साखी-149
विष्णु विष्णु भण विष्णु प्राणी, विष्णु विष्णु बखाणी।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
विष्णु विष्णु भण विष्णु प्राणी, विष्णु विष्णु बखाणी।
ना पैदा तैं पैदा कीया, साहेब ने सत जाणी।
सतजुग मां सतपंथ परगटय्यो, बात सुणी ब्रह्माणी।
हिरणाकुश हुवो हरि दोखी, तिहिं की कोई न बसाणी।
अपणी सगती गुरु की भगती, घर मां दूजी चलाणी।
पेट थकै हुंकारो दीनो, ईं दिस बै सुलझाणी।
भांजण घड़ण संवारण समर्थ, किया काम बीनाणी।
नारसिंह नरनरां नरींदो, बहुगुण चींदो मदति करो वनीआणी।
त्रेता जुग मां हरिचंद राजा, क्रिया सरस कमाणी।
मान्यो शील हकीकत जाग्यो, उन्हां ठाढा पाणी।
जीवड़ां काजै हरिचंद खरची, तारादे पटराणी।
मोट राजा सोई थरपी, देव जका दाय आणी।
दवापुर बुध बुधवंत दीन्ही, पंडवां सोई सुहाणी।
पांच पांडु कुंतादे माता, चाल्या गुरु फुरमाणी।
द्रोपदी दुरमति दुरे चुकाई, पांच तणां परवाणी।
सुरसत सगती गोरख की भगती, साधां सूं महराणी।
पक्ष पांडु होय कैरूं छेदय्या, अक्षौहणीं किया धूड़ धाणी।
क्रोड़ तेतीसां कियो उमाहो, सुरगां दिस सिधाणी।
बीरांनै इकबीस उडीकै, बैकणठां रे ठाणी।
महमद कलमो वेद अथर्बंण, कलजुग के परवाणी।
पांच बखत निवाज र रोजा, हक हलाल पिछाणी।
आपा मुसन मुरही अवरां, ईंह निस मुसलमाणी।
आप संतोषी अवरां पोखी, लंगरि आवादाणी।
भ्रमत भटकत भोदू दुनियां भूल गई गुरु वाणी।
मिल्या संतोष हुवा रोग खंडत, बात सुधर सबलाणी।
उदबुद काया कला उन्मुनी, बोलै इम्रत वाणी।
आखर जो म्हांनै प्यारी मिलसी, जां तेजैसी रिवाणी।
मनसा जैसी दिसा पण तैसी, इन्द्र सही लखाणी।
पांच सात नव बारहां मोबहत, सोहबत तेतीसांणी।
जमलो कर हमलो कर लंघसी, भवजल सैर असमांणी।
निकलंक पात छत्र सिर ऊपर, आप हुवो अगवांणी।
झाड़ पछाड़ो बाबो करसी, देखो वेद कुरांणी।
साजन सजनी हुवा गहमह, दिल मिल रहम भीदाणी।
निरमल कंवल नित नवरंगी, माण आप समाणी।
आश जगीस होवै प्यारां की, हुई जकी मन भाणी।
अजर अमर अजरांवर हुवा, दरगै मिलै दिवाणी।
गढ तेतीसूं सुवस वसिया, रजा हुई रहमाणी।
होय कर मगन जा बसिया, जोते जोत समाणी।
आलम कूंदान अति प्रभु दीजै, बीच सभा बसाणी।