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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह125 / 156

साखी-125 (परमानन्द जी)

मीनखा जलम मीले मेरा जीवौ, चूकै भव चौवरासी

कवि: परमानन्द जी वणियाल

कवि परिचय — परमानन्द जी वणियाल

जन्म वि. सं. 1750-1845 के मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के ही रहने वाले बणियाल गोत्र के थे। परमानन्दजी ने अपने से पूर्व प्राप्त साहित्य का संग्रह किया था वह अब भी सर्वमान्य प्राचीन "परमानन्द जी का पोथा ग्रन्थ ज्ञान" उपलब्ध है। जिसमें सम्पूर्ण जाम्भाणी साहित्य का संग्रह है। परमानन्दजी स्वयं भी कवि थे। इन्होनें अनेक नीति परक दोहे छन्द एवं साखियों की रचना की थी। परमानन्दजी द्वारा रचित चार साखियों का यहां पर भावार्थ दिया जा रहा है।

मीनखा जलम मीले मेरा जीवौ, चूकै भव चौवरासी। नुवौ लेखो हुवै मेरा जीवो, करिसी सो जीव पायसी। कीयो पाव जीसो करिसी, दोस काहु नहीं दीजीयै। सोदो वसत अनेक करसी, समझ लाहो लीजीयै। सवा दोढ़ा दुणां अनंता, असो माल वीसाहीया। सुमति कुमत्य दोय, मिनख जंमारो पाइया ।१।

परमानंद जी कहते है कि हे मेरा जीव ! तुझे यह मानव जन्म मिला है क्योंकि इसी शरीर से ही चौरासी लाख योनियों से छूटा जा सकता है। इसी मानव शरीर से ही नया कर्म करने का अधिकार प्राप्त है। इसी शरीर से ही जो कुछ किया जायेगा वही फल प्राप्त होगा। जैसा करेगा वैसा ही फल पायेगा। किसी को दोष नहीं देना। "आपे खता कमाणी, विसन नै दोष किसो रे प्राणी" ।। सबद ।। इस जीवन में अनेकों कार्य व्यवहार किया जायेगा किन्तु समझ सचेत होकर कार्य करेगा तभी सुफल की प्राप्ति हो सकेगी। यहां संसार में आकर व्यापार करे जिससे शुभ कर्मों को दोगुणा चौगुणा अष्टगुणा करके वापिस जाना है। यहां मानव जीवन में सुमति और कुमति दो मार्ग है। सुमति से शुभ जीवन मुक्ति प्राप्त होगी और कुमति से दुःखी जीवन जन्म मृत्यु को प्राप्त होगा ।१।

कुमति संग्य कांम किरोध मेरा जीहो, हठ अहंकार कुलोभी। लालच चोरी ठगाइ मेरा जीवो, कुमली कुचाल कुसोभी। कुसोभी मुख कुसभ भाख, सुभ साच नै उचरै। दान सील तप भाव नांही, दया हीरदै ना धरै। सीनान ध्यान भजन नांही, दोरै वासो दीजीयै। मीनख जमारो अफल इण्य परे, कुमति संग न कीजियै ।२।

कुमति के साथ काम, क्रोध, हठ, अहंकार, कुलोभ, लालच, चोरी, ठगाई, कुचीलता, परनिद्या, मुख झूठ आल बाल बोलना इत्यादि सहयोगी है। स्वयं ही निंदनीय और परनिद्या करेगा। दान, शील, तप, भाव, दया, स्नान, ध्यान, भजन, इत्यादि कुमति के संग नहीं हो सकेगा। शुभ कर्मों के अभाव में नरक में निवास मिलेगा। यह मानव जीवन निष्फल हो जायेगा। इसलिये कुमति का संग नहीं करना चाहिये ।२।

सुमति संग्य सील संतोष मेरा जीहो, सुवचन साच सुभावा। कीरीया भजन धरम मेरा जीवौ, गुण गोम्यद का गावा। गुण गाव मुकति पावै, आन सेव नै उचर। उपगार सार अपार अहोनीस, ध्यान हरि हीरद धर। मुकति माघ इण्य विध्य धाव, दान सुपहा जीजीय। रतन जलम संसार सागर, सुमति सुसंग कीजीय ।३।

सुमति के साथ शील, संतोष, सुवचन, साच, शुभ क्रिया, हरि भजन, धर्म गोविन्द के गुणों का गान करेगा। ऐसा संत जन ही मुक्ति को प्राप्त करता है। अन्य देवता भूत प्रेतों की उपासना नहीं करता। एक निरंजन निराकार विष्णु की ही उपासना करता है। इस प्रकार से मुक्ति के मार्ग पर तेजी से चलता है तथा सुपात्र को दान देता है। संत जनों का संग करता है। इस प्रकार से सुमार्ग पर चलने वाला सुमति को प्राप्त करके इस शरीर से जन्म मरण से छूटकर संसार सागर से पार उतर जाता है ।३।

औ ओसर मीनख जलम मेरा जीवो, वांरो वार नै पाव। हरिजन पारय लंघ्या मेरा जीहो, बोहड़य इण्य खंडि आव। इण्य खण्डि नै आव करे केला, सदा कोड सुहावणां। हुर कामैण्य करे केला, रतन गढ़ रल्य आंवणां। विसन दरसण सदा परसौ, वे सुन्य वासो विसन करे। परमाणंद गाव दरसण पाव, ओ ओसर मिनख जनम को ।४।

इस मानव जीवन में यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है जो अन्य जीव योनियों में नहीं मिलता। अनेकों हरि के भक्त इसी सुमार्ग पंथ को पकड़कर संसार सागर से पार उतर गये है फिर से संसार सागर में नहीं आये है। इस मृत्यु लोक में नहीं आते है किन्तु वहां वैकुण्ठ धाम में हरि के पास आनन्द उत्सव मनाते है। शुन्य में भगवान विष्णु का वास है वही भगवान का परम धाम है जहां जाने पर वापिस लौटकर नहीं आते। सदा ही भगवान विष्णु के संग में रहते है। किसी प्रकार का दुःख वहां पर नहीं है। परमानन्द गाते है और उस अलौकिक आनन्द को प्राप्त करते है। यह दुर्लभ अवसर मानव जन्म को सार्थक करते है। आप भी कीजिये ।४।