भजन 4
खम्मा खम्मा ओ धणियां
तर्ज- खम्मा खम्मा ओ धणियां....
चालो एं सहेल्यां आपा जाम्भेजी रे चालां, निव निव धोक लगावां ए चालो जाम्भेजी रे चालां ।
समराथल सोनवी नगरी, अद्भुत महिमा हे ज्यांरी दूर देशां सू आवे जातरी, नवण करे है नर नारी ।
अदक भूमि रा आपां दरसण पावां, चालो जाम्भेजी रे चालां । 1।
बरस इक्यावन तप्या गुरुजी, ज्ञान दिया था वेदों का, सबदवाणी बड़ी मधुर थी,
किया खुलासा भेदों का, वेद ज्ञान री गंगा में न्हावां, चालो जाम्भेजी रे चालां । 2।
इमरत पाहल मिले पीवण ने, जोत रा दरसण मिलसी ।
माटी काडा नाडिये री, मन रो कमल घणो खिलसी ।
भगतां संता सूं ज्ञान सुण आवां, चालो जाम्भेजी रे चालां । 3।
घिरत खोपरा धूप लेजावां, जोत रा दरसण पावां । मोठ बाजारी चूण ले जावां, समराथल धोरे जावां ।
साखी आरती और मुरली गावां, चालो जाम्भेजी रे चालां । 4।
धान धीणो रूप देवे, धन रा भरे भण्डार । बांझिया ने पूत देवे, दीनबंधु सिरजणहार ।
जुगती और मुगती चावां, चालो जाम्भेजी रे चालां । 5।
चरणचिन्ह और खाण्डो मिलसी, रोटू वाले मंदिर में चोलो चिम्पी जांगलू में, खड़ाऊ पींपासर में ।
दरसण कर मन हरसावां, चालो जाम्भेजी रे चाला । 6।
फोगड़ा कंकेड़ी केर, धोरे पर है कुमटिया । चूण चुगे, मोर गेरी परेवा और सुवटिया ।
रामरतन हरजस गावा, चालो जाम्भेजी रे चाला । 7।