नवां अध्याय · कथा 57
अमावस्या व्रत कथा महात्म्य
एक समै बात चाली, कोई कह तीरथ को बड़ो धरम, कोई कह मावस को बड़ो धरम, कोई कह बारस को बड़ो धरम,कोई कह नवग्रह पूजा को बड़ो धरम। जाम्भोजी श्री वायक कहे-
शब्द-101 ओ३म् नितहि अमावस नित संकरांति, नितही नवग्रह वैसें पांति।
नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरु चीन्हे सहजै न्हाय।
निरमल पाणी निरमल घाट, निरमल धोबी मांड्यो पाट।
जे यो धोबी जाणै धोय, घर में मैला वसत्र रहै न कोय।
एक मन एक चित साबण लावे, पहरंतो गाहक अति सुख पावै।
ऊँचै नीचै करे पसारा, नहीं दूजै का संचारा।
तिल मैं तेल पहुप मैं वास, पांच तत मैं लियो प्रकाश।
बिजली के चमकै आवै जाय, सहज शून्य मैं रहै समाय।
नैयो गावै न यो गवावै, सुरगे जाते वार न लावै।
सतगुरु ऐसा तंत बतावै, जुग जुग जीवै बहुर न आवै।
नाथोजी उवाच-हे वील्हा! एक समय हम सभी भक्त मण्डली सम्भराथल पर श्री देव के निकट एकत्रित हुए थे। हमारे बीच में ही विवाद खड़ा हो गया था। हमारे में से कोई कहता था तीर्थ-सेवन स्नान का सबसे बड़ा धर्म है। दूसरा कहने लगा कि अमावस्या का व्रत रखना ही बड़ा धर्म है क्योंकि मैं अमावस्या का व्रत करता हूँ। तीसरा कहने लगा कि शास्त्रो में द्वादसी का महात्म्य अधिक बतलाया है। चौथा कहने लगा कि संक्रान्ति का दान पुण्य करना ही बड़ा धर्म बतलाया है। पाँचवाँ कहने लगा कि नौ ग्रहों की पूजा करना ही बड़ा धर्म बतलाया है।
“मुण्डे मुण्डे मति भिन्ना” जितने लोग थे उनका विचार भिन्न भिन्न ही था। कहीं कोई निर्णय पर नहीं पहुँच सका था तथा कोई भी अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं था। ऐसी दशा में श्री जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-
हे भक्तो! अमावस्या नित्य ही आती है। संक्रान्ति भी नित्य ही आती है। नौ ग्रह भी पंक्ति लगाये हुए नित्य ही आपके सामने उपस्थित हैं। तीर्थ शिरोमणि गंगा भी नित्य हिलोरे ले रही है। आपके निकट बहती है। आप लोग व्यर्थ में विवाद क्यों कर रहो हो? एक वाक्य को श्रवण कर के सभी विवादी प्रसन्न हो गये और हर्षित हो कर कहने लगे -
देवजी ने हमें जिता दिया है। हमारी ही बात का समर्थन किया है। आप लोग श्री देवजी की बात को समझ नहीं पाये हैं। नित्य प्रति अमावस्या एवं सक्रान्ति कहाँ आती है? ये तो एक माह बाद आती है। तथा नौ ग्रह भी एक साथ पंक्ति लगा कर कैसे बैठ सकते हैं? तथा तीर्थ गंगा स्नान आदि भी नित्य प्रति सुलभ कहाँ है। हे वील्हा ! इस प्रकार की वार्ता सुन कर श्री देवजी के सम्मुख हुए और कहने लगे-
हे महाराज! नाथोजी की बात का उत्तर चाहते हैं,आपने जो नित्य की बात कही यह तो असंभव है। श्री देवजी ने कहा-आप लोग ठीक कह रहे हैं। बाह्य गंगा स्नान अमावस्या का व्रत संक्रांति का पुण्य दान और नौ ग्रह नित्य एकत्रित हो सकते हैं, किन्तु जो व्यक्ति सद्गुरु चीन्हे सहजै न्हाय जो सद्गुरु को पहचानता है और सहज में ही ज्ञान में स्नान करता है। उसके लिए नित्य ही शुभ अवसर गंगा स्नानादि उपस्थित है।
सद्गुरु की पहचान एवं शरणागति हो जाये तो सहज में ही पुण्य का भागी हो जायेगा। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति हो जाएगी। छुपे हुए अपार आनंद की प्राप्ति संभव हो जायेगी। यही बड़ा धर्म होगा। यदि सद्गुरु परमात्मा का स्मरण अबाध गति से चलेगा तो उसके लिए जल स्वतः ही निर्मल (शुद्ध, पवित्र) हो जायेगा। उसके शरीर से छूकर जल भी गंगा जल हो जायेगा। भगवान् विष्णु के चरणों से निकली गंगा भी तो भगवान् के चरणों का स्पर्श करने से गंगा बन गयी।
ऐसा पवित्र आत्मा सतत विष्णु का भजन करने वाला जहाँ पर भी बैठेगा, जिस घाट स्नान पर विराजमान होगा, वह पृथ्वी भी उसके स्पर्श से तीर्थस्थल बन जायेगी। उसके निकट आने वाले भी वैर भाव को भूल जायेंगे। वह संत महापुरुष धरती और जल को तीर्थ बना देगा। शरीर में विराजमान जीवात्मा ही धोबी है। यह जन्मों-जन्मों के पाप को धो डालेगा। प्रथम विष्णु के स्मरण से पवित्र होगा तो अपने संचित पाप कर्मो को एक मन एक चित साबुन लगा कर चिपके हुए कर्मो को साफ कर डालेगा।
भगवान् ने यह शरीर रूपी दिव्य चादर प्रदान की है। इसके न जाने कितने जन्मों का मैल लगा है। इस लिए तो बार बार जन्म लेना एवं मरना पड़ता है। अबकी बार अपना उद्धार स्वयं ही कर लेगा। अपने घर में एक भी मैला वस्त्र (पाप कर्म) नहीं रहने देगा। द्विधा वृत्ति का त्याग तो तभी हो सकेगा, जब आत्म साक्षात्कार होगा। जब उसे एक बार दिव्य खजाने का पता लग जायेगा, तो फिर संसार के विषयों में नहीं भटकेगा। एकाग्र वृत्ति युक्त हो जायेगा। ऐसी दशा में शरीर रूपी वस्त्र में छिपी हुई जीवात्मा अति आनंद को प्राप्त होगी।
ऊपर नीचे चहुं दिस दृष्टि का प्रसार करेगा तो सर्वत्र वही एक ही सत्चित् आनंद रूप ब्रह्म दृष्टि गोचर होगा। जिस प्रकार से तिल में तेल एवं फूल में सुगंधी रहती है, उसी प्रकार से पाँचों तत्त्वों में उसी का ही प्रकाश विद्यमान है। आकाश, वायु, तेज, जल एवं धरणी से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है। उन्हीं पाँचों में ज्योति चेतनता उसी परमात्मा की ही है, ऐसा अनुभव करेगा।
मेघों से जब आकाश भर जाता है। वर्षा होने लगती है तो बिजली चमकने लगती है। वह एक क्षणिक ही होती है। उसी प्रकार से शरीर में भी जीवात्मा एक चमक ज्योति की तरह है। एक क्षण में ही शरीर में प्रवेश करती है तथा जब शरीर से जीव ज्योति बाहर निकलती है, तो बिजली के चमकारे की भांति अति शीघ्र ही आकाश शून्य में विलीन हो जाती है।
परम तत्त्व प्राप्त पुरुष परम शांत होता है। हे सज्जनो! तुम्हारी तरह उछल-कूद, वाद-विवाद नहीं करता। जब तक उस परम तत्त्व की प्राप्ति नहीं हुई है, तब तक वह अधूरा ही है। वह चाहे दुनिया की सभी वस्तुएँ प्राप्त क्यों न करले? अहंकार शून्य परम भक्त वह न तो किसी अन्य के गुणगान ही करेगा। न ही किसी के प्रशंसा के गीत ही गायेगा। और न ही अपने अहंकार की पुष्टि के लिये दूसरों से गवायेगा। ऐसा व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति में देरी नहीं करता है।
सद्गुरु कहते हैं कि मैं तुम्हें ऐसा तत्त्व बतला रहा हूँ। जीवन जीओगे तो युगों युगों तक युक्ति पूर्वक आनंदित होकर और शरीर शांत हो जायेगा तो पुनः जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आओगे। हे लोगो! यही धर्म महान् धर्म है। इसी का ही आचरण करो।
वील्हो उवाच-हे गुरु देव! आपने जाम्भोजी द्वारा उच्चरित शब्दों का बखान किया। उच्च कोटि के साधक की बात बतलायी। किन्तु साधारण जन के लिए अमावस्या व्रत, गंगा स्नान आदि का भी माहात्म्य बतलाने की कृपा करे। क्योंकि उनतीस नियमों में एक नियम अमावस्या का व्रत करने का भी तो है। यदि आपने विष्णु जाम्भोजी के श्री मुख से अमावस्या व्रत की विशेषता-माहात्म्य सुना है तो अवश्य ही बतलावें।
नाथोजी उवाच-एक समय सम्भराथल पर विराजमान श्री देवजी से मेरठ के राजा एवं साथरियों ने यही प्रश्न पूछा था। श्री देवजी ने अमावस्या व्रत का माहात्म्य बतलाते हुए एक प्राचीन इतिहास बतलाया था। वही मैं तुझे बतलाता हूँ।
काशी में सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी धर्मपत्नी एवं एक लड़का तथा एक लड़की ये चारों जने गंगा स्नान करते भगवान् का भजन परम्म श्रद्धा विश्वास के साथ करते। एक दिन उनके घर में एक यति आया। उन चारों जनों ने उनके चरणों में मस्तक झुकाया। उस यति ने उनको आशीर्वाद देते हुए इस प्रकार से कहा-प्रथम ब्राह्मणी को आशीर्वाद देते हुए कहा-सौभाग्यवती हो। जब उसकी कुंवारी कन्या ने मस्तक झुकाया तो यति ने कहा- चिरंजीव हो।
ब्राह्मणी ने पूछा-हे यति! ऐसा भेद क्यों? यति ने कहा-मेरा वचन असत्य न हो जाय इसीलिए मैंने जो होनहार है, वही कहा है। ब्राह्मणी बोली वह होनहार क्या है? यति कहने लगा-इस कन्या का पति जब चौथा फेरा लेगा, तब मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इसीलिए मैंने इसे सौभाग्यवती नहीं कहा।
ब्राह्मणी कहने लगी- हे यति! यदि आपको इस बात का पता है तो यह भी बतलावें कि क्या इसका कुछ उपाय भी हो सकता है? यदि कोई उपाय है तो अवश्य ही बतलावें। यदि ऐसी दुर्घटना हो गयी तो हम तो सभी रो-रो कर के मर जायेंगे।
यति उवाच-हाँ एक उपाय अवश्य ही हो सकता है। कदली वन में एक गूजरी रहती है वह धन ऐश्वर्य से संपन्न है। नित्य प्रति अभ्यागतों को भोजन देती है। जिसके यहाँ सदाव्रत चलता है। वह गूजरी अमावस्या का व्रत विधि विधान से करती है। यदि वह यहाँ आ जाये और एक अमावस्या व्रत का फल प्रदान कर दे, तो अवश्य ही तुम्हारी कन्या का पति जीवित हो जायेगा।
ब्राह्मणी उवाच- हे यति जी! आप ही प्रमाण हैं। किन्तु वह धन ऐश्वर्य से संपन्न हमारी गरीबों की झोंपड़ी में क्यों आयेगी?
यति उवाच- वह अन्य धनवानों जैसी मद में अंधी नहीं है। आप अवश्य ही जाओ। परोपकारी जीव है। अवश्य ही तुम्हारे दुःख से द्रवित होकर चली आयेगी। ऐसा कहते हुए वह यति तो चला गया।
वृद्ध ब्राह्मण ने अपने पुत्र को पास बुलाया और यति की बात बताते हुए कहा-हे बेटा! तुम कदली वन को जाओ और गूजरी को यहाँ बुला लाओ। मैं तो वृद्ध हो गया हूँ। मेरे से तो चला नहीं जाता है आज्ञाकारी बेटे ने अपने पिता की बात स्वीकार की और माता पिता को प्रणाम करके कदली वन को रवाना हुआ ।
बीच में अनेको वनों को पार करते हुए, वन की शोभा निहारते हुए, केई दिनों के पश्चात कदली वन में प्रवेश किया। गूजरी के स्थान को देखा और अति प्रसन्न हुआ। वहाँ पर सदा व्रत बाँटा जा रहा था। ऋषि, ब्रह्मचारी, साधु-संत भिक्षा लेने आते हैं। उन्हें प्रेम से भिक्षा मिलती है। वे लोग तो भिक्षा प्राप्त कर के चले जाते हैं, उन्हीं की लाइन में वह काशी का ब्राह्मण पुत्र खड़ा होकर भिक्षा प्राप्त कर लेता है। यह नित्य प्रति की क्रिया हो चुकी थी।
वह ब्राह्मण जिस कार्य हेतु आया था, वह तो सफल होता नहीं दीख रहा था। भीड़भाड़ में मिलना वह भी अपने स्वार्थ के लिए तो हो सकता है, असफ लता ही हो जाए। जब किसी भी प्रकार से गूजरी से मिलन न हो सका, ब्राह्मण ने मिलने का एक सरल उपाय ढूंढ निकाला। वह सेवा करना ही था। सेवा कार्य करना प्रारम्भ कर दिया।
ब्राह्मण ने देखा कि लोग पगडंडी पर आ जा रहे हैं, किन्तु मार्ग साफ नहीं है। मार्ग पर खात, गोबर, कंकड़, पत्थर, बिखरे पड़े हैं। चारों तरफ से घास उग आयी है। मार्ग छोटे हो गये हैं। सेवा का कार्य अपने आप ही खोज लिया और सेवा में लग गया। दिन में तो विश्राम करता और रात्रि में जब सभी सो जाते तो वह ब्राह्मण बालक मार्ग में सफाई करता। झाड़ू लगाता, कंकर पत्थर चुन चुन कर हटाता। घास काटकर मार्ग चौड़ा करता। आने जाने वाले आगंतुकों के लिए मार्ग सुमार्ग हो गया।
सभी ने आश्चर्य प्रगट किया कि ऐसा कौन परोपकारी होगा जो इस कार्य को संपन्न कर रहा है। धीरे धीरे बात गूजरी तक पहुँची। एक दिन गूजरी ने अपने सेवकों से कहा- वह कौन है जो सेवा कार्य कर रहा है? उसे पकड़ कर मेरे सामने उपस्थित करो। हमारे ऊपर बड़ा भारी अहसान हो रहा है। गूजरी का बात समर्थन कर के एक रात्रि में उस ब्राह्मण बालक को पकड़ कर के गूजरी के सामने उपस्थित किया। ब्राह्मण बालक तो मिलना ही चाहता था और उन्होंने यह कार्य सहज में ही करवा दिया। गूजरी उवाच- हे ब्राह्मण! आप कहाँ से आये हैं? किस हेतु आपके अयोग्य यह कार्य कर रहे है? हमारे ऊपर भार चढा रहे हैं।
ब्राह्मण उवाच- हे गूजरी! मैं बहुत ही दूर देश काशी से चल कर आया हूँ। हमारे घर पर एक यति आया था। उन्होंने मेरी बहन के पति की मृत्यु विवाह के चौथे फेरे में बतलायी है। आप कृपा कर चलें, तथा यति के अनुसार एक अमावस्या के व्रत का फल अवश्य ही प्रदान करें। आप हमें सभी को बचा लें। मैं आपको अपनी बहन के विवाह में निमंत्रण देने आया हूँ।
गूजरी उवाच-अवश्य ही मैं आऊँ गी। आपके परोपकार- सेवा का कार्य करने से हमारे ऊपर ऋण चढ गया है। उसे मैं आकर अवश्य ही चुकाऊँ गी। आप सहर्ष अपने देश वापिस जाओ। तुम्हारी बहन का विवाह जब तय हो जाये, तब मेरे कों पत्र लिख देना। मैं अवश्य ही आऊँ गी। मैं कुछ करने वाली नहीं हूँ। जो कुछ करेंगे, वह भगवान् ही करेंगे। ऐसा कहते हुए गूजरी ने ब्राह्मण बालक को विदा किया।
अपने आने का प्रयोजन सफल हुआ मान ब्राह्मण बालक सहर्ष वापिस काशी लौट आया और अपने माता-पिता को कुशल समाचारों से अवगत करवाया। कुछ दिन व्यतीत होने के पश्चात् ब्राह्मण ने गूजरी को पत्र लिखा-सिद्ध श्री गूजरी जोग, तुम हमारे देश में पधारोगे तो हमारा रोग कटेगा। आप तो करुणामयी परोपकारी हैं। कदली वन की निवासी देवी, हमने विवाह लग्न लिख दिया है। हम आपको अपने स्वार्थ हेतु कष्ट देते हैं। किन्तु आप तो सदा हरि के गुणगान में अपना समय व्यतीत करती हो। हमारे अपराध को क्षमा करें। समय पर अवश्य ही पधारना। आपके आने में ही हमारा जीवन है, अन्यथा मृत्यु है। कागज देकर एक वाहक को भेजा। गूजरी ने कागज पढा और अपने बेटे बहू को पास बुला कर कहने लगी-
हे बहू ! मैं काशी जा रही हूँ । एक महीने में लौट कर आऊँगी। वहाँ पर मैं अर्जित पुण्य का दान करने जा रही हूँ। हो सकता है पीछे कुछ अनहोनी हो जाये तो घबराना नही। अपने घर का कार्य ठीक ढंग से करती रहना। अपना नियम-मर्यादा नहीं तोड़नी, मैं अति शीघ्र ही लौट आऊँगी।
इधर कदली वन से गूजरी ने काशी के लिये प्रस्थान किया और उधर काशी में सोमदत ब्राह्मण के घर विवाह कार्य प्रारम्भ हो गया। विवाह का समय आ चुका था। विप्रगण वेद मंत्रों का उच्च स्वर से उच्चारण करने लगे। अग्नि में आहुति दी जाने लगी। ज्यों ज्यों समय निकट आने लगा त्यों त्यों सोमदत की चिंता बढने लगी। वह समय तो निकट आ गया है, किन्तु अब तक गूजरी नहीं आयी। न जाने क्या होगा?
वरवधू अग्नि की परिक्रमा करने लगे। ज्योंहि चौथी परिक्रमा पूरी करी त्योंही वह वर बेहोश होकर धरती पर गिर पड़ा। प्राण पखेरू उड़ गये। सोमदत विलाप करने लगा-चारों ओर हाहाकार होने लगा। यह क्या हो गया? उसी समय ही उपस्थित महिलाओं के बीच में से गूजरी उठी और हाथ में जल लेकर संकल्प किया और कहा-
हे भगवान् विष्णु! हे अग्नि देवता! यदि मैंने मन, वचन, कर्म एवं श्रद्धा से अमावस्या का व्रत पूर्ण विधि विधान से किया है, तो मैं एक अमावस्या का फल इस वर ब्राह्मण को देती हूँ। यह ब्राह्मण जीवित हो जाये। ऐसा कहते हुए जल छिड़का और वह ब्राह्मण उठ खड़ा हुआ। ओ३म का उच्चारण करने लगा। कहने लगा न जाने क्यों मुझे मूर्छा आ गयी थी।
चारों ओर पुनः गाजे-बाजे, वेदों की ध्वनि का प्रसार होने लगा। सभी ने गूजरी के अमावस्या के व्रत का फल प्रत्यक्ष देखा और जय जयकार करने लगे। गूजरी तत्काल वहाँ से रवाना हुई। उन लोगों ने बहुत रोका आदर किया किन्तु कहने लगी-मुझे अतिशीघ्र वापस जाना है। मार्ग में चलते-चलते गूजरी ने एक गाँव में तालाब के किनारे डेरा लगाया और पूछा कि आज क्या तिथि है? ज्योतिषियों ने बतलाया कि आज तो चतुर्दशी है। कल पूर्ण अमावस्या है। गूजरी ने जिस अमावस्या का फल प्रदान किया था, उसकी पूर्ति वहाँ पर अमावस्या का व्रत करके की और वापिस अपने घर आ पहुँची। वहाँ पर बड़े बेटे की बहू ने कहा-श्वासु जी! आपके बड़े बेटे को तो न जाने क्या हुआ? वे तो हिलते डुलते भी नहीं हैं। मैंने तो आपकी बात पर विश्वास किया है। अब तो आप ही प्रमाण हैं। गूजरी ने बेटे के शयन कक्ष में जाकर देखा तो वह तो मृत था। गूजरी ने अपनी झारी से जल लेकर उन पर छिड़का और अमावस्या के व्रत के प्रभाव से पुनः जीवित किया।
हे वील्हा! इस प्रकार का माहात्म्य श्री देवजी ने बतलाया था। वह मैंने तुझे बतला दिया है। इसलिए उनतीस नियमों में एक नियम है कि अमावस्या का व्रत करो। जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव है। तुरंत फल देने वाला है। वेदों में कहा “अमावस्या देव मातरम्” अमावस्या देवताओं की माता है। जब अमावस्या की रात्रि में सूर्य चन्द्र दोनों का ही प्रभाव धरती पर समाप्त हो जाता है तो देव माता अमावस्या का प्रभाव रहता है। सूर्य-चन्द्र एवं अमावस्या ये तीनों ही देवताओं की आँखें हैं। अमावस्या के दिन एवं रात्रि में चन्द्रमा सर्वथा ही लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा अमृत की वर्षा करता है। चन्द्र किरणों द्वारा हमें संजीवनी शक्ति प्रदान करता है। उसी से ही सम्पूर्ण सृष्टि में स्थित वनस्पति, मानव, पशु, पक्षी आदि का विकास एवं प्रफु ल्लता आती है।
अमावस्या के दिन चन्द्र से वंचित होने से व्रत करना चाहिये। उस दिन किया हुआ भोजन विकार पैदा करता है। शरीर के भोजन प्रतिकूल होता है। चूंकि अमावस्या रात्रि देवत्व शक्ति विहीन होती है तो उस रात्रि में भूत- प्रेत- राक्षस आदि बलवान हो जाते हैं। हमारी दैवी शक्ति मंद हो जाती है। इसीलिए अमावस्या का व्रत करके हवन यज्ञ, पूजा पाठ, आदि देवता संबंधी कार्य ही करे। सांसारिक कार्य न करे, जिससे कि हम प्रेतादिक से पीड़ित हो जाये।
वेदों ने आदेश दिया है कि “दर्श पौर्णमास्यां यजेह्म्9” अमावस्या एवं पूर्णमासी को यज्ञ करे। शुभ कार्य ही करे। पर्व दो ही हैं एक अमावस्या दूसरी पूर्णमासी। यज्ञ तो दोनों में ही करे। अनन्त गुणा फलदायी है। किन्तु व्रत अमावस्या का ही करे। पूर्णमासी का व्रत करने का विधान नहीं है, क्योंकि पूर्ण चन्द्रमा को तो खीर बनाये और भोजन करे यही उत्तम होगा।
जाम्भोजी ने उन्नतीस नियमों में एक नियम बताया है कि “अमावस्या का व्रत राखणौ, भजन विष्णु बतायो