मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह326 / 157
प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-151 छन्दां की राग धनाश्री

गुरु के कथनि जुल्या मेरा बाबा जहां का हरिया भाग।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

गुरु के कथनि जुल्या मेरा बाबा जहां का हरिया भाग।

गढ़ बैकुंठे अलख लड़ी, चड़ी जोवै छै जी भाग।

सदरंग कामण माघ जोवै, कदि साध मोमण आयसी।

नूर सतगुरु आस पूरवै, रतन काया पायसी।

अरतो लै मुंध आवै, सुरग बाजै दुंदुही।

अनंत बधावा हूवै जांदिन मंगल गावै मिल सही॥१॥

अलख लड़ी अरदास करै, मेरा बाबा हम पीव सूं कदि मेला।

थारी तिहूं जुगि इकवीस कोड़ि, पहुंती हींडै सहज हींडोला।

सहज हीडोलै तेरा साध हींडे दुख दालिद नहीं तहां।

जुग चोथै विसन मिलियो, इकवीस कोड़ि र बारहां।

बैकुंठ बैडो विसन ढोयो, सुचियारा सालिया लेवैजी।

पार गिराये पहुंचाय, जंभराय वास निहचल देवेजी॥२॥

पारगिराय नित अजरावर, गुरु साहिब सूं लिवलावणा।

मोमणा नै मनसारा भोजन, इमी कचोला पीवणा।

इमी कचोला चीर पटोला, अखे कर वर कामणी।

तेतीस गढ तेरा सदा, निचल देव समरथ तूं धणी।

झणकार नैवर जोत रतना, कोड़ पायल पेखणा।

दीदार आगै सभी तेरी, देव दई नित देखणा॥३॥

धिन हो म्हारा जीवड़ारा साहिब राजा जो म्हानै सुरग मिलावैं।

म्हानैं सांई दत दई हो म्हारा कायम राजा जो थारी गति भावैं।

दत दई दाता मुकतिं मनसा, रतन काया पारदे।

देव दरगे मिलिया मोमणा नैं सुर सींभा दीदार दे।

अति पात अनेक अपछरा, हेत बहुरंग भाव छै।

तेतीस कोड़ि मिलिया जानी,वींद तिरी भवन राव छै॥४॥