प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी
साखी-144
एक मिलंता दोय मिलै, दोय मिलंता तीन।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
एक मिलंता दोय मिलै, दोय मिलंता तीन।
तीन मिलंता च्यार मिलै, पांचै गुरु प्रहलाद।
पांच मिलंता छव मिलै, सातै हरिचंद राव।
सात मिलंता आठ मिलै, नव दहूठल राव।
नव मिलंता दस मिलै, दस अवतार मिलाप।
दस मिलंता ग्यारह मिलै, बारह जंभराज आप।
पांच सात नव बारहां, हुवो ल्हालर साथ।
वीर बंटाऊ भाइयो, म्हांनै पीहर पंथ बताय।
डावी डांडी परहरो, जीवणी सुरगांपुर जाय।
भुंयजल अथघ अथाहणो, किण विध उतरां पार।
कर सुकरत की नावड़ी, लंघिये भवजल पार।
क्रोड़ तेतीसा सुहावणा, उत मोमण मीत सुजाण।
पारगिराये वे गया, जित जुंवर न लहसी जाण।
अमी कचोला पीवणा, सहजे सहज हिंडाय।
ऊदो बोलै वीनती, आवागुवण चुकाय।