि परिचय — सुरजनदास जी पूनियां

सुरजनदास जी पुनिया का जन्म वि॰ सं॰ 1640 है तथा परलोक गमन संवत् 1748 में हुआ था। ये भींयासर गांव के पुनियां गोत्र से थे। बाल्यावस्था में ही वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के शिष्य केशोजी एवं सुरजनजी ये दोनों प्रतिष्ठ कवि थे। ये दोनों ही अपने गुरु के समान महान कवि और समाज सुधारक थे। सुरजनजी को वील्होजी ने रामड़ास का महंत बनाया था। वहां पर गांव से बाहर एक तालाब पर झूंपड़ी बनाकर रहते थे। काव्य कविता की साधना और योग साधना में लीन रहते थे। पौराणिक कथाओं के महान पण्डित तथा कवि थे। जाम्भोलाव महात्म्य सुरजन जी ने ही उजागर किया था। अपने जीवन काल में सुरजन जी ने अनेक रचनाऐं की थी जिनमें आख्यान कथाऐं, हरजस, कवित, फुटकर छन्द, राम रासौ तथा साखियां प्रसिद्ध है। अन्य जाम्भाणी कवियों की अपेक्षा सुरजनजी की भाषा अधिक कलिष्ट है तथा काव्य कला से युक्त भी है यहां पर सुरजनजी द्वारा रचित नौ साखियों का भावार्थ किया जा रहा है। जम्भसार में सुरजनजी की कथा विस्तार से साहबराम जी ने लिखी है।

पंनरासै अवतार लियो, गुरु आठम सोम अठोतरै । छापर नीबी दूण पुरै, गुरु आसा तिसनां न करै । ना करै आसा नींद तिसनां, जगत पति जीवां धणी । मोह माया नहीं छाया, निरभय वाणी निरंजणी । सधर गुरु सूं सुरग लाभै, कहयो गुरु को जै करै । पंनरासै अवतार लियो, गुरु आठम सोम अठोतरै ।१।

गुरु देव ने वि. सं. १५०८ भादव वदि अष्टमी वार सोमवार के दिन अवतार लिया था। छापर नीबी दूणपुर के जंगलों में हरि ने लोहटजी को दर्शन दिया था। लोहट जी की आशा पूर्ण करने के लिये हरि ने संत के रूप में अवतार धारण करने का वचन दिया था। जगत पति जीवों के स्वामी का दर्शन हो जानें से सम्पूर्ण आसाऐं निवृत हो जाती है। जिनकी निर्भय प्रदान करने वाली वाणी श्रवण करने से मोह माया की छाया लेश मात्र भी नहीं रहती। धैर्यवान गुरु की शरण ग्रहण करने से स्वर्ग सुखों की प्राप्ति हो जाती है। ऐसे परम गुरु ने पन्द्रह सौ आठ में अवतार धारण किया ।१।

काल बंयालो कहत सही, गुरु अन्न दे जीव उबारिया । कातिक बदि अरू कलश थाप्यो, जुग-जुग सतगुरु तारियां । जुग-जुग सतगुरु तरण तारण, धरम धर्यो कलयुगे । सुरताण राण बखाण सुरनर, परच गुरु के पायें लगे । अंधियार घर मां सूर उगो, तिन तिथि तिमर घट्यो । कातिक बदि हरि कलश थाप्यो, पंथ बंयाले प्रगट्यो ।२।

संवत् १५४२ में मरूभूमि में भीषण अकाल पड़ा था। उस भयंकर परिस्थिति में गुरु ने अन्न देकर जीवों को बचाया था। कार्तिक वदि अष्टमी के दिन कलश स्थापना की थी। उसी दिन पाहल पिलाकर युगों-युगों तक जीवों के उद्धार का मार्ग खोल दिया था। युगों-युगों तक गुरु के बताये हुए मार्ग पर चलेंगे तो कलयुग में धर्म की स्थापना हो सकेगी। देव दानव मानव योगी फकीर किसान आदि सभी गुरु के द्वारा धर्म धारण करके चरणों में शीश झुकाया। इस प्रकार से अंधियार घर में सूर्य उदय हो गया। उन पंथ स्थापना की तिथियों में अंधकार की निवृति हुई। कार्तिक वदि अष्टमी को कलश स्थापन किया और १५४२ में बिश्नोई पंथ प्रगट हुआ ।२।

जप तप क्रिया जुगत मिलिया, म्हानें पुरे गुरु परचाविया । छमां दया सत शील सही, कुपह तज सुपह आणियां । कुपह तज हरि सुपह आण्या, ज्ञान केवल पावियो । पहलाद जी के वचन कारण, किसन कलजुग आवियो । सैतान भूत प्रेत परि हरो, भरम भागो भावियो । जप तप क्रिया जुगत मिलिया, म्हानें पुरे गुरु परचावियो ।३।

जप तप क्रिया तथा युक्ति की प्राप्ति हुई। हमारे पूर्ण गुरु ने हमें ज्ञान दिया। क्षमा दया सत्य शील धारण करके कुमार्ग को त्याग दिया तथा सुमार्ग के अनुयायी बने। कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति से ही यह सुमार्ग संभव हो सका है। प्रहलाद जी के वचनों को पूरा करने के लिये स्वयं कृष्ण ही कलयुग में आये। शैतान भूत प्रेत आदि की पूजा त्याग करके भ्रम की निवृति की। गुरुदेव के आने से उक्त बिमारियां स्वतः ही मिट गई। जप तप क्रिया युक्ति की प्राप्ति हुई। हमारे पूरे गुरु ने हमें परचा दिया है ।३।

महर गुरु की मुक्ति हुवै, अजर जरे जीवत मरे । काठ संगीणी लोहा तिरै, साध संगत सेवक तिरै । साध संगति भगती हरि की, परम तत दुतर तिरै । सबल सिंघ के अजा सरणै, गुरु शरणां गति उधरै । आधीन होय कर दीन बोले, कहयो गुरु को कीजिये । सुरजन जन की विनती, मोहि मुक्ति को मार्ग दीजिये ।४।

यदि गुरु की अपार कृपा हो जावे तो मुक्ति की प्राप्ति संभव है। अजर काम क्रोधादि को जला दें तथा अहंकार की निवृति करें। काष्ठ के संग लोहा भी जल से पार उतर जाता है उसी प्रकार से साधु की संगति से जीव भी संसार सागर से पार उतर जायेगा। साधु की संगति तथा हरि की भक्ति ये दोनों ही तत्व को प्राप्त करवाने वाली तथा संसार सागर से पार उतारने वाली है। सबल सिंह के बकरी भी जब शरण में आ जाती है तो सिंह उसकी रक्षा करता है न कि अपना भोजन बनाता तो फिर मानव यदि ईश्वर की शरण ग्रहण करे तो आश्चर्य ही क्या है। परमात्मा के अधीन होकर दीन भाव से प्रार्थना करें तथा गुरु के कथनानुसार जीवन यापन करें। सुरजनजी विनती करते हुए कहते है कि हे प्रभु ! आप मुझे युक्ति मुक्ति का मार्ग दे अन्य मुझे कुछ भी नहीं चाहिये ।४।