कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा
केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।
जुग जागो जम्भेश्वर राजा, कलजुग कायम आइयो । थल उपर एकलवाई, भाग परापति पाइयो । भाग परापति पायो भक्तां, पार ब्रह्म परचावै । सुशब्द शुद्ध विचार सतगुरु, केवल ज्ञान सुणावै । सहज सुवाणी सुभाषा बोलै, अवगुण आलस त्याग्यो । नव खंड जाप जपो निरहारी, जम्भगुरु जुग जाग्यो ।१।
हे वर्तमान युग के सज्जनों ! जागृत हो जाओ । कलयुग में स्वयं भगवान विष्णु ही आये है । सम्भराथल पर इस बार अकेले ही आकर विराजमान हुए है । जिसका अहोभाग्य है प्राप्त तो वही कर सकेगा । भक्त लोगों ने भाग्यानुसार परमेश्वर को प्राप्त किया है तथा ज्ञान ध्यान से परिचित हुए है । अच्छे शब्द तथा शुद्ध विचारों से सर्व साधारण को परिचित करवा करके ज्ञान सुनाते है । सहज ही में ही अमृत तुल्य वाणी बोलते है जिससे श्रवण कर्ता का आलस मिट जाता है । नव खंडों में भ्रमण करते हुए जप कर रहे है तथा दूसरों को भी सिखलाते है ऐसे नर निरहारी सतगुरु यहां पर जागृत हुए है ।१।
हरि सिंवरो मेरा भाइयों, नांव जपो निरहारी । पांच सात नव खड़या उडिके, अब बारां की बारी । बारां बारी हुई तियारी, सहज समाहो कीजै । अनहद व्रत हकीकत जाणों, हजरत लेखो लीजै । दोय काल करो संध्या, हरि रसनां रस पीजै । दश बंध जीव जगत चुकावो, हिरदै हरि सिंवरीजै ।२।
हे मेरे भाइयों ! हरि का स्मरण करो तथा निराहारी निरंजन का नाम द्वारा स्मरण करो । पांच सात नव करोड़ तो पार पहुंच चुके है । आगे आपकी प्रतीक्षा हो रही है । क्योंकि इस बार आप की ही बारी आयी हुई है । इससे चुकना नहीं । बारह करोड़ पार पहुंचने वाले है उनके साथ आप भी तैयार हो जाइये साथ ही जाना है । अनहद नाद ध्वनि का श्रवण करो तथा हकीकत वास्तविकता को जानों । आगे स्वयं मालिक आपसे लेखा जोखा लेंगे । दोनों समय में संध्या करो रसना से हरि के नाम रस का पान करो । अपनी कमाई का दसवां भाग दान पुण्य में करो । हृदय में हरि का स्मरण करो ।२।
बारां क्रोड़ मिलै इकवीसां, धन्य दिहाड़ो सोई । रतन काया मिलै नव रंगी, कलंक न लागै कोई । कलंक न लागै कोई जीव नै, प्रीतम मिलो पियारा । आरती ले अप्सरा आवै, गावै मंगला चारा । कामण कंत मिलै बिछड़िया, त्रिकम त्रिसनां तोड़ी । इकवीसां मन हुवो उमाहो, मिलै जां बारां क्रोड़ी ।३।
उस दिन को धन्य कहेंगे जिस दिन बारह से मिलान इकीस करोड़ का हो जायेगा । रतन सदृश काया की उपलब्धि होगी वहां पर किसी प्रकार का कलंक नहीं लगेगा । जब प्यारा प्रीतम मिल जायेगा तो किसी प्रकार का कलंक नहीं लगेगा । वहां पर स्वागत के लिये हाथों में आरती सजाकर अप्सराऐं आयेगी तथा मंगल गीत गायेगी । बिछुड़े हुए अपने प्राणों के प्यारे परमेश्वर मिलेंगे । सभी प्रकार की तृष्णाऐं मिट जायेगी । आगे पार पहुंचे हुए इकीस करोड़ के मन में उत्सव होगा क्योंकि अपने बारह करोड़ बिछुड़े हुए जनों का मिलन हो जायेगा ।३।
पार गिराय पहुंचावो बाबो, मोमण मन उमाहियां । सुगुरां साध संभाल सतगुरु, नरसिंह नांव चढ़ाइयां । चड़ियां नांव जके निरमल, भोदूं भरम भुलाया । ओछा तके रहे उरबारे, पूरा पार बसाया । कारज सकल सरै मनसा सूं, हर दिन रली बधाई । कषमल कटे कह जन केशो, पहुंचे पार गिराई ।४।
सतगुरु देव पार पहुंचा देंगे । भक्तों के मन में उत्साह होगा । सतगुरु सुगरा जनों को संभाल कर नृसिंह द्वारा निर्मित की गई धर्म की नौका पर चढ़ा देंगे । जो निर्मल शुद्ध हृदय वाले लोग थे वे तो नाव चढ़ गये तथा मूर्ख अज्ञानी जन थे वे भ्रमित होकर भटक गये । जिसकी भावना-वासना सांसारिक विषयों तक ही सीमित थी वे तो संसार में ही जन्म मरण में भटक गये । तथा जो पूर्ण थे वे पार पहुंच गये । इच्छा ही बलवती है । जैसी इच्छा करेंगे वही तो फल मिलेगा । ओच्छी इच्छा भावना वाला ही भटक जाता है । जिसकी भावना शुद्ध तथा उच्च कोटि की होती है वह परमात्मा में सम्मिलित हो जाता है । केशोजी कहते है कि संसार सागर से पार उतर जाओगे तो सम्पूर्ण पाप कट जायेंगे ।४।