मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह96 / 156

साखी राग सिन्धु-96

हटवाड़े हलचल हुवो, असुरे दीन्ही आण

कवि: केशोदास जी गोदारा

कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा

केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

हटवाड़े हलचल हुवो, असुरे दीन्ही आण । रामइये कीवी रूड़ी, दुनि छुड़ायो डांण । जोधाण लग जाणियो, भले जे बीकानेर । चाल गयी चितौड़ लग, साह नगर अजमेर । तू सूरा सिर सूरमो, मोड़ बंधण मयमंत । पण राखो रूंखां तणौ, पोहमी परगट पंथ ।१।

खोड़ खड़ंतै खल खिस्या, हुइ सकल सराह । धनकारे बरत्यो धरां, धन रामों धन राह । मंझ मारू के देश, कहिये कापरड़ो । मेलो मंडोवर भोमि, नव कोटि सूं नेड़ो । नव कोटि नागौर नोहर, जालौर जेसलमेर का । मुलतान मथुरा मालवो, मेवाड़ि अर आंवेर का ।२।

उजीण ईडर थलि थटो, हांसी अरू हिसार का । कच्छ कनवज कालपी, गुजरात गंगा पार का । सिंधु सवालख सोतर सांभर, लोक लाहोरी कितो । कांप अर सांचोर सोरठ, मड़हर मांडू मेड़तो । आगरो अजमेर दिल्ली, बीकानेर बिकुंपुरा । चार खंड सूं चाल आया, मेड़तो मेलो मुरधरां ।३।

सौदागर अरू साह, मिलिया बड़े व्योपारी । सांडि सुरह असीब ऊंठ, निपट मिल्या नरनारी । नर नारी मेले आय मिलिया, नाद निसांणे सुरां । हटवाड़े थाट थाटे, घणां गहम घुंघरा । नारेल नाणों नव निधि, भांति-भांति लाभ लहिया । धन धरती हुवा लाभे, शाह सौदागर मिल्या ।४।

आरती कीजै आय, करसण सौदो कीजै । दीये बसत देवाल, लाहै कारण लीजै । लीजिये कस्तुरी केसर, मखतूल मिसरी मोलिये । कांसी कपड़ो मोहर मोती, कसे कंचन तोलिये । कलाकन्द बादाम खारक, गिरी किसमिस अंत घणी । नर नारी मेले आय मिलिया, आरती आपो आपणी ।५।

चौहटे दीने चाव, धान धरि उपर छाजै । अंत डेरे उणिहारि, ताणियां तम्बू विराजै । विराज ही अति घणां तम्बू, पुर प्रजा पेखिये । गुदली तो गाहक मिल्या, गहमह दुनी की गति देखिये । सिरे सकल निरख नाणो, सकल वस्तु लाभै सटे । थिर काया दे थाट धारी, चाव दीसै चौहटे ।६।

सकल वस्तु संसार, विणजै साह बिकावै । बाणियां आवै अनेक, लाह कारण लावै । लावही अति काज लाहै, कपूर किरियाणो कितो । साटै नांणै सकल लाभै, बरतियो जुग मां जितो । लाभ लहियो भाग सारू, साह सीजै रंजिये । जाम जनमी पिता पाखो, सकल बाना विणजिये ।७।

दुनि उगाह डांण, शहरी प्रजा सतावै । हीर पखो हुजदार, मारगे मिनख रूकावै । रोकी रस्ता दुख दीजै, दुनि इण पर भीड़िये । खबर हीणां खालक खोसे, पुर परजा पीड़िये । दीवाण दाद पावही, कूक दुनियां यो कहै । दाणी दुसमण होय लागा, डांण दुनियां ऊगहै ।८।

अनर न हीये दांण, झूज हुई जाम्भाणा । खल चढ़ियां कर खीज, सूरां गही कबाणां । कबण कर गहि संबह, तिण बार तागाला रहै । निसरै तरवार तीखी, बांण सर गोली बहै । लिखे विण क्यों लोह लागै, सार अंग सुरा सहै । बिश्नोई पतिशाह प्रगट, दांण से क्या नै दैवे ।९।

मंगल रचियो राम, विधि सुबेरी विसाई । मिलियो मिनख अनेक, जान जुगत सूं आई । जुगति जानी हुवा भेला, निज कर्म लाभ न्योतियो । रामटो रण खेत आयो, मोड़ मस्तक बांधियो । तखगिरी तिरे आरती, रची चंवरी चौहटै । खिवै भाला मंड्यो भारत, मंगल रचियो रामटै ।१०।

साहो सजियो राम, रन मां विवाह रचायो । धन्य सुरों सिंह हाक, गह कर सार समाहयो । समाही सार संघार आयो, कटक दल कियो कड़ो । परणाय जसवंत पार पहुंचो, लिख्यो साहो सांकड़ो । जैसी जुगति सूं तेग वाही, देखी सुरतो ओलख्यो । इन्द्र भवन उच्छाह हूंतो, रामइये साहो सज्यो ।११।

बड़ साको संसार, खेड़ खड़न्ते कीयो । वास धवै सुत सूर, जग मांहि जस लियो । लियो जस जिण जीव काजै, शुक्ल पक्ष काया कसी । मघा नक्षत्र वार मंगल, चैत सुदी एकादशी । सतरह सौ सइये समै, नर दांण काजै सिर दियो । मुक्ति पहुंतो कह केसो, संसार बड़ साको कीयो ।१२।

यह साखी केशोजी द्वारा विरचित है । इसमें कवि ने बड़े ही विस्तार से धवां के रहने वाले रामोजी खोड़ के बलिदान का वर्णन किया है । सर्वप्रथम सात छन्दों में तो जोधपुर से पूर्व की ओर कापरहेड़े गांव में लगने वाले मेले का सजीव वर्णन किया है । उस मेले में हर प्रकार की वस्तुऐं बिक्री हेतु आती है । तथा कुछ लोग तो बेचने के लिये तथा कुछ खरीदने के लिये आते है । ऐसा विशाल मेला लगता था जहां पर माता-पिता, भाई-बन्धु को छोड़कर कुछ भी खरीदा बेचा जा सकता था । ऐसे दिव्य मेले में सर्व साधारण लोग आते थे । इससे पूर्व में मेले में प्रवेश का कोई कर टेक्स नहीं लगाया गया था । किन्तु इस बार राजाज्ञा के बिना ही गरीब प्रजा पर अधिकारियों ने कर लगा दिया था । गरीब जनता अकारण ही सतायी जा रही थी । उसी प्रजा में बिश्नोई लोग भी आये हुए थे । उन्होनें मेले में प्रवेश करने की स्वाभाविक प्रवृति दिखलाई थी । उसी समय सिपाहियों ने उन्हें रोका और टेक्स मांगा । बिश्नोई कहने लगे हम टैक्स नहीं देंगे । यह सरासर अन्याय है न तो हम अन्याय करेंगे और न ही करने देंगे । इस प्रकार से विवाद बढ़ चुका था । चारों तरफ से लोग एकत्रित होनें लगे । उसी समय ही धवां गांव के रहने वाले रामोजी खोड़ भी आ गये थे । सिर मोड़ यानि अपने श्वसूराल जा रहे थे । वही वैवाहिक चिन्ह रूपी पगड़ी बंधी हुई थी । साथ में बाराती भी थे । रामोजी ने आकर स्थिति देखी और विवाह में जानें को त्याग करके वहीं पर स्वर्ग में जानें के लिये कमर में बंधी हुई तलवार निकाल ली और युद्ध भूमि में कूद पड़े । दोनों तरफ से भयंकर युद्ध हुआ, कई लोगों को मौत के घाट उतारकर स्वयं भी मृत्यु का वरण किया अर्थात् मृत्यु के साथ विवाह रचाया । रामोजी के बलिदान होते ही युद्ध वहीं पर ही रुक गया तथा जोधपुर राज दरबार में यह खबर पहुंची तब राज दरबार ने आकर क्षमा याचना की तथा उन अधिकारियों को दण्डित किया । इस प्रकार से दुनिया पर हो रहे अन्याय को उखाड़ फेंका तथा सदा के लिये धर्म मार्ग को प्रशस्त किया । यह घटना वि. सं. 1700 की चैत्र सुदी एकादशी मघा नक्षत्र वार मंगलवार के दिन घटित हुई थी । कवि का कहना है कि रामोजी ने यह कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण करके दिखाया था । जिसके प्रत्यक्ष दृष्टा स्वयं केशोजी थे ।