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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह83 / 156

साखी छन्दां की-83

रे मन मेरा न कर मुकेरा, काया ढुलैली काची

कवि: केशोदास जी गोदारा

कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा

केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।

रे मन मेरा न कर मुकेरा, काया ढुलैली काची । निरत सुरत लिव लाय पियारा, सबद अनाहद राची । तन मां तीरथ न्हाय त्रिवेणी, गगन गुफा कर डेरा । गुरु प्रसादे रहे उनमुन, यों समझे मन मेरा ।१।

संत कवि केशोदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते है कि रे मन ! तूं मेरा अपना है तो फिर वादा किया हुआ पूरा क्यों नहीं करता ? इस समय मुकर क्यों रहा है। यह काची काया धीरे-धीरे बिखर जायेगी। फिर कुछ भी नहीं कर पायेगा। इस सुरति को संसार से हटा करके परमात्मा में लगा दें, वही सभी से प्यारा है अनहद नाद रूपी शब्द में ही रच जाओ यही तेरा कर्त्तव्य है। यह शरीर ही तीर्थ है, इसमें ही गंगा यमुना सरस्वती है जिसे इडा, पिंगला और सुषुम्ना कहा जाता है। इस त्रिवेणी में स्नान करके दसवें द्वार रूपी गुफा में आसन लगाकर स्थिर हो जा। गुरु की अपार कृपा से ऊर्ध्वगमन करके संसार से उपराम हो जा इस प्रकार से समझना है हे मेरे मन ।१।

रे मन हंसा परिहरि संसा, सांसो सोक न कीजै । त्रिकुटि तीर्थ मनवा काजै, महा अमीरस पीजै । बड़पण मांण बड़ाई मेटो, बड़पण गाल्यो वंसा । अन्तर ध्यान उलट धुन सुणिये, करी हरि सूं हित हंसा ।२।

हे मन ! तूं हंस सदृश निष्कलंक है। तो फिर संशय क्यों करता है। किसी भी प्रकार का शोक न करें। अन्य तीर्थ तो शरीर के लिये हो सकते है परन्तु त्रिकुटि का तीर्थ तो मन के लिये ही है। वहां पहुंच करके महा अमृत रस का पान करें। स्वयं का बड़पन अहंकार को मिटा दे। क्योंकि इस अहंकार ने ही तो बड़े-बड़े वंश मिटा दिये है। संसार की तरफ से वृति को मोड़कर अन्तर ध्यान करें तथा अन्तर वृति होने से नाद ध्वनि का श्रवण करें। हे हंसा ! हरि से प्रेम करते रहना, यही तेरी साधना है ।२।

रे मन जांणी सुण सुर वाणी, माया मोह निवारी । अजप्या जाप जपी मन मेरा, कर उनमुन सूं यारी । गरजै गगन अधिक धुन सुणिये, उपजै अनहद वाणी । जिंहि डोरी सिध साधु विलंब्या, सो जीवड़ा सत जाणी ।३।

रे मन ! तूं तो सभी कुछ जानने वाला ज्ञानी है। इसलिये तूं देव वाणी का श्रवण कर। तथा मोह माया का निवारण कर। अजप्पा जाप जो नित्य निरंतर श्वांस में ही स्मरण होता है जहां माला की आवश्यकता न पड़े ऐसा स्वाभाविक होने वाला ओम सोहं का जाप करें। इस प्रकार से उर्ध्व द्वार से सम्बन्ध जोड़ । यहां दसवें द्वार में अत्यधिक गर्जना होती है, स्पष्ट ओम सोहं नाद की ध्वनि सुनाई देती है। वह ध्वनि श्रवण करें। जिस मार्ग को पकड़कर सिद्ध साधु संसार सागर से पार उतर गये वही मार्ग जो ऊपर बताया है सत्य है, उसे पकड़ करके तूं भी पार उतर जा ।३।

रे मन भाई सहज समाई, पखा पखी नहीं कीजै । परलै होय पराछत बांधो, जीव दुनि मिल छीजै । सुसबद राची मन मेरा, अलख पुरूष लिव लाई । कषमल कटे कह जन केशो, विसन सिंवर मन भाई ।४।

रे मन तूं तो मेरा भाई है। इसलिये मेरे से द्रोह न कर । सहज ही रूप में परमात्मा में समाहित हो जा किसी प्रकार का राग द्वेष आदि पक्षपात नहीं करना। नित्य प्रति प्रलय हो रही है, पराजय गले में मत बांध। ये सभी जीव दुनिया से सम्बन्ध जोड़कर दिनोंदिन नष्ट होते जा रहे है। हे मेरे मन ! अच्छे सत्य शब्दों में रच जाओ, उन्हें धारण कर लो। अलख पुरूष परमात्मा में ही लीन हो जा। केशोजी कहते है कि इस प्रकार से साधना में रत होगा तो तेरे पाप कट जायेंगे। हे भाई ! तूं विष्णु का स्मरण बार-बार करते रहो ।४।