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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह94 / 156

साखी दोहा-94

बूचो बारां करोड़ में, कियो वैकुण्ठा वास

कवि: केशोदास जी गोदारा

कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा

केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।

बूचो बारां करोड़ में, कियो वैकुण्ठा वास । इल मांही इणि एचरो, जुग लियो जसवास ।१।

बूचोजी एचरा पोलावास गांव मेड़ताटी के रहने वाले थे । उन्होनें हरे वृक्षों की रक्षा हेतु अपना बलिदान स्वेच्छा से दिया था । इस घटना का वर्णन केशोजी ने अपनी इस साखी में किया है । प्रहलाद के बिछुड़े हुए बारह करोड़ों को जाम्भोजी ने वैकुण्ठ पहुंचाया था उनमें बूचोजी एचरा अग्रगण्य थे । इस धरती पर एचरे ने ऐसा पुण्य कर दिखाया जो सराहनीय है । इस जगत में यश की प्राप्ति बूचोजी ने की है ।१।

मेड़ताटी रा मानवी, परगट पोलावास । जिण नगरीं विश्नोई वसै, रूंखां तणो निवास ।२।

मेड़ताटी में पोलावास गांव के बूचोजी निवासी थे । उस समय जहां जिस गांव में बिश्नोई बसते थे उन्हीं गांवों में हरे वृक्षों की बहुतायत थी ।२।

सरवर नीर सुहावणां, तरू रहिया धर छांय । वन विगताले राखियो, मंझ मेड़ताटी मांय ।३।

वहां पर तालाब शुद्ध जल से भरे हुए थे तथा तरूओं की घनी छाया थी । वृक्षों ने अपनी छाया से सम्पूर्ण धरती को ढक रखा था । मेड़ता के आसपास के गांवों में बिश्नोइयों ने हरे वृक्षों की रक्षा की थी । वहां के कटते हुए वन को बचाया था ।३।

राखे विश्नोई खेजड़ी, जे चाले गुरु राह । राव रखावे तो रहे, का पाले पतिशाह ।४।

बिश्नोई लोग खेजड़ी की रक्षा करते है । गुरु के बताये हुए नियमों का पालन करते है । यही वन की रक्षा का कारण था । जब तक गांव पति ठाकुर या बादशाह वृक्षों की रक्षार्थ सहयोग नहीं देगा तब तक रक्षा होना अति कठिन होगा ।४।

जहां दीठा तहां कही, बनरावन उणिहार । ब्रह्म गऊ गुरु खेजड़ी, एह तुलसी तत सार ।५।

जहां-जहां पर वृक्ष दिखाई देते थे वहीं पर ही बिश्नोईयों के द्वारा ही रक्षा होती थी । यह बात सर्वत्र प्रचलित थी । वन की शोभा वृन्दावन से भी अधिक हो रही थी ।५।

रैण नै राजोद मां, दूदे तणी ओलाद । नुगरो गुरु मांने नहीं, विरछ बढ़ावै कर बाद ।६।

ब्रह्म, गुरु, गऊ और खेजड़ी ये सभी तुलसी के समान ही पूजनीय तथा सार रूप है । गांव रैण तथा राजोद में दूदोजी की संतान राज्य करते थे । दूदोजी तो जाम्भोजी के परम शिष्य थे परन्तु पीछे ओलाद कुपात्र हो गई जो हठ करके वृक्षों को कटा रहे थे । अच्छी शिक्षा तो मानते ही नहीं थे ।६।

बाढ़ बिरछ होली कीवी, फिर फिर दीठां गोढ़ । आई खबर जमात मां, खोज गया राजोद ।७।

उन लोगों ने वृक्ष काटकर ढेर कर दिया । आगे होली आने वाली थी, होली को जलाने के लिये लकड़ी चाहिये । वन में विचरण करने वाले ग्वालों ने जब कटे हुए रूंखों के गूंढ़ देखे तो बहुत ही चिन्तित हुए और वहां से वापिस आकर बिश्नोइयों की जमात के लोगों को खबर सुनाई कि इस प्रकार से वृक्ष काटे जा चुके है । इस सूचना को प्राप्त करके जमात के लोग पता लगाने के लिये राजोद गांव में पहुंचे वहां पर कटे हुए वृक्षों का ढेर पड़ा था ।७।

चिठी मेल्ही चोखलै, चोगावां मिलिया आय । नर सो नरसिंघ दास रो, संक न मांनै कांय ।८।

जमात के प्रधान लोगों ने चारों तरफ बिश्नोइयों को चिट्ठी लिख करके भेजी और पत्र पहुंचते ही गांवों के लोग आकर राजोद में एकत्रित हो गये । बिश्नोई जनों ने ग्राम पति ठाकुर नरसिंघ दास के आगे जाकर हाथ जोड़ते हुए कहा कि आपके अनुचरों ने खेजड़ी काटकर ढेर कर दिया है । आप इन्हें उचित दण्ड प्रदान करें । किन्तु अभिमानी नरसिंघदास ने उनकी एक बात भी नहीं सुनी, उनकी कुछ भी परवाह नहीं की ।८।

करम चंद नै कालो चड़यो, दुरजण लीयो सराप । मेड़तियां सूं मेड़तो, उतरियो इणि पाप ।९।

उसी समय ही वहां पर उपस्थित करमचन्द का क्रोध रूपी नाग फूंफकार मारने लगा तथा दुरजन ने भी उसी का ही साथ दिया । वह बिश्नोइयों को खरी खोटी सुनाने लगा । यही कारण था कि कालान्तर में मेड़ता इसी कारण से तो उनसे छीना गया था क्योंकि ये लोग कुछ भी ज्ञान धर्म मर्यादा की परवाह नहीं करते थे ।९।

बुध हीणां बामण बाणियां, पति बारो परधान । सिर धन आवै सिर साटै, सिर साटै सनमान ।१०।

ठाकुर के पास रहने वाले शिक्षक भी बुद्धिहीन ही थे । नगरी में रहने वाले ब्राह्मण बनिया आदि भी कुछ भी नहीं कह सके । बिश्नोइयों ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि आप लोग हमारी बात को सुन नहीं रहे हो किन्तु हम लोग अपना सिर देकर भी अपने सम्मान एवं वृक्षों की रक्षा करेंगे । अपना सिर समर्पण करके भी बहुमूल्य वृक्ष बचायेंगे ।१०।

सिर साटै लाभे सुरग, जे सिर दीनों जाय । उत तागाला तमकिया, बूचे बीड़ो लियो उठाय ।११।

पुण्य कार्य हेतु सिर कटा देनें से स्वर्ग की प्राप्ति होगी इसलिये हम इस सौदे से चुकेंगे नहीं । जिन्होनें भी धर्म रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान दिया है उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई है । वहां पर एकत्रित हुए बिश्नोई लोग सभी अपने सिर देने के लिये तैयार थे । ज्योंहि इस प्रकार की वार्ता हुई त्योंहि सभी एक साथ झटिति तैयार हो गये । यह धर्म का बीड़ा बूचे ने ही सर्वप्रथम उठाया था ।११।

नियात जमाते परगटियो, दरगे अरू दरबार । सीख करे परवार सूं, मांडयो कंध करार ।१२।

सम्पूर्ण न्यात जमात से बाहर निकलकर आगे आकर बूचे ने कहा- सर्व प्रथम मेरा शरीर वृक्षों की रक्षार्थ समर्पित है । आगे स्वर्ग और यहां राज दरबार में दोनों जगहों पर बूचोजी प्रथम श्रेणी में उपस्थित थे । अपने परिवार जनों को शिक्षा देकर अपना सिर तलवार के आगे उपस्थित कर दिया ।१२।

कंध करारो मांडियो, रतना तेग संवार । तीन हुकम बूचे किया, तन बूही तरवार ।१३।

बूचे अपना सिर आगे करके रतने से कहा खड़ा क्या देख रहा है अपना खड़ग उठा करके पहले मेरा सिर काट फिर कभी दरखतों को काटना । यदि इस समय चूक गया तो फिर कभी हिम्मत नहीं करना । प्रथम मेरा सिर कटेगा पीछे मेरे इन साथियों का उसके बाद में फिर वृक्ष कटेंगे । इस प्रकार से बूचे ने तीन बार अपना सिर काटने का आहवान किया । रतने ने तीसरी आवाज पर बूचे के सिर पर तलवार चलाई ।१३।

काया कंवल जूवो हुयो, सुरग गया सुचियार । अखी अवचल एचरो, साख रही संसार ।१४।

तलवार की तीखी धार से धड़ से सिर अलग होकर गिर पड़ा । उपस्थित जनों में हाहाकार मच गया । बूचोजी स्वेच्छा से अपने प्राणों का बलिदान देकर स्वर्ग में पहुंच गये । जब तक सृष्टि रहेगी तब तक बूचोजी अमर रहेंगे । मरकर भी बूचोजी अमर हो गये । संसार में बूचोजी की यह साखी अमर रहेगी ।१४।

झीणां कंठा झबकती, पदमल करे पियार । हस्त नखतर तीज दिन, होली मंगलवार ।१५।

यह लोक छोड़कर दिव्य स्वर्ग लोक में बूचोजी ने निवास किया जहां पर दिव्य मधुर स्वरों से अप्सराएं देव कन्याएं गान करती हुई प्यार करती है स्वागत करती हुई सुख प्रदान करती है । जिस दिन बूचेजी ने बलिदान दिया वह दिन हस्त नक्षत्र मंगलवार होली का अवसर था । वृक्ष काटने के ठीक तीसरे दिन बलिदान हुआ ।१५।

जम्भेश्वर तहां ओलख्यो, लंघिया भवजल पार । सुकरत कर सुरगे गया, केशो कह विचार ।१६।

जिन लोगों ने जाम्भोजी को पहचाना तथा उनके नियमों पर चले वे ही संसार सागर से पार उतर गये । केशोजी कहते है कि पुण्य कर्म करके बूचोजी स्वर्ग में गया ऐसा मेरा मत है ।१६।