प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी
साखी-155
आवो सखी वर जोवां हमैं,
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
आवो सखी वर जोवां हमैं,
वींद नवरंग कंवर भायो । टेर।
घण घमंड सूं राजा रुघनाथजी,
सीत सूं वर इधको सवायो।
चोहु रथ बरोबरि रोह लागी रथां,
पड़ि रजि छोहणी गैण छायो।
राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघन,
देखि दसरथ हिरदो सिलायो।
मोतियां लूंब नै कोर हीरां माणकां,
सेहरो सीस सोभे सवायो ।
कोड रायकुंवरि रा तुरेवा कारणै,
ओपे अदभुत बनो बनायो।
मंगलाचार आचार मिथलापुरी जोवो,
जनकराय मंडप छायो ।
घुरै निसाण नै तरणि गावै धवल,
परणीजै आज दसरथ जायो।
भगति रो दान दे और मांगूं नहीं,
सोहलो परमाणंद गायो ।