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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह331 / 157
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साखी-156

जिभिया जपले जंभ सवेरा, आज संभरथल आनंद अपारा । टेर।

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दोहा

धन्यहि जंगल संमरथले, धन्यहि बाल गवाल

जाके संग सतगुरु रम्यो, लालण लिल्ल भवांल

हरि कंकेड़ी धन्य जहां, प्रभु किया प्रवेश

रूखां बल रल आवणां, रमतो बाले वेश

परच्चा पशु अरु पक्षियां, जीवां उत्तम जात

हुवा पवित्र जोत से, परची गुप्त न्यात

धन्य दिहाड़ो रैणहि, प्रगट्यो गुरु संसार

‘वील्ह’ कहै जेहि ओलख्यो, तेहि उतरसी पार

जिभिया जपले जंभ सवेरा, आज संभरथल आनंद अपारा । टेर।

सुर तेतीसों रहत सनमुख, आगे ऊदो जन करत उचारा ।

देव घणा सब हिल मिल गावै, इन्द्र बधावा मंगलाचारा।

जैसे दणीयर उदय होत है, तिमर तूटत होत उजारा ।

मुनिजन वेद पढत है ब्रह्मा, धनि धनि लोहट भाग तुम्हारा।

षोड़स अरु षट नरपति आये, बड़े बड़े भूपति भूप भुजारा।

हर्ष भये शब्दों की धुनि सुन, परसत कर कर प्रीत पियारा।

अवगत नाथ अयोध्या के पति, तुम्हीं ब्रजपति नंद कुमारा।

आज समराथल आये हो स्वामी, नव खंड पृथिवी खेल पसारा।

झिगमिग ज्योति विराजै शंभु, कंचन नगरि अनूप किंवारा।

तीन लोक जांकी महिमा गावै, पावत माखण मोक्ष द्वारा।