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साखी-147
सार हंस राजा हो जी, बैठो जी तखत रचाय।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सार हंस राजा हो जी, बैठो जी तखत रचाय।
गुण वेलड़ियां हो जी, तुम कित बसिया रात।
हम वासो वसियो हो जी, खालक के दरबार।
हम काम पड़्यो थो हो जी, मोमण था शुचियार।
मोमण आवैला हो जी, कर कुरजां ज्यों डार।
मोमण मिलैला हो जी, लांबी लांबी बांह पसार।
मोमण वैसेला हो जी, हंसा रै उणियार।
मोमण बोलैला हो जी, कर मोरां ज्यूं झिंगार।
भुंय लांघी छै हो जी, जे कण लेराहै निपाय।
कुण लुण चुण ल्यो हो जी, राच्या न रहो संसार।
राजा कर्ण भलो थो हो जी, कंचन को दातार।
राजा विदुर भलो थो हो जी, साहेब को शुचियार।
जीवड़ा के काजे हो जी, राजा हरचंद बेची नार।
पांच पांडु भला था हो जी, धन्य कुंतादे माय।
ढहि वृक्ष पड़ैलो हो जी, धरण सहै भुंय भार।
जमला जागैला हो जी, कांसी के झणकार।
जोधो रायक बोलै हो जी, कलि दसवैं अवतार।