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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-153 छन्दां की १० राग धनाश्री

ओ गुरु आयो जंभराज देव, निज हक साच पिछाणियो।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

ओ गुरु आयो जंभराज देव, निज हक साच पिछाणियो।

जां साधा ने देवेलो पार, मुख बोलै इमरत बाणियो।

इमरत बाणि गुरु मुख बोलैं, सूरग सुध लीला पती।

देवा को गुरु विसन जांभो, जतिया गुरु पूरो जती।

पार गिराये देवै वासो, जे हक साच पिछाणियो।

मिनख रूपी विसन आये, मुख बोलै इमरत बाणियो॥१॥

ओ गुरु आयो बागड़ देस, जगमां कियो बाबै चांदणी।

भगवत जी भगवै स भेस, बारा कोड़ी समावणो।

बारा कोड़ी पारि पहुंचै, सुरग हूवे बधावणो।

सुरां गुरु संसार आयो, रली पहुंती थारे मोमणो।

बागड़ देस आवाज तेरी, जग मां कियो बाबै चांदणो॥२॥

ओ गुरु आयो पूरो साह, बिणज करो बोपारियो।

थाने हुवैलो अधिको सू लाभ, कारण किरिया मत हारियो।

कारण किरिया मत हारियो, भरम भूला ना रहियो।

कुलोभ अरु अंहकार तजियो, रतन काया यूं लहियो।

साधो अजर जरियो मेर छोड़ो, ताण थके हारियो।

साच सिदक म्हारे श्याम सेती, बिणज करो बोपारियो॥३॥

थारो तीरथ निज थल थान, सो गुरु आयो भालियो।

जिंहिं गुरु का करिया कोल, माथे बांधर पालिंयो।

किरिया अनहद वरत मानो, जाणि जीव न घावियो।

नुगरा सेती निंव खिंव चालो, पारि पहुंचो भावियो।

राव राणा भरम भूला, राज करंता मालिये।

गरीब रूपी पही पूरो, सो गुरु आयो भालिये॥४॥

थारां नव खंड हुंई अवाज, समराथल गुरु आवियो।

थारी साधारा सारेलो काज, जे पूरो गुरु ध्यावियो।

जिण पूरो गुरु ध्यावियो, सो सुरगां पुर जायसी।

अपट पटोला सुरग हिंडोला, मनो चींता पायसी।

काज संभलो चड़ो बैड़ै, पारि पहुंचो भावियो।

नव खंड देस आवाज थारी, समराथल गुरु आवियो॥५॥