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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-154 छन्दां की १२ राग धनाश्री

काया तो मोमणो रतन सरीखी पहरेलो मोमण कोई।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

काया तो मोमणो रतन सरीखी पहरेलो मोमण कोई।

सतगुरु तो मोमणो सहजे मिलियो पूरब लिखियो सोई।

पूरब लिखियो कोड़ि बारां, जंभ गुरु परचावियो।

वरतैं अनहद अवल किरिया, गुरुजी ज्ञान सुणावियो।

मुकती खेती पार लाभै, कहयो गुरु को कीजिये।

जीवत मरिये अजर जरिये, रतन काया पहरिये॥१॥

सतगुरु तो मोमणो सीख देवे, सांभलियो मेरा भाई।

कूड़ कपट जीवड़ा नै भारी हुवैलो, पंथ मां करो ठगाई।

करो ठगाई पिंड पोखो, साच सिदक नहीं जोय हो।

हिये भीतर घड़ै घाटी, कांही बाहर धोय हो।

कपट कर कर पिंड पोखो अन्त धरती मांही रहे।

दुख दुकरत जीव सहसी सीख दियां सतगुरु कहे॥२॥

कांये मोमणो थे साध कहावो, करतब करो अधूरा।

हरिचंद तो मोमणो कोटि सात लेतरयो जिंण कर्म कमाया पूरा।

जिन्हां करतब किया पूरा सोई जुगे जुग उधारिया।

पहलाद हरिचंद पांच पांडू, सूरा सेती रल मिलिया।

बांका सिदक जोवो माघ खोजो कुटंब देख मत राचियो।

झूठ बोलो किरिया ओछी, कांये काया पोखी काचियो॥३॥

माया तो मोमणो मेर करावें लिछमी आथ विगानी।

काचो पिंड जीवकै साथ न चालैं, सुकरत संचो पिराणी।

सुकरत संचो जीव प्राणी, जिण संग दुस्तर तिरे।

चांद सूरज पवन पाणी, साख सतगुरु आदरे।

संसार सलियर कवल कूड़ो, कलि काल कण लीयो।

गुरु वचने मेर छोड़ी, जिन्हां सत सुकरत सांचि लीयो॥४॥

सतगुरु सिंवरो मोमणो, इक मन ध्यावो दीन कथो जांभाणे।

गुरु के वचनै निंव खिंव चालो साच सही कर जाणो।

साच सेती मिल्या नांही, पंथ मांही भ्रांतियां।

लबधि मेल्हो माघ खोजो, अजर जरो जीवन मरो।

कह ऊदो पारि पहुंचो, सेवा सतगुरु की करो॥५॥