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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-148 राग रामगिरि

पायल घड़दे सुघड़ सुनार, भांजण घड़ण संवारणहार।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

पायल घड़दे सुघड़ सुनार, भांजण घड़ण संवारणहार।

भांजै घड़ै संवारै सोई, अलख विनाणी लखै न कोई।

पायल पहरै कोई शुचियार, दोजखि जै पापी हते तिंहि वार।

पायल सोहै भगतां के पाए, ज्यों ठमकै तो स्वर्ग सिधाए।

आसण मार बैठो रहमांणी, जीमै अन्न न पीवै पाणी।

जुगां जुगां की कहै कहाणी, जंभदेव जुगां परवाणी।

बासग नेतो मेर मथाणी, समंद विरोल्यो ढोयेउ पाणी।

मध कीचक मारयो घात्यो घाणी, मीठे ते कियो खारो पाणी।

रावण मारचो तोड़ जबाणी, लीवी लंका सीता घर आणी।

विधवा कीवी मंदोदर राणी, जागो मोमण रैण विहाणी।

ऊदो बोलै इम्रत वाणी, सिंवरो मनवा सारंगपाणी।