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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह325 / 157
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साखी-150 सोहलो

परम जोति परसियै, विसंन वासि वसियै,

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

परम जोति परसियै, विसंन वासि वसियै,

कीजिये सुख अनंत केला।

वारणां लिछमी लियै अपछरां आरती,

मिलै विसंन सूं जोति मेला।

सतजुग पहलाद संगि पांच कोड़ि परठिया,

तेता हरिचंद संगि सात तरिया।

दवापुर दहुठल संगि नव कोड़ि निरखीजै,

तिहुं जुग इकबीस कोड़ि तिरिया ।

वीनवै पहलाद विसंन सूं वीनती,

करतार वचन नै वाडि कीजै।

पाप रे पहर मां कूड़ कपट परवस्यो,

दवादस इकबीस सूं मेलि दीजै।

धणियापी राखि अवतार हरि धारियो,

नरसिंधा जंभ निकलंक होयसी।

चौह जुग रा साध जांनि निकलंक रा,

वसुधा दुलहैंणी हरि वर होयसी।

परणि निकलंक वैकुंठ पधारिस्यै,

भगत भगवंत रा साथि भेला।

पहलाद सांमी परमाणंद वीनवै,

मिलै तेतीस पहलाद मेला।