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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह176 / 157
जुमलै की साखी

जमै की पहली साखी

आवो मिलो जुमलै जुलो, सिंवरो सिरजणहार।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

छपइया

सूवा सुफरा बोलिये, बिपरा बोलो कांय।

छंदा ज्यांरा छाइये, जिणरे बसिये गांव।

जैसे कूआ जल बिना, खिणया ज कैसे काम।

मिनखा देही पाय कर, भजो नहीं भगवान।

दीसण लागा रूंखड़ा, नेड़ो आयो गाम।

फरसा विलंब न कीजिये, लीजै हरि को नाम।

आवो मिलो जुमलै जुलो, सिंवरो सिरजणहार।

सतगुरु सतपंथ चालिया, खरतर खंडा धार।

जंभेश्वर जिभिया जपो, भीतर छोड़ विकार।

संपति सिरजणहार की, विधि सूं सूणो विचार।

अवसर ढील न कीजिये, भले न लाभे वार।

जमराजा वासे बहे, तलबी कियो तयार।

चहरी वस्तु न चाखियो, उर पर तज अहंकार।

बाड़ै हुंता बीछड़या, जां री सतगुरु करसी सार।

सेरी सिंवरण प्राणियां, अन्तर बडो उधार।

पर निन्दा पापां सीरे, भूल उठावै भार।

परलै होसी पाप सूं, मूरख सहसी मार।

पाछै ही पछतावसी, पापां तणी पहार।

ओगणगारो आदमी, इलारहै उरभार ।

कह केशो करणी करो, पावो मोक्ष द्वार ।