प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी
साखी-146 राग हंसा
सत है सतगुरुजी, साहेब सिरजणहार।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सत है सतगुरुजी, साहेब सिरजणहार।
थल सिर आयोजी, दुख मेटण दातार।
कोड़ियां बारां काज जी, गुरु जंभ लियो अवतार।
म्हांनै देवजी मिलिया जी, कलि दसवैं अवतार।
हम लोभी लबधी जी, त्रिकम हो तारणहार।
हम खूनी थारा जी, तूं बावल बकसणहार।
चौखेणी फिरिया जीर, जम न छोड़ी लार।
शेख सदूदू निंवायो जी, करता पार अघार।
खींयै सूं खालक जी, कीवी महर मुरार।
बहु पापी तार्य्या जी, नर नारी बहुवार।
दोय रावण गोयन्दजी, स्वामी किया शुचियार।
जन केशो बोलै जी, म्हारी आवागवण निवार।