कवि परिचय — परमानन्द जी वणियाल
जन्म वि. सं. 1750-1845 के मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के ही रहने वाले बणियाल गोत्र के थे। परमानन्दजी ने अपने से पूर्व प्राप्त साहित्य का संग्रह किया था वह अब भी सर्वमान्य प्राचीन "परमानन्द जी का पोथा ग्रन्थ ज्ञान" उपलब्ध है। जिसमें सम्पूर्ण जाम्भाणी साहित्य का संग्रह है। परमानन्दजी स्वयं भी कवि थे। इन्होनें अनेक नीति परक दोहे छन्द एवं साखियों की रचना की थी। परमानन्दजी द्वारा रचित चार साखियों का यहां पर भावार्थ दिया जा रहा है।
इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।
आवो जमे साधो सेवगो, संभलो ग्यान सुजाण जी ।१।
सतगुरु आयो संभरा, विध्य सूं सुणौ वखाण जी ।२।
जिण्य पहराजा उधरयौ, मल्या असुर का माण जी ।३।
धू अमर पद जिण्य दीयौ, चौकी द्यै सीस भांण जी ।४।
हरिचंद रोहितास तारासती, सत्य सींघासन सुजांण जी ।५।
पांच पांडु कुंता द्रोपती, चाल्या गुर फुरमांण जी ।६।
कल्यजुग्य कायमै आवीयो, अयाणां कर सयाणां जी ।७।
पूंण छतीस परचाइया, कीया साध सुजाण जी ।८।
दान दया जप साच सुच्य, विसन कर वखाण जी ।९।
चौह जुग्य सीध साधां जंप्यौ, सीव ब्रंभा सेस जपाण जी ।१०।
अनंत कोड़ि परचाविया, झांभेसर सुभीयाण जी ।११।
पार गिराए पोह कियौ, चुकै आवाजाण जी ।१२।
परमाणंद की वीनती, राखौ संग्य रहमाण जी ।१३।
यह परमानन्द द्वारा विरचित साखी है। जुमलै की साखी के अन्तर्गत इसकी महिमा है। साधु सेवकों को जागरण सत्संग में आने का आह्वान किया गया है। सत संगति से ही ध्रुव, प्रहलाद, हरिचंद, रोहितास, तारामती, पांचु पाण्डव आदि का उद्धार हुआ था। इस समय कलयुग में गुरु जाम्भोजी महाराज सुजीवों का उद्धार करने के लिये सम्भराथल पर आये है। जिज्ञासु जनों को दान, दया, जप, तप, पवित्रता आदि का ज्ञान देकर विष्णु के जप करने की विधि बतलाई है। चारों युगों में अनेक अवतार धारण करके भगवान विष्णु ने ही अनेक लोगों को संसार सागर से पार उतारा है। इस समय सम्भराथल पर वही विष्णु ही आये है। जो भी संगति से गति पाना चाहते है वे अवश्य ही उनकी शब्दवाणी महावाक्य का श्रवण एवं यज्ञ रूपी ज्योति का दर्शन करके तेतीस कोटि जीवों के साथ मिलान कर सकते है ऐसी ही विनती परमानन्द जी कर रहे है। हे गुरु देव ! अबकी बार अवश्य ही पार उतारो।