संध्या आरती विष्णु तुम्हारी — चरणों की शरण मोहि राखो मुरारी
संध्या आरती विष्णु तुम्हारी, चरणों की शरण मोहि राखो मुरारी । टेर । पहली आरती कंवला कर की, सकल शिरोमणी सचराचर की। १ । दूसरी आरती प्रेम प्रकाशी, अन्तर घट घट के तुम वासी । २। तीसरी आरती पुष्प विराजै, भक्त हृदय संशय सब भाजै । ३। चौथी आरती वैकुण्ठे निवासी, लक्ष्मी सहित करो तुम वासी । ४। पांचवीं आरती मोतीराम गावै, महा विष्णु को शीश निवावै ।५।