कवि परिचय
केशोदास जी गोदारा
15 साखियाँ
परिचय
केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।
इनकी साखियाँ
साखी कणां की राग सुहब 82
जीव के काजे जुमलै जाइये, कीजे गुरू फुरमाइये
साखी छन्दां की-83
रे मन मेरा न कर मुकेरा, काया ढुलैली काची
साखी छन्दां की 84 'मुकाम की शोभा'
ओ निज तीरथ तालवो, जोति सही नित श्याम की
साखी छन्दां की राग धनाश्री-85
बाबै आप लियो अवतार, श्याम सम्भराथल आवियो
साखी छन्दां की राग धनाश्री-86
साधो सिंवरो सिरजण हार, पार ब्रह्म पहली निऊं
साखी छंदां की राग धनाश्री-87
संतो सिंवरो सिरजण हार, जम्भेश्वर जीवां धणी
साखी छन्दां की राग धनाश्री-88
जीवड़ा जप जगदीश, जांभेश्वर जीवां धणी
साखी छन्दां की राग धनाश्री-89
सिले पछिम रे देश, हिंवर तुरी पलाण सी
साखी छन्दां की-90
कलियुग किसन पधारे, संता करण संभाल जन बाड़े सो बिछड़्या, तहां करण प्रति पाल
साखी छन्दां की राग मारू-91
सिंवरो सिरजण हार, कलिजुग कायम राजा आवियो
साखी छन्दां की राग सोरठ-92
जां दिन संत मिलै मेरा जीहो, बाजै सुरग बधाई
साखी छन्दां की 93
जुग जागो जम्भेश्वर राजा, कलजुग कायम आइयो
साखी दोहा-94
बूचो बारां करोड़ में, कियो वैकुण्ठा वास
साखी राग सिन्धु-95
मेलो कर मोटा धणी, गिणी तेतीसूं ज्ञान
साखी राग सिन्धु-96
हटवाड़े हलचल हुवो, असुरे दीन्ही आण