कवि परिचय — परमानन्द जी वणियाल
जन्म वि. सं. 1750-1845 के मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के ही रहने वाले बणियाल गोत्र के थे। परमानन्दजी ने अपने से पूर्व प्राप्त साहित्य का संग्रह किया था वह अब भी सर्वमान्य प्राचीन "परमानन्द जी का पोथा ग्रन्थ ज्ञान" उपलब्ध है। जिसमें सम्पूर्ण जाम्भाणी साहित्य का संग्रह है। परमानन्दजी स्वयं भी कवि थे। इन्होनें अनेक नीति परक दोहे छन्द एवं साखियों की रचना की थी। परमानन्दजी द्वारा रचित चार साखियों का यहां पर भावार्थ दिया जा रहा है।
बाबो आपै उपन्ना आप, मछ संखासुर मारियो। कच्छ रूपी कीचक, वराह मुरदत सिंघारियो। वराह मुरदत सिंघारियो नै, नरसिंघ हिरणांक। बावन बलि परसराम, अरजन राम लिछमण लंक। कनड़ कंस बुद्ध गय सुर, जपायो विष्णु जाप। असुर उथप्या सुर थप्या, बाबो आपे उपन्ना आप। मछ संखासुर मारियो ।१।
बाबो श्री जाम्भोजी अपने आप ही प्रगट हुए है। उनके कोई माता-पिता आदि नहीं है। वैसे कहने को तो लोहट एवं हांसा पिता माता अवश्य ही है। जिन्होनें पूर्व में भी ऐसे ही अवतार लिये थे। उन अवतारों में मच्छ रूप धारण करके शंखासुर को मारा था। कछुवे का रूप धारण करके कीचक को मारा था। वाराह रूप धारण करके हीरणाक्ष तथा मुर दैत्य को मारा था। बावन अवतार लेकर बलि को परास्त किया तथा परशुराम होकर सहस्रार्जुन आदि क्षत्रियों को मारा था। राम लक्ष्मण होकर रावणादि राक्षसों को मारा था। कृष्ण रूप होकर कंस को मारा था। बुद्ध रूप में आकर गया जी में रहकर असुरता का विनाश किया था। इस प्रकार से असुरों का विनाश किया और देवताओं की स्थापना की थी। वही बाबो यहां पर अवतार लेकर आये है ।१।
पहलाद कहयो परगट, देव विसनु वाचा दई। तेता हरिचंद साथि, सात करोड़ सिधा सही। सात करोड़ सीधा सही नै, नवै दहूटल राय। पांच सात नव तिहूं जुगै, हुवो विसनु सहाय। लालच लोभ चोरी ठगाई, कलि जुगै कूड़ कपट। करोड़ बारां तारणै, पहलाद कहयौ देव परगट। देव विसनु वाचा दई ।२।
प्रहलाद ने भगवान नृसिंह से वचन लिया था उन्हीं वचनों को पूरा करने के लिये त्रेता में हरिश्चन्द्र के साथ सात करोड़ का उद्धार किया। द्वापर में नौ करोड़ युधिष्ठिर के साथ पार पहुंच गये। इस कलयुग में लालच लोभ चोरी ठगाई कूड़ कपट आदि बहुत ही फैल चुका था। ऐसी दशा में बारह करोड़ का उद्धार करने के लिये यहां पर देवजी प्रगट हुए है क्योंकि प्रहलाद को वचन दिया हुआ था ।२।
कथ सुणी करतार, भगता पति बूधर भणी। आप लियो अवतार, धर उपर जीवां धणी। धर उपर जीवां धणी नै, बाल चिरत अपार। काचै करवै नीर राख्यो, जोसी मानी हार। दीवां सजल जगाविया, बाल चिरत अपार। अनेक स्याणां हार चाल्या, कथ सुणी करतार। भगतां पति बूधर भणी ।३।
भगवान ने भक्तों की टेर सुनी थी। परमात्मा सभी के स्वामी है। इस धरती पर स्वयं ने ही अवतार लिया है। यहां पर अवतार लेकर अनेकों बाल चरित्र किये है। काचै करवै घड़े में जल ठहराय दिया और ज्योतिषी को हार मना दी। जल से दीपक प्रज्वलित करके दिखा दिया ऐसे अनेक बाल चरित्र करके दिखला दिये। अनेकों भोपे स्याणा हार करके चले गये ऐसा दिव्य अवतार भक्तों की पुकार सुनकर हुआ था ।३।
हुकम चरावै पाल, हुकमें पाणी पीजिये। बाला संग जग आप, कहियो बाला कीजिये। कहियो बाला कीजिये नै, कियो खेल किरतार। लोहटजी ने चरित दिखायो, मेंह अखंडा धार। खेत निपायो सांझ पहली, उधरण परचो सार। दूदै ने गढ़ मेड़तो दीन्हो, हुकम चरावै पाल। हुकमें पाणी पीजिये ।४।
आज्ञा मात्र से पशुओं को चराते जल पिलाते थे। बालकों के संग में रहते थे। बालक पशु पक्षी आदि जिनकी आज्ञा मानते थे। गऊ चराते समय अनेकों खेल खेला करते थे। अपने पिता श्री लोहट जी को भी परचा दिया और बिना बादल ही अखण्ड धारों वाली वर्षा करवा करके तृप्त किया तथा शाम से पूर्व ही एक ही दिन में हल चलाकर खेती निपजा कर अपार अन्न पैदा करके दिखलाया था। जोधपुर नरेश के भ्राता कान्हा का पुत्र उधरण को परचा दिखलाया। उनके पशु धन की रक्षा की थी। राव दूदा को मेड़ते का राजा बनाया था। ऐसे अनेकों दिव्य चरित्र गऊ चराते समय दिखाया करते थे ।४।
परगट कियो पन्थ, बंयाले मां अन्न आपियो। बंयाले कातिक मास, थिर नामी कलश थापियो। थिर नामी कलश थापियो नै, परच्या सुरग देख। पहली पूल्ह परचियो, अरू ओलख्यो अलेख। ज्यू महि घृत काढ्यो, सरब मारग मथ। परमानन्द पूरो धणी, परगट कीयो ज पंथ। च्यार चक परचाविया ।५।
संवत् १५४२ कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को पंथ प्रगट किया था। अकाल से पीड़ित लोगों को अन्न देकर उनकी रक्षा की थी। उस शुभ घड़ी में प्रथम कलश की स्थापना करके अनेकों लोगों को पवित्र किया था। इससे पूर्व पूल्हे को स्वर्ग भी दिखाया था। बिश्नोई पंथ ऐसा दिव्य प्रगट किया जो सभी धर्मों का सार है। जिस प्रकार से दही को मन्थन करके घृत निकाला जाता है उसी प्रकार से अनेक मार्ग पन्थों को मन्थन करके यह घृत सार रूपी बिश्नोई पन्थ प्रगट किया। परमानन्द जी कहते है कि पूर्ण परमेश्वर ने वही बिश्नोई पन्थ प्रगट किया है। चारों दिशाओं से लोगों को शुभ मार्ग पर लाये है ।५।