साखी-141
जीवला रे जंभ अचंभो आयो, अपरंपर थे
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
जीवला रे जंभ अचंभो आयो, अपरंपर थे
हेत कियां हरि ध्यावो ।
जीवला रे अजर जरो मन की मेर चुकावो,
तो अमरापुर पावो।
जीवला रे सूई कै नाकै धागो पोवो,
थे हरि हिरदै यों जोवो।
जीवला रे यहां चेता दूं पाटे जे मन की,
गांठि गुंढी सब खोवो।
जीवला रे एक बार मर कर बोहोड़ि न मरना,
थे दिल समुंदर धोवो।
जीवला रे गर्भवास में कवल कियो थो,
जिण रो कांसू हूवो।
जीवला रे वाचा देकर पालो नाहीं,
थे आपै आकनै बोवो।
जीवला रे देवजी को दशबंध खरच्यो क्यों नाहीं,
थे राखो विसन विसोवो ।
जीवला रे खरचे लाहो राखे तोटो,
विवस्तु विवरस जोवो।
जीवला रे तातां थंभा रे गल दीजोला,
थे तो करो अरु रोवो।
जीवला रे लाहै कारण कांय घर जुवो,
छेहै कांध अमोवो ।
जीवला रे चेहै वाज मिल ही लाहो,
थे विवरस रस जोवो।
जीवला रे मीठे कारण कांय जुल आवें,
खारे हाथ संगोवो ।
जीवला रे थूल सइसें लडकिरया लजाये,
हुवेलो लो जीवो।
जीवला रे जाट सगो कर जीमण बैसेला,
जिण रो भल कर थिगोवो।
जीवला रे पुरुषां कदी सो कलि मां आयो,
थे कायं जागंता सोवो।
जीवला रे कहसी सांभलियो नाहीं,
म्हारे कान न पड़ियो चोवो।
जीवला रे सीख दियां सतगुरु समझावे,
जंबू द्वीप खड़ेवो।
जीवला रे गुरु परसादे रेड़ो बोले,
हर चरणां चित लावो।