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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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दसवां अध्याय · कथा 71

एक योगी के प्रति योग वचन

जोगी एक ज आवियों, जम्भ गुरु के पास।

हाथ जोड़ बोलत भयों, सूधो वचन प्रकाश।

गुदड़ी धर बैठत भयों, कीन्हौ एह विचार।

रूप तुम्हारे जोग निध, कृस कैसे किरतार।

एक योगी श्री जाम्भोजी के पास सम्भराथल पर आया। हाथ जोड़ कर कुछ वचन बोलने लगा - और फिर गुदड़ी धर कर बैठ गया। जाम्भोजी की क्रियाएँ देखी और फिर कहने लगा- हे योगी! आपका स्वरूप तो योग सिद्ध पुरुष तुल्य दैदीप्यमान है। किन्तु आपका शरीर दुर्बल क्यों है? इस दुर्बलता का क्या कारण है? श्री देवजी ने उस योगी को सचेत करते हुए शब्दोच्चारण किया-

शब्द-115 ओ३म् म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियो, मेरा कारण किरिया देखो।

बिन्दो ब्योहरो ब्योर बिचारो, भूलस नांही लेखो।

नदिये नीरूं सागर हीरूं, पवणा रुप फिरे परमेश्वर।

बिंबै बैला निश्चल थाघ अथाघूं, उमग्या समाघूं।

ते सरवर कित नीरूं, गहर गम्भीरूं।

खिण एक सिद्धपुरी विश्राम लियो,

अब जु मंडल भई अवाजूं। म्हे शून्य मंडल का राजूं।

श्री जम्भेश्वरजी ने कहा-हे योगी! मैं तो आप स्वयं गरीबी रूप में रहता हूँ, क्योंकि मुझे बाह्य सांसारिक किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। शरीर नाशवान है, तो शरीर पर किया जाने वाला शृंगार भी तो नाशवान ही होगा। जैसा यह प्राकृतिक स्वाभाविक शरीर है, यही अच्छा है। इसे सजाने संवारने की अधिक आवश्यकता नहीं है। हे योगी! मैं तो शरीर धर्म से ऊपर उठ कर परमात्मा में रमण करता हूँ। यह मेरा शरीर ही गूदड़ियां है। जिस शरीर रूपी गुदड़ी ने आत्मा रूपी परमात्मा को अंदर बैठा रखा है। इस आत्मा की रक्षा के लिए ही शरीर रूपी गुदड़ी मेरे लिए प्राप्त है। इसीलिए मुझे किसी प्रकार की गुदड़ी की आवश्यकता नहीं है। मेरे शरीर को क्यों देखते हो? मेरे शरीर में होने वाली क्रियाओं को देखो। जो अंदर की भावना होगी, वही शरीर की क्रियाओं द्वारा बाहर प्रगट हो जायेगी। इस लिए क्रियाओं को देखकर अंदर की भावना पढी जा सकती है। बिन्दु शून्य है, यह ओम शून्य में ही ध्वनित होता है। सम्पूर्ण सृष्टि के प्रलय में भी एक शून्य ही बचता है। वही शून्य ही आत्मा-परमात्मा का रूप है। इसीलिए श्री देवजी कहते हैं कि मेरी दृष्टि सदा शून्य में ही विचरण करती है। संसार रूप में कभी परिवर्तित नहीं होती। तब मुझे संसार की वस्तु की उपादेयता नगण्य मालूम पड़ती है। विचार शून्यावस्था ही समाधि है। श्री देवजी कहते हैं कि मैं सदा ही समाधि में ही स्थित रहता हूँ।

हे योगी! यही योगी के लिये लेखा-जोखा है। इसे भूले नहीं। सदा ही जाग्रत बना रहे। कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ आ जाये, किन्तु ब्रह्म से वृत्ति चलायमान न हो। वह सर्वत्र व्यापक परमात्मा नदियों में जल रूप में विद्यमान है। सागर में सार तत्त्व हीरे के रूप में अवस्थित है। तथा वह पवन के रूप में परमेश्वर ही सर्वत्र व्यापक हो रहा है। आकाश तथा वायु से कहीं जगह खाली नहीं है। उसी प्रकार से वह परमात्मा भी कहीं भी अविद्यमानता प्रकट नहीं करता।

सूर्य उदय एवं अस्त बेला ही संध्या की बेला है। ऐसे समय में साधना करना उपयोगी है। इस पवित्र बेला में निश्चल हो जाये। सम्पूर्ण प्रकृति भी संध्या बेला में कुछ समय तक शांत हो जाती है। सृष्टि तथा सृष्टि के जीवों का हलन-चलन रुक जाता है। उस समय में एकान्त में बैठकर श्रद्धा पूर्वक मन को एकाग्र करें। न थकने वाले मन को थकायले। तो उस असीम अपार परब्रह्म स्वरूप आत्म तत्त्व की प्राप्ति की जा सकती है।

ऐसी स्थिति जब भी आयेगी तब हृदय में आनंद की लहरें उठेंगी। आत्मानन्द ही सर्वोतम आनंद है। सांसारिक आंनद कुछ भी नहीं है। वह तो क्षणिक सुख है। आनंद का आभास मात्र है। उमंग की लहरों में संसार को भूल जायेगा तो उस परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग सहज में ही मिल जायेगा। ऐसी दशा बड़ी ही अनमोल, अनिर्वचनीय है। किसी की भी बराबरी नहीं की जा सकती। संसार का सुख तो गए के गंदे जल जैसा है। हमारी आनंद की लहरें-उमंग तो समुद्र की लहरों की भांति उच्च कोटि की हैं। समुद्र की लहरें गहरी तथा गंभीर हैं।

हे योगी! एक क्षण में ही मैं समाधिस्थ हो जाता हूँ। जहाँ सिद्ध लोगों की वृत्ति परमात्मा में रमण करती हैं, वहीं पर मेरी वृत्ति भी स्थिर हो जाती है। सम्पूर्ण मंडल की मधुर ध्वनि ऐसी दशा में सुनी जा सकती है। कौन कहाँ पर क्या बोलता है? किसके मन में क्या भावना उठती है? उन्हें जाना जा सकता है। क्योंकि चित्त की वृत्ति सर्वत्र हो जाती है। तो सर्व ही जाना जा सकता है। बाह्य वृत्ति जब सांसारिक होती है, तो वह वृत्ति अल्पज्ञ हो जाती है। एक देश तथा एक देश में वृत्ति सीमित होने से एक ही देश को देखा जा सकता है। सुना जा सकता है। इसलिए हे योगी! मैं तो शून्य मंडल का राजा हूँ। तुम्हारी तो वहाँ तक पहुँच ही नहीं है।

हे वील्ह! इस प्रकार से योगी ने एक ही सार गर्भित शब्द सुना, तो योगी के मन में शांति आ गयी। मुद्रा कानों से निकाल कर रख दी और भेख को छोड़ कर बिश्नोइयों की पंक्ति में जाकर बैठ गया। इस प्रकार से सन्मार्ग से भटका हुआ एक योगी बिश्नोई बना तथा सत्पंथ का पथिक बन कर जीवन का उद्धार किया।