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साखी-140
मेरी अंखियां फरूकै जी, काग करूकै आंगणै।
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मेरी अंखियां फरूकै जी, काग करूकै आंगणै।
पाड़ोसण बूझे जी, पाहुणा कोई आयसी।
घुड़लां खुर बाजे जी, बैलां के बाजे घूंघरू।
साध मोमण आये जी, धन्य दिहाड़ो धन्य घड़ी।
काठ चंदण मंगाऊं जी, छोल घड़ाऊं पालकी।
पाट रेसम बणाऊं जी, दावण द्यो मखतूल की।
सलेफ बिछाऊं जी, आलमसाई गींदवो।
साध मोमण पोढै जी, धन्य दिहाड़ो धन्य घड़ी।
कोरा चरू चहोड़ जी, जल जी मंगाऊ गंग को।
जिनवै का चावल जी, दाल हरी हरी मूंग की।
गावो घृत मंगाऊं जी, दही मंगाऊं भूरी भैंस को।
कासमीरी थालीजी, लोटो मंगाऊं मुहम को।
साध मोमण जीमे जी, अंचल झोली बींझणो।
पाड़ोसण बूझे जी, पाहुणा क्या लाइया।
म्हांनै स्वर्ग बतावो जी, रतन काया पहरायसी।