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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-142

जीयो अन्तर्जामी आत्मा, गर्भवास सूं जाये।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

जीयो अन्तर्जामी आत्मा, गर्भवास सूं जाये।

जीयो जा दिन जुग परगटे, लछा केतक ल्याये।

जीयो जामण मरण अगोचर, क्यों कर्म लिखाये।

जीयो भाव लिख्या उस वास मां, पूरण दाता पाये।

जीयो वर्ष मास बाल मतो, पितु मातु खिलाये।

जीयो जीव ऊंच नीच अवतरियो, बहु जूण अघाये।

जीयो भूप बहोला भ्रमै घणां, सिर छत्र धराये।

जीयो जाति बड़ी कुल पेखिया, बहु जोबन भाये।

जीयो दिन दिन घटंतो न देखियो, दरवेस बणाये।

जीयो बाहर धाड़ी उडीकतड़ा, जम ताल बजाये।

जीयो मात पिता पख दोय चलै, एक दिन पराये।

जीयो कोठी हंदा नाज ज्यूं, घट छेह दिखाये।

जीयो एक रहीम पुकार गया, एक राम सुणाये।

जीयो एक अन्तर्जामी एक सही, क्यों दोय लखाये।

जीयो हक तै नांव हजूरी सदा, क्या पंथ कहाये।

जीयो विद्या भणै वाराणासी, तोऊं पार न पाये।

जीयो जंत्र ताल तंत मंत, सरल कंठ गाये।

जीयो राग छतीस अलापिग्या, सुर सातों सुणाये।

जीयो गीत कवित्त विधान कहया, कवि पात कहाये।

जीयो एक विष्णु भगति बिना, साहिब को गुमाये।

जीयो साधु संगति हरि भक्ति बिना, जमारो जाये।

जीयो अबूझ अंधक अजाण नर, अवसर जाये।

जीयो ओ संसार विकार सब, सी कोट बणाये।

जीयो मूल गह्या तत पाय लिया, क्या डाल फिराये।

जीयो सुरजन ते जन ऊबरया, जां हरि हरि गाये।