कवि परिचय — सुरजनदास जी पूनियां
सुरजनदास जी पुनिया का जन्म वि॰ सं॰ 1640 है तथा परलोक गमन संवत् 1748 में हुआ था। ये भींयासर गांव के पुनियां गोत्र से थे। बाल्यावस्था में ही वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के शिष्य केशोजी एवं सुरजनजी ये दोनों प्रतिष्ठ कवि थे। ये दोनों ही अपने गुरु के समान महान कवि और समाज सुधारक थे। सुरजनजी को वील्होजी ने रामड़ास का महंत बनाया था। वहां पर गांव से बाहर एक तालाब पर झूंपड़ी बनाकर रहते थे। काव्य कविता की साधना और योग साधना में लीन रहते थे। पौराणिक कथाओं के महान पण्डित तथा कवि थे। जाम्भोलाव महात्म्य सुरजन जी ने ही उजागर किया था। अपने जीवन काल में सुरजन जी ने अनेक रचनाऐं की थी जिनमें आख्यान कथाऐं, हरजस, कवित, फुटकर छन्द, राम रासौ तथा साखियां प्रसिद्ध है। अन्य जाम्भाणी कवियों की अपेक्षा सुरजनजी की भाषा अधिक कलिष्ट है तथा काव्य कला से युक्त भी है यहां पर सुरजनजी द्वारा रचित नौ साखियों का भावार्थ किया जा रहा है। जम्भसार में सुरजनजी की कथा विस्तार से साहबराम जी ने लिखी है।
बाबो मिलियो त्रिभुवण तार, जोति विराजे निज थले । आवियो गुरु आप अलेख, साच सबद जग सांभले । सबद साचा सांभल्या, परतीत आई मोमणां । पंथ को झणकार बाजै, पाप छूटै अति घणां । आण भरम कुथान पूजा, तजै सकल विकार । आश गुरु की कीजिये, मिलियो त्रिभुवण तार । जोति विराजे निज थले ।१।
तीनों लोकों को तारने वाले भगवान विष्णु ही जाम्भेश्वरजी के रूप में आये है। जो ज्योति स्वरूप सम्भराथल पर विराजमान हुए है अवश्य ही भेंट कीजिये। गुरु स्वयं अलख निरंजन है वही यहां पर आये है। सत्य शब्दों का उच्चारण करते है। हे जगत के लोगों ! सावधान हो जाओ ! सत्य शब्द श्रवण करने से भक्तों को विश्वास हुआ है, धर्म के प्रति प्रेम जगा है। भूत प्रेतादि की पूजा करना तथा भ्रम को छोड़कर लोग सतपंथ के अनुयायी बने है। अन्य सभी कल्पित देवताओं की आसा छोड़कर एक गुरु की ही आस कीजिये। आप त्रिभुवन के स्वामी से मिलाप कर सकोगे। जो ज्योति स्वरूप निज थल पर अब भी विराजमान है ।१।
बरतियो धनि धनि कार, धन्य मुहूरत धन्य घड़ी । झीणां सबद झणंकार, जोजन वाणी सुहावणी । जोजन वाणी सुहावणी, जे सकल धर्म निवास । हंस हींयाली परगटियो, अधिक कीजिये आस । काम क्रोध विकार परहर, पंथ चाल्यो सार । धर्म चोथे जुग सांभल्यो, बरत्यो धिन-धिन कार । धिन मुहूरत धिन घड़ी ।२।
चारों ओर से धन्य की ध्वनि गुजायमान हो रही है। धन्य है उस मुहूर्त एवं उस घड़ी नक्षत्र को जिसमें स्वयं परमेश्वर ने ही अवतार धारण किया है। सूक्ष्म तथा यथार्थ ज्ञान कराने वाले शब्दों की ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। जब सभी मिलकर समवेत स्वर में गुरु वाणी का उच्चारण करते है तो सभी धर्म वहीं पर आकर निवास करते है। बोलने वाले तथा सुनने वाले कृत्य कृत्य हो जाते है। हंस ही मानों यहां मानसरोवर को छोड़कर आ गये है। ऐसे भक्त लोग एकत्रित होकर बैठे दिखाई देते है। सांसारिक आशा छोड़ करके गुरुदेव से ही सम्बन्ध स्थापित कीजिये। काम क्रोध आदि विकारों को त्याग करके सार रूप सद्पंथ पर चलें। यह कलयुग में धर्म की संभाल हुई है। चारों ओर धन्य धन्य कार हो रहा है। उस समय को भी धन्य है जिसमें गुरु देव प्रगट हुए ।२।
कथियो केवल ज्ञान, सुकरत कर पहुंचा निज घरां । सतगुरु कियो मिलाप, पांच सात नव करोड़ बारां । पांच सात नव करोड़ बारां, मेली सी सुर लोय । बात साचे श्याम की थे, जपो एक मन होय । होम जाप समाध पूजा, धरो संभू को ध्यान । ब्रह्म किरिया दाखवी, गुरु कथियो केवल ज्ञान । सुकरत कर पहुंता निज घरां ।३।
गुरु ने कैवल्य ज्ञान का ही कथन किया है उस ज्ञान के प्रकाश में हम सुकृत करके अपने सच्चे घर को वापिस पहुंच जायेंगे। सतगुरु हमें पांच सात एवं बारह करोड़ से मिलान करा देंगे। चार युगों में तेतीस करोड़ पार पहुंच गये है हमें भी वहीं पर जाना है। वहां पर सुर लोक में देवताओं से मिलान होगा। यह वार्ता सच्चे श्याम सतगुरु की है इसलिये विश्वास करने योग्य है। हे जनों ! आप लोग विष्णु का जप एक मन होकर करें। नित्य प्रति हवन विष्णु का जप गुरु देव की बताई हुई समाधी का ज्ञान प्राप्त करें। समाधी तक पहुंचने का प्रयास करें। ब्रह्म ने जो क्रिया बतायी है वह कैवल्य ज्ञान है जो समाधी में पहुंचा देता है। उसी ज्ञान के प्रकाश में सुक्रत करते हुए अपने सच्चे घर को अवश्य ही पहुंचे ।३।
अवर न दूजो कोय, इण गुरु तणों पटंतरे । धरियो भेख अनेक, सकल दया सतगुरु करे । दया सतगुरु दाखवै, सहज शील संतोष । आस गुरु की कीजिये, जो देवे तुठे मोख । बलि बलि विसन बखाणिये, तरण तारण सोय । श्याम साचो प्रगट्यो, और न दूजो कोय । इण गुरु तणै पटंतरै ।४।
गुरु देव जाम्भेश्वरजी जैसे अन्य गुरु संसार में मिलना असंभव है जो संसार सागर से पार उतार दे। भेष धारण करने वाले तो अनेक होंगे परन्तु दयालु सतगुरु इनके जैसे असंभव है। स्वयं दयालु होते हुए अन्य लोगों को भी दया का भाव सिखाते है तथा सहज ही में शील व्रतधारी तथा संतोषी होते हुए अन्य लोगों को भी सिखाते है। आसा केवल एक गुरु की ही कीजिये। जब वे संतुष्ट हो जायेंगे तो मुक्ति प्रदान करेंगे। बार-बार विष्णु का नाम स्मरण कीर्तन करें, वही तारने वाले देव है। हमारे गुरुदेव शिरोमणि है ।४।
प्रगट्यो कृष्ण मुरार, वैणे विसन बखाणिये । करसी गुरु पूर्ण वाच, सबद श्याम पिछाणिये । सबदे श्याम पिछाणिये नै, जे सुर मेलण काज । सुरजन जन की वीणती, सदा जी राखो लाज । साध संगति भगती हरि की, सुपह सिरजण हार । सु गुरु जीवां तारसी, प्रगट्यो किसन मुरार ।५।
स्वयं विष्णु भगवान प्रगट हुए है, अपने वचनों द्वारा विष्णु का ही भजन करना बतला रहे है। गुरु ने बारह करोड़ प्राणियों को उद्धार का वचन दिया था वह अवश्य ही पूर्ण करेंगे। शब्द से ही श्याम मुरारी की पहचान हो रही है। शब्दों में ही बताया है कि मैं आप लोगों को देवताओं से मिलान करवाने के लिये आया हूं। सुरजन जी विनती करते हुए कहते है कि हे देव ! सदा ही हमारी लज्जा रखो। साधु पुरूषों की संगति हरि की भक्ति तथा सुमार्ग पर चलना यही जीवन का तथा धर्म का सार है। यह बताने के लिये सतगुरु का आगमन हुआ है इन्हीं सभी कारणों से सतगुरु अवश्य ही हमें पार उतार देंगे। क्योंकि स्वयं कृष्ण मुरारी ही प्रगट हुए है ।५।