साखी छन्दां की-90
कलियुग किसन पधारे, संता करण संभाल जन बाड़े सो बिछड़्या, तहां करण प्रति पाल
कवि: केशोदास जी गोदारा
कवि परिचय — केशोदास जी गोदारा
केशोदास जी गोदारा का जीवन संवत् 1630-1736 के मध्य में है। ये वील्होजी के प्रमुख शिष्य थे। बाल्यावस्था से ही वैराग्य धारण करके वील्होजी के शिष्य बन गये थे। वील्होजी के पश्चात् तथा उनके साथ में ही समाज में धर्म प्रचार तथा विकास में उनका अटूट सहयोग था। ये कवि की सभी कलाओं में निपुण थे। केशोजी ने अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की थी जिनमें आख्यान कथाएँ, छन्द, कवित, दोहा, साखी आदि प्रसिद्ध है। केशोजी द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र आदि अति प्रसिद्ध एवं बहुत ही उच्च कोटि की रचना है। जो इस समय प्रकाशित की गई है केशोजी ने उन्नीस साखीयों की रचना की थी उनमें से 14 साखियां यहां पर है। इनके द्वारा विरचित अधिकतर साखियां जागरणों में गायी जाती है। इससे ही इनकी प्रसिद्धि का पता चलता है। जाम्भाणी साहित्य में केशोजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यहां पर आगे केशोजी द्वारा रचित केवल साखियों का भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।
कलियुग किसन पधारे, संता करण संभाल । जन बाड़े सो बिछड़्या, तहां करण प्रति पाल । प्रतिपाल करण गुवाल आयो, प्रीत भक्तां पालही । कवल कारण धरो देही, धर्म चाल्यो चालही । साच शील संतोष संग्रह, प्रीत कर लागो पगे । पहलाद जी के कवल कारण, किसन आयो कलयुगे ।१।
कलयुग में स्वयं कृष्ण पधारे है । सावधान होकर अपने कर्त्तव्य कर्म को धारण करो । जो प्रहलाद पंथी जीव बिछुड़ गये थे उनका प्रतिपालन करने के लिये आये है, ग्वाल बाल के रूप में भक्तों को पार उतारने के लिये आये है । स्वयं धर्म मार्ग पर चलते है और दूसरों को भी सिखाते है । सत्य शील संतोष का संग्रह करके प्रेम भाव से परमात्मा के चरण कमलों में प्रणाम करो । प्रहलाद जी के वचनों को पूर्ण करने के लिये स्वयं कृष्ण ही कलयुग में आये है ।१।
कूड़ा-कूड़ा कुगुरु नै छाड़, सुगुरु विलंब्या सेवजी । कोड़ी द्वादस कारणै, दुनियां प्रगट्या देवजी । देव दुनियां हुवो प्रगट, देह धर आया दई । आन को आराध छूटो, श्यामजी मिलिया सही । आपणां अपणाय लेसी, स्वर्ग दे साचा सुगुरां । खरा खोटा करै परेखा, छाड़िया कूड़ा कुगुरां ।२।
झूठे पाखण्डी कपटी कुगुरु की सेवा क्यों करो । द्वादस करोड़ प्राणियों का उद्धार करने के लिये दुनियां में देवजी ने अवतार धारण किया है । इस दुनिया में देव प्रगट हुए है, देह धारण करके स्वयं विष्णु भगवान यहां पर आये है । आन देवता, भूत प्रेतादि की आराधना छूट गयी है । क्योंकि इस समय देवजी से मिलन हो गया है । अपने जनों को तो अपना बना लेंगे तथा सच्चे सतगुरु उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति करवा देंगे । खरे तथा खोटे लोगों की परीक्षा करके सच्चे जनों को तो अपना लेंगे तथा पाखण्डी जनों को त्याग देंगे ।२।
जब लग पिंजर प्राणियों, जिभिया जप जगदीश । जीवड़ा ने जम छोड़े नहीं, सही विसोवा वीस । वीसवा वीस साझी सुक्रत, हेत हरिजी सूं करे । अंजली जल जांण रे जीव, आव तूटे इण परे । जबर जालम जगत डांडे, डहकी जीवड़ा नै डसे । श्वांस श्वांस अरदास कीजै, प्राणियों पिंजर बसे ।३।
जब तक इस शरीर रूपी पिंजरे में जीवात्मा है तभी तक अपनी जिभ्या से जगदीश्वर का जप कर लें । एक दिन इस जीव को मृत्यु ग्रसित करेगी । यह बात शत् प्रतिशत सत्य है । इसलिये जो भी कार्य करें वह शत् प्रतिशत सत्य ही होना चाहिये तथा प्रेम भी हरि परमात्मा से ही करें । रे जीव ! आयु प्रतिदिन घटती जा रही है, जिस प्रकार से अंजलि का जल घटता जाता है । जबरदस्त यम के दूतों ने जगत को दण्डित किया है, किसी को भी नहीं छोड़ा है । अकस्मात् आकर जीव को शरीर से निकाल करके ले जायेंगे । हे प्राणी ! इस शरीर रूपी पिंजरे में रहते हुए श्वासों श्वास परमात्मा का स्मरण करें ।३।
दरस दीजै देवजी, आवागवण न आण । सांसो मेटो श्यामजी, प्रीतम लियो पिछांण । पिछांण के प्रतिपाल कीजै, मेटियो सांसो सही । हरि हिसाब नै बूझ ही, वरग वानें की बही । पांच सात नव कोड़ि बारां, श्याम सब ही लीजिये । दास केशो आस थारी, देव दर्शन दीजिये ।४।
हे देवजी ! आप आकर एक बार उसी रूप में दर्शन अवश्य ही दीजिये । आपकी एक झलक से ही बार-बार जन्म लेना मरना सदा के लिये निवृत हो जायेगा । हे श्यामजी ! आप हमारे संशय को निवृत कर दीजिये । जिससे हम अपने प्राण प्यारे को पहचान सके । जब आपकी पहचान हो जायेगी तभी हमारा संशय निवृत हो सकेगा । इसलिये यह पहल आप ही कीजिये । हरि आये है तो पार अवश्य ही उतार देंगे किन्तु अपने प्यारे है, प्रहलाद पंथी जीव है उन्हें ही वरीयता दी जायेगी । क्योंकि इससे पूर्व भी आपने पांच करोड़ प्रहलाद के साथ, सात करोड़ हरिश्चन्द्र के साथ तथा नौ करोड़ युधिष्ठिर के साथ पार उतारे है । अभी पीछे अवशिष्ट जनों को इस समय पार उतार दीजिये । केशोजी कहते है कि हे श्याम सुन्दर ! अब तो आपकी ही आशा है दर्शन दीजिये ।४।