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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-152 साखी छन्दां की

गुरु म्हारो पूरो दातार, म्हे छां थारा मंगता।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

गुरु म्हारो पूरो दातार, म्हे छां थारा मंगता।

सांई बंदा पार, आस करा आसकता।

आस थारी देवजी, जीव काजैं ध्यावियौ।

आप संभू जीव काजैं, थल ऊपर आवियो।

ज्ञान निज जपो विसन, चालो बिरम किरिया सार।

पार गिराये रतन काया, दई तूं दातार॥१॥

इकवीसा सूं मेल जंभराय तूठै होयसी।

गुरु ठेल्या कयाइ पखाण, पढ़िया पंडित जोयसी।

जोसी तो पंडित भरम भूला, निकट चौथे वे नैं।

कलि मांहि कोडि तारे, देत का लिंग छेद नैं।

हींडोलैं हींडण पिलंग पोढण,रली मनसा केल नैं।

कोड़ि बारा करो पूरा, इकवीसा सूं मेल नैं॥२॥

उत्तर दिखण देश पूरब पछिम निंवावियां।

पहलादा सूं कोल संभाल, वाचा पालण आवियां।

वाचा पालण विसन आयो, मिलै बारा करोड़िया।

तीन जुगा मांही रही बांकी, ठांय पूरैं पूर जोड़िया।

प्रभु सेती साच चालो, रंग गुरु के राचियो।

कृत जुग में कोल कियो, वाचा थारी सांचियो॥३॥

वाचा थारी साच देवजी थे जागो, जग सारो सोवैं।

गढ तेतीसा वास जंभराय, तूठ सूं होवैं।

तेतीसा गढ तेरा सदा, निचल पार गिराये बसेर हो।

एक मन होय विसन ध्यावो, बहोड़ि न होवैं फेर हो।

सुरगे सुख अनूप इधका, गौहठि सुगरा सूं होवैं।

वाचा थारी साच देवजी, थे जागो जग सारो सोवैं॥४॥

काजी मुला आप देवजी, पढिया पंडित जोयसी।

केवल ज्ञानी देव, धणी तूं सरब संतोषी।

सरब संतोषी सही पूरो, ज्ञान तिहिं पर जोविये।

मुकति खेती पार लाभे, खाख जीवत होविये।

पांच सात नव कोड़ि बारा बहोड़ि फेर न होयसी।

काजी मुला आप देवजी, पढिया पंडित जोयसी॥५॥