प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी
साखी-143 कणां की
हम बिणजारियां ।टेर॥
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
हम बिणजारियां । टेर॥
अली मेरे मन खरो उमाहो, स्वामी मिलण दीदारो।
हम बिणजारा पुर साह का, बिणज करण व्योपारो।
खोटा खोटा विणज न वहोरां, माणक दा वोहरा।
इंह जुग पहलै मोमणो, हुय चालो हुशियारो।
इंह जुग दूजै मोमणो, मत बैसो पड़िहारो।
इंह जुग तीजै मोमणो, जीवड़ा चेत संभालो।
इंह जुग चौथे मोमणो, अब जीवड़ां की बारो।
पुरुष पचाधो आवैलो, बाली परणन हारो।
मेघाडंबर छल्त्र धरै, दुल दुल होय असवारो।
हाथ तिधारो खड़ग लियो, दाणवां करै संघारो।
धरण तांबै की हुवैली ठणक बजावणहारो।
हंसा रम टोली रव, लंघियो भवजल पारो।
पारगिराये वे गया, चूकै आवण फेरो।
अमी कचोला वै पीवै, सहजै सहज हिंडायो।
समस पोत बोलियो, कलि दशवैं अवतारो।