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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह87 / 156

साखी छंदां की राग धनाश्री-87

संतो सिंवरो सिरजण हार, जम्भेश्वर जीवां धणी

कवि: केशोदास जी गोदारा

कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा

केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।

संतो सिंवरो सिरजण हार, जम्भेश्वर जीवां धणी । दुख मेटण दातार, भव भंजण जिभिया भणी । भव भंजण जिभिया भणी नै, अलख शिम्भु आप । दया कर गुरु दुख मेटो, करोजी परलय पाप । करोड़ बारां कारणै, कलि आयो इण काम । श्वांस श्वांस अरदास कीजै, सिंवरियो गुरु श्याम । जम्भेश्वर जीवां धणी ।१।

हे संतों ! सृजनहार श्री जाम्भोजी का स्मरण करो। जो विष्णु सर्वजन के स्वामी है। दुख मेटने वाले दाता है। संसार के भय को मिटाने वाले श्री विष्णु को जिभ्या द्वारा जपो। अलख स्वयंम्भू का ही स्मरण करें। वही तो यहां पर सम्भराथल पर आये है। हे देव ! दया करके हमारे दुःखों को मिटा दीजिये। इस कलयुग में बारह करोड़ का उद्धार करने के लिये आपका आगमन हुआ है इसलिये प्रत्येक श्वांस में स्मरण करें तथा हाथ जोड़कर विनती करें। सतगुरु के रूप में आये हुए श्याम का स्मरण करें वे ही जीवों के स्वामी है ।१।

जुग जाग्यो जगदीश, काया धरि आयो कले । सुरग देवण सुरराय, सांचो गुरु सम्भराथले । सम्भराथल गुरु श्याम आयो, पात परसै पांव । साधा गुरु साचो मिल्यो, सुरग देवण सुरराव । कहर क्रोध कुबाण कोप, परि हरो उरि रीस । साच शील सुचाल चालो, जुग जाग्यो जगदीश । काया धर आयो कले ।२।

इस युग में जगदीश स्वयं प्रगट हुए है, स्वयं निराकार निरंजन होते हुए भी अपनी माया से शरीर धारण करके आये है स्वर्ग देने वाले देवाधिदेव विष्णु जो सतगुरु के रूप में सम्भराथल पर विराजमान हुए है। सम्भराथल पर विराजमान सतगुरु के चरणों को स्पर्श करने से पवित्र हो जाते है। सज्जनों को सतगुरु सच्चे मिले है जो स्वर्ग देने वाले है। सतगुरु की शरण ग्रहण करने के लिये कलह, क्रोध, कुमार्ग, कोप आदि क्रोध दिलाने वाले दुर्गुणों को छोड़ना होगा। सत्य शील सुमार्ग पर चलो। इस युग में जगदीश प्रगट हुए है। जो काया धारण करके आये है ।२।

सार हुई संसार, सतगुरु आयो सांभल्यो । इला लियो अवतार, मोहन मानवियां मिल्यो । मोहन मानवियां मिल्यो नै, सही विसवा वीस । सांध पूगी श्याम आयो, तारसी तेतीस । अपणां अपणाय लेसी, पापियां पासे टालिया । इक टंगिया आय नै, परस पांव जे लागियां । सतगुरु आयो सांभल्यो ।३।

संसार के लोगों को ज्ञात हुआ है कि सतगुरु सम्भराथल पर आये है तभी से लोग संभल गये। इस धरती पर अवतार लिया है। स्वयं मोहन विष्णु ने ही आकर मानवों से मिलन किया है। मोहन मानवों से मिले है यह बात शत प्रतिशत सत्य है इस प्रकार का समाचार सभी जगहों पर पहुंचा कि संसार सागर से पार उतारने के लिये आये है और तेतीस करोड़ देवताओं से मिलायेंगे। अपने प्रिय जनों को तो अपना बनाकर तार देंगे। इस प्रकार की वार्ता श्रवण करके दूर देश के लोग भी आकर चरणों में समर्पित हुए। सचेत होकर मुक्ति-युक्ति की योग्यता धारण कर सके ।३।

सही स्वर्ग दे श्याम, शुचियारा साचो धणी । परहर पाप विकार, सीख स्वर्ग की जो सुणी । सीख सुरग की जो सुणी नै, उर मेट्यो अभिमान । प्रीति कुल की परहरो थे, सांभल्यो गुरु ज्ञान । अजर जरो मन मेर छाड़ो, दयाकर दाखे दई । कह केशो करो किरिया, सुरग सुख पावो सही । सुचियारा साचो धणी ।४।

वास्तविक में स्वर्ग देने वाले, पवित्र करने वाले, श्याम ही सच्चे मालिक है। जिन्होनें भी स्वर्ग की शिक्षा का श्रवण किया वही पापों को छोड़कर शरण में आया। स्वर्ग की शिक्षा के प्रभाव से हृदय में स्थित अहंकार को मिटा दिया। कुल परिवार से मोह तोड़कर गुरु के ज्ञान को महत्व दिया और सचेत हुए। अजर काम क्रोधादि को जरणां करते हुए, अहंकार छोड़ते हुए दया को धारण किया। केशोजी कहते है कि शुद्ध क्रिया करोगे तो स्वर्ग में सुख अवश्य ही मिलेगा ।४।