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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-157 उमाहो

बाबो जंबूद्वीपे प्रगटया, चौचक हुवो उजास

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बाबो जंबूद्वीपे प्रगटया, चौचक हुवो उजास

आप दीठो केवल कंथै, जिंहि गुरु की हम आस।

बलि जाऊं जांभेजी रे नाम ने,साधां मोमणां रो प्राण आधार

थे जांरि हिरदै बसो, तेरा जन पहुंता पार ।

संभरथलि रलि आवणा, जित देव तणो दीवाण

परगटियो पगड़ो हुवो, निशि अंधियारी भाण।

एकलवाई थल खड़यो, करत सभी मुख जाप

शंभू रो सिंवरण करै, जो जपै सोई आप।

भूख नाहीं तिसना नाहीं, गुरु मेल्ही नींद निवार

काम क्रोध व्यापै नहीं, जिंहि गुरु की बलिहार।

भगवीं टोपी पहरतो, गही कथा दश नाम

झीणी वाणी बोलन्तो, गुरु वरज्यो वाद विराम।

सिंकदर परमोधियो, परच्यो महम्मंद खान

राव राणा निंव चालिया, संभल केवल ज्ञान।

मध्यम से उत्तम किया, खरी घड़ी टकसाल

कहर क्रोध चुकाय कै, गुरु तोड़यो माया जाल।

सीप बसै मंझ सायरा, ओपत सायर साथि

रैणायर राचे नहीं, चाहे बूंद स्वाति।

जल सारे बिन माछला, जल बिन मच्छ मर जाय

देव थे तो सारो हम बिना, तुम बिन हम मर जाय।

भवजल बेड़ी डूबंतां, बूझे नहीं गिंवार

केवल जंभ बाहरो, म्हांने कोण उतारे पार।

हंसा रो मान सरोवरां, कोयल अंबाराय

मधुकर कमल खे करै, तेरा साधु विष्णु के नांव।

जल बिन तिसनां न मिटै, अन्न बिना तिरपत न थाय

केवल जांभे बाहरयो, कौण कहै समझाय ।

पपीयो पीव पीव करै, बोहली लगी पियास

भुंई पड़ियो भावे नहीं, बूंद अधर की आश।

ठग पाहण पोहमी घणां, जा मेल्ही दुनि भुलाय

पाखंड करि पर मन हरै, जां मेरो मन न पतिताय

काच कथीर न राचही, विणज्या मोती हीर

मेरो मन लाग्यो श्याम सूं, गुदड़ियो गुणां को गहीर।

निरधनियां धन वाल्हमो, किरपण वाल्हो दाम

विषियां ने वाल्ही कामणी, तेरा साधु विष्णु के नाम।

धन्य रे परेवा वापड़ा, साजै बसे मुकाम

चूण चुगे गुटका करे, सदा चितारे श्याम।

अंबाराय बधावणां, आनंद ठामो ठाम

श्याम उमाहो मांडियो, पोह कियो पारगिराय।

बोल्यो गुरु उमाहड़ो, करमन मोटी आस

आवागवण चुकाय के, म्हानै दयो अमरापुर वास।

अवसर मिलिया मोमिणां, भल मेलो कद होय

दुःखी बिहावे तुम बिना, हरि बिण धीर न होय।

काहे के मन को धणी, काहे के गुरु पीर

वील्ह भणै बिश्नोइयां, आपां नाम विष्णु के सीर।

उन्नतीस धर्म-नियम

तीस दिन सूतक, पांच ऋतुवन्ती न्यारो ।

सेरां करो स्नान, शील संतोष शुचि प्यारो।

द्विकाल संध्या करो, सांझ आरती गुण गावो।

होम हित चित प्रीत सूं होय, वास बैकुण्ठ पावो।

पाणी वाणी ईंधणी, इतना लीजै छाण।

क्षमा दया हिरदै धरो, गुरु बतायो जाण।

चोरी निंदा झूठ बरज्यो, वाद न करणो कोय।

अमावस्या व्रत राखणो, भजन विष्णु बतायो जोय।

जीव दया पालणी, रूंख लीला नहीं घावै।

अजर जरै जीवत मरै, वै वास स्वर्ग ही पावै।

करै रसोई हाथ सौं आन सूं पला न लावै।

अमर रखावै ठाठ, बैल बधिया न करावै।

अमल तमाखू भांग, मद्य मांस सूं दूर ही भागै।

लील न लावै अंग, देखते दूर ही त्यागै।

* * * *

उणतीस धरम की आखड़ी, हिरदै धारै जोय।

जंभेश्वर किरपा करै, नांव बिश्नोई होय।

हरजस-१

साधो भाई ऐसा देश हमारा, जहां नहीं काल का सारा। टेर।

स्वयंप्रकाश एक जोत विराजै, नहीं चंद नही तारा

अग्नि सूरज वहां नहीं पहुंचे, बिना भान उजियारा।

जन्म मरण दुख वहां नही पहुंचे, अजर अमर सुखारा

सत रज तम गुण वहां नहीं पहुंचे, मूल माया से पारा।

ऐसे देश संत पहुंच बिरला, जिन लिया संतां का सहारा

अगम देश की अद्भूत रचना, पुकार कहै संत सारा।

अद्भुत महिमा ताकी वरणी न जावै, वेद संत सब हारा

जांभो कूंभो हरि द्वितीया नाहीं, ब्रह्म जोत इकसारा।

हरजस-लूर - (2)

गिरधर गोकल आव, गोपी सनेसो मोकलो

मोहि दरसण को चाव, प्रेम पियारा कानजी । टेर।

थारै माथै मुकट सुढाल केसर तिलक जु हद बण्यो

मोहन नैन विसाल, सुंदर बदन सुहावणो।

घूंघर वारे केस, कानां कुंडल झलक रह्यो

ओ ही मनोहर वेष, म्हारै मन में रम रह्यो।

गल वैजंती माल, पीतांबर कटि काछनी

हाथ लकुटिया लाल, सांम सलूणां सांवरा।

गावै छतीसूं राग, गिरधर मुरली मोहनी

मोये सुर नर नाग, गोपी मोये गुवालिया।

वै दिन कांन चितार, महीड़ो मो पै मांगता

अब तुम गए विसार, मथुरा में महाराज बणे।

चेरी कंस को दासि, भली बसाई भावनी

वां संग कियो निवासि, सैंस सहेली छाडि कै।

थांनै झुरै जसोदा माय, राधा पलक न वीसरै

ललिता जीव ललचाय, दरसण कारण दूबली।

थानैं झुरै बिरज की नार, घर घर झुरै गुवालिया

गऊ तिण तज्यों मुरार, बछड़ा खीर न पीवही।

ऊदो कहे कर जोड़, कांय विसारी कानड़वा

म्हारी अरज सुणो रणछोड़, दरस दया कर दीजिये।

हरजस-घूमर (3)

सतगुरु दरसण म्हे जास्यां

निज पूरब प्रीत पिछाणी ए माय,

सतगुरु दरसण म्हे जास्यां । टेर।

तन मन फूली सुधि बुधि भूली,

चरणां में लपटाणी ए माय।

कथा प्रसंगा नित नव अंगा,

चरचा रूचि उपजाणी ए माय।

हरिगुण गुणस्यां हिरदै मां भणिस्यां

सुणि सुणि इम्रत वाणी ए माय।

हरि रंग राची प्रेम सूं नाची,

रोम रोम विगसाणी ए माय ।

ऊदो दासा प्रेम प्रकासा,

हरि में सुरत समाणी ए माय।

हरजस-झूमखो-राग मल्हार (4)

मेरा लालनै ऐसो हरजीरो झूंबखो, पांचू परमल भारी

ऐ पांचू जे बस करै, सा ई पतिवरता नारी।

इंव गुणवंती कामणी, निगणो मोरो नाय

एकणि वास वसंतड़ा, अब क्यों मेल्हयो जाय।

धण पुराणी पिव नुंवो, नित उठि झगड़ो होय।

धण पिछाणै पीवनै, आवागुवण न होय।

पाल पुराणी जल नुंवो, हंसा केल कराय

बालापण री प्रीतड़ी, चुंण चुंण हरि चुगाय।

गिगन मंडल मां कोठड़ी, घुरै दमामां घोर

मन मधुकर सूं मिल रह्यो, छेदया करम कठोर।

बंकनाल नीझर झुरै अमर मरै नहीं जीव

पलटि जोगणि जोगी हुवै, सूंन्य महारस पीव।

गंगा जमना सुरसती, त्रिंवेणी तटि असनांन

चंद सुरजि अभ अंतरै, अठसठि तीरथ थांन।

कंणि ओ झूंबखो गावियो, किण अह किया बखांण

जा घटि अणभै ऊपजै, जाका अह इहनाण।

अरध उरध बसे रहो, भुंवर गुफा एक ठांव

पांच पचीसूं वसि करै, संभू जाको नांव।

अगम निगम जहां गम नही, वरन विवरजत दीठ

आसानंद ऐसी कहै, पीयो अमी रस मीठ।

हरजस-छन्द गवड़ी (5)

राम रहीम विसंन विसमल्ल, किसन करीम हमारे

कुकरम जुलम गाय बकरी परि, रूसे मीसलि तुम्हारे।

बांमण बांचै वेद पुराणां, काजी किताब कुराणां

पथर थरपै मसीति पुजावै, हलति दहुं नहीं जाणां।

हींदू हरि कहि हारी न मानै, तुरक तांबसी लीणां

मेरी कह हमारी जाणै, दोऊ लड़ि वींड़ि षीणां।

हिंदू फिरि फिरि तीरथ धोकै, मुसिलमान मदीनां

अलाह निरजंण मन दिल भीतरि, अंतरि डेरा दीन्हां।

हिंदू कै मनि पूरब मानै, पछम मुसिलमानां

बीच बीच वील्ह को सांमी, सब दिल मांहि समानां।

हरजस (6)

ऐसा ध्यान धर गुरुमुखी, जीवत मुगति होय जन सुखी । टेर।

तजि ब्रह्माण्ड पिंड रति काम, अब सांभलि मन को विसराम।

मध्य भुवण मां मन समाय, परम जोति सूं परचो लाय।

इला पिंगला सुखमन जहां, आसण भुंवर गुफा एक तहां।

भुंवर गुफा ताजीपुर पाट, विषम पंथ जहां अवघट घाट।

निरंजण कुंवल अकल आकार,तिस मां तीनि लोक विसतार।

ससिहर कै घरि सूर समाय, आवागुंवणि मिटै तैं भाय।

अनहद सबद सरस धुनि लाय, धुनि भीतरि हरि जोत निपाय।

वा जोति सूं मिलि मन मेरा, तजि हदि बैहदि कीया डेरा।

अगम की बात निगम क्यों लहै, गैबी सो अजगब की कहै।

गुरु परसाद साध की सेवा, जन सुरजन भजि आतम देवा।