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साखी-145 कणां की
गुरु कायमा ।टेर॥
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वरज्या सतगुरु श्याम, कुमल कुकर्मी करता
मद्य मांस पोस्ती भांग खाता वेश्रुता
वरज्या गोरखनाथ, वरज्या अवलिया पकंबर
वरज्या कृष्ण मुरार, वरज्या केवली ते शंकर
सूत पुराण कुराण, मां बोले, साख सुजादमी
इतरा सीख न मानहीं तेरो कालो मुंह रे आदमी
गुरु कायमा । टेर॥
दिल चंगा मन चानणा, ते मोमण संसार जी।
साहेब मेरा बाणियां, सहज करै व्योपार जी।
बिन डांडी बिन पालड़ा, तोल्या सब संसार जी।
हम कुत्ता तेरे नांव का, मोतिया मेरा नांव जी।
गल हमारे रासड़ी, जां खांचै तां जाव जी।
किसका माई बाप है, किसका पख परवार जी।
किसकी मंडप मैड़ियां, किसका है घरबार जी।
सांई की मंडप मैड़ियां, अलख तणा घरबार जी।
भुंयजल अथघ अथाहणो, किस विध उतरूं पार जी।
कर सुकरत की नावड़ी, जिसतै उतरो पार जी।
बोलै दीन सुदरदी अलप जीवण संसार जी।