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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह92 / 156

साखी छन्दां की राग सोरठ-92

जां दिन संत मिलै मेरा जीहो, बाजै सुरग बधाई

कवि: केशोदास जी गोदारा

कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा

केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।

जां दिन संत मिलै मेरा जीहो, बाजै सुरग बधाई । कामणी कोड करे मेरा जीहो, अपछर मनो उछाई । उछाह अपछर करै कामणि, हेत करि मन मां हरि । विरहनी वर काज बहु विध, कलश सझियो सुन्दरी । पहर पटोली पांय पायल, बीज ज्यों तन झिलमिलै । धनि दिहाड़ो धनि घड़ि, सैण साजन रल मिलै ।१।

जिस दिन संत का समागम और मिलन होता है उस दिन स्वर्ग में भी बधाइयां बंटती है । वहां पर संत के स्वागत में अनेकों देव कन्याऐं अप्सराऐं खड़ी रहती है तथा खुशी में उत्सव मनाती है । उत्सव भी इसलिये मनाती है क्योंकि उन्हें हरि के प्रिय भक्तों से प्रेम होता है । संत भक्तों के मिलन के लिये कलशों में जल भरकर सामने आती है । सुन्दर सौम्य वस्त्र एवं अलंकारों से सुसज्जित होकर आती हुई ऐसी प्रतीत होती है मानों बादलों में बिजली चमक रही हो । धन्य है वह दिन व घड़ी जिस समय प्रेमी भक्तों का आपस में मिलन होता है ।१।

सहजै सोवण मेरा जीयो, कीजै कोड अनेरा । मोमण लाड लडै मेरा जीयो, विक्रम ते जन तेरा । जन तेरा रमै नव खंड, जरा जीव न झंपई । अमर भोम अनन्त आनन्द, रूप राम तिरजई । अमी अमृत भोग मनसा, दया करि दीन्हां दई । नर नारी आस पूगी, सो वरणां सहजा सही ।२।

प्रेम पूर्वक मिलन के पश्चात् समाधी अवस्था को प्राप्त हो जाते है । सांसारिक विषयों से निवृत हो जाते है । चित की वृतियां सहज में ही शयन को प्राप्त हो जाती है । उस समय अद्भुत प्यार का भाव उमड़ता है । जो भगवान के प्यारे भक्त है उन्हें ही इस समाधि सुख में झुलाया जाता है । क्योंकि वे जन ही प्रभु के प्यारे है । प्रभु के प्यारे जन नव खंडों में विचरण करते है अर्थात् नौ दरवाजों को लांघकर दसवें तक पहुंच जाते है । वहां पर पहुंचने के पश्चात् जरा-बुढ़ापा, रूग्णता आदि नजदीक ही नहीं आते । वह परमात्मा का लोक अमर है वहां पर आनन्द भी अद्भुत ही है, वहां पर भगवान के ही स्वरूप में रहकर संसार सागर से पार उतर जाता है । दयालु प्रभु वहां पर अपने प्रिय जनों को मधुर अमृत रस का पान भरपूर करवाते है । सभी नर नारियों की इच्छा वहां पूर्ण हो जाती है । सहज में ही तदरूप वहां हो जाते है ।२।

स्वर्गा मांहि सुख घणां मेरा जीयो, पीवै अमी कचोला । तेरा जन केल करे मेरा जीयो, हींडै सहज हींडोला । सहज हींडोला तेरा जन हींडै, जरा जीव नहीं जहां । वाव वेद न वांही व्यापै, दुख दरिद्र नहीं तहां । मांणत सुख अनुप इधिका, सांभलो साधु जणां । नर नारी निकलंक नेह, जिण सुरगा मांहि सुख घणां ।३।

हे मेरे जीव ! स्वर्गों में सुख अनन्त है । वहां पर अमृत का पान होता है । प्रभु के प्रिय जन वहां पर क्रीड़ा करते हुए आनन्द के हिलोरे ले रहे है । इसलिये शरीर धारी जीव को वहां बुढ़ापा नहीं आता है, वहां पर पहुंचने पर वात, पित, कफ आदि कष्ट नहीं सताते और न ही किसी प्रकार का दुख दारिद्र ही वहां सताता । हे साधु जनों ! संभल जाओ । वहां पर नर नारी निष्कलंक है क्योंकि स्वार्थ नहीं है । आपस में सात्विक प्रेम भाव का संचार होता है । स्वर्ग सुखों का अन्त पार ही नहीं है ।३।

सतगुरु साथ रमै मेरा जीयो, सुरनर सदा संगाती । ब्रह्मा वेद सही मेरा जीयो, नारी बहु वैण राती । रवि रात तिथ वार न वरते, पहर पख न बांचिये । मास वर्ष घड़ी मुहूरत, रूप गुरु के राचिये । सदा सुख अनुप अधिका, नाहि व्यापै ओपदां । कह केशो करो केला, श्याम संग खेलो सदा ।४।

वहां स्वर्ग लोक में सतगुरु तथा देवता साथ में ही रमण करते है । ब्रह्माजी वहां पर वेद का उच्चारण करते है नारियां अनेकों यश कीर्तन करती है । न तो वहां पर सूर्य ही अपना प्रभाव जमाता है इसलिये सदा ही दिन बना रहता है और न ही तिथि वार प्रहर पक्ष आदि का ही जोर चलता है । इसलिये वहां पर सदा ही एक रस बना रहता है वहां पर महीना वर्ष घड़ी मुहूर्त कुछ भी नहीं है सभी सतगुरु के स्वरूप में ही लीन हो जाते है सदा ही वहां पर अनुपम सुख रहता है किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आती ।४।