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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह124 / 156

साखी-124 (अज्ञात)

कल्यजिग देवजी को चिलत वखाण्य, पनरासरि तिराणवै

कवि: अज्ञात कवि

कल्यजिग देवजी को चिलत वखाण्य, पनरासरि तिराणवै। वदि मंगसरि नुव्य दीन जाण्य, संभराथल्य परवाणियो। संभरथल्य परवाण कीयो, चीलत सुरा दीखाइयो। सब मोमीण जीव काज, साह चोर चीताइयो। केइ चालै खड़ग धारा, केइ चालण कुं लागे। संसार आयो करम पायो, चीलत कीयौ कल्यजुगै ।१।

कलयुग में देवजी जाम्भोजी ने चरित्र दिखाया था उसका यहां बखाण किया जाता है। वि. सं. १५०८ भादव वदि अष्टमी से वि. सं. १५९३ मिंगसर वदि नवमी तक इस संसार में रहे। अधिकतर समय सम्भराथल पर विराजमान होकर बिश्नोई पंथ की स्थापना वि.सं. १५४२ में कार्तिक वदि अष्टमी को की थी। ८५ वर्ष ३ महिना पूर्ण होने पर सम्भराथल से प्रस्थान करके लालासर की साथरी पहुंचे और वहीं पर देवताओं को दिव्य चरित्र दिखलाया। सम्भराथल ५१ वर्षों तक रहकर सभी प्रकार के जन समुदाय को सचेत किया। भक्त जनों के उद्धार हेतु दिव्य अलौकिक सबदवाणी कही। सभी तो सद्मार्ग पर चलने में समर्थ नहीं हो सकते किन्तु मोमण भक्त लोग धर्म पर चले। अवश्य ही खड़ग की धार पर चलना कठिन है। उसी प्रकार से सद्धर्म पंथ पर चलना भी कठिन अवश्य ही था किन्तु कई लोग चले है और पार पहुंचे भी है। संसार के लोग आये और अपने कर्मों का संज्ञान लिया और पार पहुंचे इस प्रकार का चरित्र श्री देवजी ने किया ।१।

किसन आयो कल्य मांहि, भाग परापति भगतां पाइयौ। सींघ बकरी एकण्य घाटि, ग्यान सहजे गुर म्हार पाइयौ। सींघ बकरी एक घाट पाया, देस देसा चालीयौ। हुकम प्रथमी हुइ चोहचक्य, इबक मीलस मीलीयौ। मनी दोयंनी परीख लेसी, संभलौ गुर भाइयो। पहलाद जी क कवल काज, कीसन कल्यजुग्य आइयो ।२।

निश्चित ही कृष्ण कलयुग में आये है किन्तु जिनका भाग्य सौभाग्य बलवान था वही प्राप्त कर सके है। सभी प्रकार के लोग मित्र दुश्मन जाम्भोजी के पास आते थे किन्तु वहां आकर एक साथ बैठकर गुरु ज्ञान श्रवण कर आपसी वैर भाव भूल जाते थे। सिंह और बकरी को एक ही घाट पर पानी पिला दिया था। यह उनकी अहिंसा वृति का प्रभाव था। "अहिंसा प्रतिष्ठायां तन्सिन्निधौ वैर त्याग"। गुरुदेव के हुकम से इस पृथ्वी पर चर्चा चली थी। लोगों ने आपस में एक-दूसरे से कहा यदि मिलना है तो अबकी बार ही मिलान कर ले। हे गुरु भाइयों ! संभल कर जाना दोय मन दोय दिल से जाओगे तो वहां पर पकड़े जाओगे। इसलिये सावधान होकर ही जाना। प्रहलाद जी को वचन दिया था इसलिये वही विष्णु कृष्ण कलयुग में आये है ।२।

कल्यजुग्य च्यारयै धरम, एकण ठांय फुरमाया। मुस्यल व्रभा जेण्य, जोगी जुगति बताया। जुगत्य जोगी की बताई, मुकति धारा तीरथै। कागद देख गुर नै चीन्ह, तेन पावै ओ पंथो। छंद जाका हुवै कल्यमा, अगम पंथ चलाइयो। संभरथल्य गुरु पंथ चलायो, च्यारय धरम फुरमायौ ।३।

एक ही स्थान विशेष सम्भराथल पर चारों धरम फरमाया है। यहां पर ब्राह्मण, हिन्दू, मुसलमान, जैन आदि को उनके धर्मानुसार चेताया है। योगी लोगों को भी युक्ति मुक्ति का मार्ग बतलाया है। तीर्थ जल धारा का भी रहस्य बतलाया है। जो विद्वान लोग पुस्तक पोथा तो पढ़ते है किन्तु गुरु की पहचान नहीं करते वे लोग इस बिश्नोई पंथ सुपंथ को प्राप्त नहीं कर सकते। गुरु का मार्ग इन पोथियों कागदों में नहीं लिखा जा सकता इस कलयुग में जिनके छुपे हुए पाप है उनका खुलासा हुआ है। यह अगम वैदिक पंथ जाम्भोजी ने चलाया है। यहां सम्भराथल पर गुरु जाम्भेश्वर जी ने पंथ बताया है। उस पर चलने के लिये जन समुदाय को प्रेरित किया है और चारों धर्मों की बात इस पंथ में फरमाई है ।३।

परभ नै टाली म्हारा साम्य, हंमर उमाहो तेरे दीदार कौ। भाइड़ा सीधा एकण्य धार, करे उमाहो जुमलै पार कौ। करे उमाहो पारय पहुंता, माया दुख घेणर हो। जुग जुगंतरि कौल पुरौ, ओ भरोसो तेर हो। संत दे करतार दील मां, कोड़ि बारा मेलिया। चीलत पाखौ क्यौ सहारू, साम्य प्रभु नै टालिया ।४।

हे गुरु देव ! इस समय हमें आप अपनी प्रभा अलौकिक प्रकाश से वंचित नहीं रखना। हमारे मन में उमंग उठ रही है। आनन्द की लहरों से सरोबार हो रहे है। आपकी अपार कृपा से हम आपसे सम्बन्ध जोड़ सकते है और आपका शुभ आशीर्वाद प्राप्त कर सकते है। हे भाई लोगों ! यह पंथ सीधा स्वर्ग तक पहुंचने वाला है। इस पर चलकर पार पहुंचने की उमंग करें। एक उमंग प्रेम रस में विभोर होकर इस पंथ पर चलने का उपाय है। इस संसार में तो दुख का कोई अन्तपार ही नहीं है। हे गुरुदेव ! युगों-युगों का वचन दिया हुआ प्रतिज्ञा की हुई अब आप पूरी करो। इस समय तो केवल आपका ही भरोसा है। हे कर्त्ता ! आप हमें सत्य शक्ति प्रदान करें। जिससे हम बारह करोड़ लोग उन इकवीस करोड़ से मिल सके। आपके दिव्य चरित्र से अतिरिक्त मैं किसका सहारा लूं। हे स्वामी ! अबकी बार हमें छोड़ना नहीं। उन बारह करोड़ की पंक्ति में मिला देना। यह आपकी अपार कृपा से ही संभव है।