चौथा अध्याय · कथा 41
चित्तौड़ की कथा
वील्हो उवाच-हे गुरु देव! आपने अब तक अनेकानेक भक्त, योगी की कथाओं द्वारा श्री जाम्भेश्वरजी के जीवन चरित्र का वर्णन किया, जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। अब आगे मैं उस समय के राजा लोगों के बारे में सुनना चाहता हूँ। वे राजा लोग जाम्भोजी के सम्पर्क में अवश्य ही आये होंगे। उन्होंने किस प्रकार से शिष्यत्व स्वीकार किया। क्योंकि राजा लोग तो बहुत ही रजोगुणी होते हैं। उनमें काम, क्रोध तथा लोभ आदि कहीं ज्यादा ही होते हैं। उनके लिए समर्पण होना कठिन ही है।
नाथोजी उवाच- हे शिष्य! जाम्भोजी की शरण में तत्कालीन सभी राजा लोग आये थे उन्होंने शिष्यत्व भी स्वीकार किया था। यह जाम्भोजी का कृष्ण चरित्र ही था। कृष्ण चरित्र से अनहोनी भी होनी हो जाती है। असंभव भी संभव हो जाता है। अनेक राजाओं की विचित्र कथाओं में सर्वप्रथम मैं तुझे चित्तौड़ नरेश सांगा राणा एवं उनकी माता झालीराणी की कथा सुनाता हूँ।
“एक समै पुरब का शिसनोई बालद्य लादी चित्तौड़ आया। सांग राण दांण मांग्यौ। बिसनोइया नां कारयौ। झालीराणी कह जाम्भोजी न पूछो। जोड़ बकस्यौ। जांभाजी झारी, माला, सुलझावणी दीन्ही। झाली नु जलम सोझ पड़ी। झाली नुं सबद सुणायो। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
शब्द-63 ओ३म् आतर पातर राही रुक्मण, मेल्हा मंदिर भोयो।
गढ़ सोवनां तेपण मेल्हा, रहा छड़ा सी जोयो।
रात पड़ंता पाला भी जाग्या,दिवस तपंता सूरूं।
उन्हा ठाढा पवना भी जाग्या, घन बरसंता नीरूं।
दुनीतणा औचाट भी जाग्या, के के नुगरा देता गाल गहीरूं।
जिहि तन ऊंना ओढ़ण ओढ़ां, तिहिं ओढ़ंता चीरूं।
जां हाथे जप माली जपां, तहां जपंता हीरूं।
बारां काजै पड़यो बिछोहो, संभल संभल झूरूं।
राघो सीतो हनुवंत पाखो, कौन बंधावत धीरूं।
मागर मणियां काच कथीरूं, हीरस हीरा हीरूं।
विखा पटंतर पड़ता आया, पूरस पूरा पूरूं।
जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरस सूरा सूरूं।
दुखिया है जे सुखिया होयसैं, करसैं राज गहीरूं।
महा अंगीठी बिरखा ओल्हो, जेठ न ठंडा नीरूं।
पलंग न पोढण सेज न सोवण, कंठ रूलंता हीरूं।
इतना मोह न मानै शिंभु, तहीं तहीं सूसीरूं।
घोड़ा चोली बाल गुदाई, श्री राम का भाई गुरु की वाचा बहियो।
राघो सीतो हनवंत पाखो, दुःख सुख कासूं कहियों।
एक समय पूर्व देश के बिश्नोई प्रमार, औधियां, उमरा आदि गोत्र के लोग व्यापार करने हेतु अनेक देशों में भ्रमण करते हुए अपनी बैलगाड़ियों पर सामान लेकर चित्तौड़ नगरी की राज्य सीमा में प्रवेश किया। जाम्भोजी ने उनको बिश्नोई बनाया था। उन लोगो ने अपनत्व छोड़ दिया था और बिश्नोई पंथ में सम्मिलित हुए थे। अपना पुश्तैनी धन्धा, व्यापार करना त्याग नहीं किया था। बिश्नोई बनकर गुरु की शरण में आ गये थे। अब वो लोग किसी से भी डरते नहीं थे। सभी देशों में निर्भय होकर भ्रमण करते थे। एक देश से दूसरे देश में वस्तु को ले जाना, क्रय-विक्रय करना, लाभ कमाना उससे अपनी आजीविका चलाना ही उनका अपना कर्म था।
इस प्रकार से कार्य करते हुए एक समय बिश्नोई व्यापारी जमात चित्तौड़ पहुँच गयी। चित्तौड़ में वस्तुओं की बिक्री की। लाभ का सौदा किया। दरबार में खबर हुई कि पूर्व देश के व्यापारी लोग सौदा बेच रहे हैं। चित्तौड़ के राजा सांगा ने अपने लोगो को भेजा और बिश्नोइयों से कर माँगने का आदेश दिया।
जब डाण (कर) माँगने वालों ने अन्य व्यापारियो की भांति बिश्नोइयों से भी कर माँगा तो बिश्नोई कहने लगे-हे भाई! आप लोग हम से कर माँगने वाले कौन होते हो? कहाँ से आये हैं? उन कर्मचारियों ने कहा-हमें राजा साँगा ने भेजा है। इस देश की सीमा में व्यापार करने वाले व्यापारी को कर चुकाना होता है। तभी आप लोग वस्तु का व्यापार कर सकते हो।
बिश्नोईयों ने कहा-जाम्भोजी के शिष्य बिश्नोई हैं। धर्म-कर्म का पालन करने वाले हैं। हमारे तो पातस्याह एक जाम्भोजी हैं “सर्व भूमि गोपाल की” अन्य कोई नहीं है। हम तो केवल जाम्भोजी की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। आपको कर नहीं देंगे।
राज कर्मचारी कहने लगे-हे बिश्नोइयों! राणा सांगा की पातस्याही में ऐसा कौन सा जबरदस्त है, जो कर नहीं देगा। आपको पता होना चाहिये की सिर पर पातस्याह तप रहा है। यदि कर नहीं देना है, तो पातशाह के पास ही चलो। ऐसा कहते हुए उन कर्मचारियों ने बिश्नोइयों को राजा के सामने उपस्थित किया।
राणा कहने लगा-आप लोग कौन होते हैं? मैं आपको देखकर समझ नहीं पा रहा हूँ। तुम्हारी जाति क्या है? राणा क्रोधित होकर कहने लगा-मैं कर छोड़ूँगा नहीं। मैं छोड़ भी कैसे दूँ। न ही तुम्हारा भेष साधु का है। इसलिये साधु सन्यांसी तुम लोग हो नहीं। न ही तुमने अब तक कोई विशेष बलिदानी कार्य ही किया है। न ही धर्म रक्षार्थ प्राणों को निछावर ही किया है। न ही आप लोगों ने ब्राह्मण आदि का वेश बनाया है।
राजा कहने लगा-आप लोग डाण देवो तभी पीछा छूटेगा। धर्म रक्षार्थ ब्राह्मण,चारण, भाट ये लोग बलिदान दे देते हैं। इसलिये उन्हें डाण माफ होता है। आप लोगों में तो ऐसा कुछ भी नहीं है। बिश्नोई कहने लगे हे राजा! यदि आप क्रोध न करें तो हम आप से बात कहें। आप लोग जिनके बलिदान की बात कहते हैं, जिन्हें आप धार्मिक बतला रहे हैं, उनसे कहीं अधिक हमारा यहाँ पर बलिदान होगा। हम लोग डाण नहीं देंगे किन्तु अपना बलिदान देंगे।
हे राणा! बिश्नोइयों से आप जबरदस्ती न करें। आप न्यात जमात को एकत्रित कर लें, सभी से पूछ लें। हम बलिदान देने वाले धर्म प्रेमी जन हैं। हम से जगात नहीं ली जाती है। राणा कहने लगा-हमने सुना है कि धर्म रक्षार्थ बलिदान हो जाते हैं, वे लोग आप नहीं दूसरे होते हैं।
चारण, भाट, ब्राह्मण,योगी,याचक,और भगवान् ये लोग तागा करते हैं। अपने शरीर को भी तुच्छ मान कर त्याग देते हैं, किन्तु बिश्नोई नहीं।
बिश्नोई कहने लगे-हमारा तागा (बलिदान) तो जगत प्रसिद्ध है। हमसे तो अन्य राजा लोग भी डाण नहीं लेते हैं। अजमेर के करमसी पंवार,जैसलमेर के राजा जेतसी, नागौर का महमद खां,फलोदी के राव हमीर, मेड़ते का राव दूदा, जोधपुर का राव सांतल,जगता,गोपाल, अन्य पातस्याह, खाना, खोजा, मीलका, मीर आदि सभी राजा पातस्याह, हकीम आदि बिश्नोइयों से डाण नहीं लेते।
इस महि मंडल में जाम्भोजी की मर्यादा कौन मिटा सकता है? हे राणा! हम लोग बलिदान करकह्य आँखों से दिखायेंगे। संभल कर विचार से बात कीजिये। तीन दिन के पश्चात् हम लोग सभी लोग शरीर को छोड़ देंगे किन्तु डाण नहीं देंगे। हमने तो कर्ता-धर्ता विष्णु जाम्भोजी से कवल किया है। अपने नियम धर्म को नहीं छोड़ेंगे, किन्तु बलिदान दे देंगे। ऐसा कहते हुए बिश्नोइयों ने पवली द्वार पर धरना दे दिया। तन-मन-धन त्याग कर मरने को तैयार हो गये।
नगरी के कई लोग भयभीत हुए ज्यों-ज्यों लोग भयभीत होने लगे त्यों-त्यों बिश्नोइयों में मजबूती आने लगी। जब राणा से बात नहीं संभली, तो बात राणा की माँ झालीराणी तक पहुँची। रानी ने सुना कि मात्र डाण के लिये बेटे ने साधु पुरुषों को सताया हैं। यदि ये लोग बलिदान हो गये तो बड़ा भारी अपराध हो जायेगा। ये संत पुरुष तो पीछे हटने वाले नहीं हैं। मुझे ही कुछ करना चाहिये।
साधु-सज्जनों की तो रानी सेवक थी। उन्हें इन पर दया आयी,किन्तु रानी तो सामने नहीं आती। परदे में रहती है। इनका कष्ट दूर कैसे किया जावे। करुणामयी माता झाली राणी पड़दे की परवाह न करके महलों से नीचे उतरी। अपनी सहेली के साथ राणी पड़दे में खड़ी हुई। अपने प्रधान पुरुष को पास बुलाया और कहने लगी-
हे प्रधान-तुम जल्दी जाओ और उन तागाला बिश्नोइयों को मेरे पास बुला लाओ। प्रधान पुरुष ने उन बिश्नोइयों से कहा-रानी आप पर प्रसन्न हैं, उन्होंने आप को बुलाया है। अभी अति शीघ्र चलो। रानी से सवाल-जबाब करो। तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा। अति शीघ्र ही बिश्नोई प्रधान के साथ राजमहल में रानी के सामने हाजिर हुए और रानी को आशिष दी।
रानी ने जाम्भाणी लोगों से पूछा-हे भाइयो! मैं आपकी बहन हूँ। आप मुझे सत्य बतलाओ कि आप किस जमात के हैं? कौन तुम्हारा गुरु एवं मार्ग है? पूजा जप किसकी करते हो? सेवा-चाकरी किसकी करते हो? आप लोग हिन्दू हो या मुसलमान? किस धर्म में आप चलते हो?
बिश्नोई कहने लगे-हम लोग विष्णु के उपासक बिश्नोई हैं। विष्णु जाम्भोजी ही हमारे इष्ट देवता हैं। सम्भराथल पर विराजमान जाम्भोजी ही हमारे सद्गुरु हैं। सतपंथ के हम अनुयायी हैं। हम लोग धर्म पर चलने वाले हैं क्योंकि हमारे श्री देव जी ने सर्व प्रथम दया धर्म बतलाया है। बाहर भीतर एक रस, कपट भाव का परित्याग,बतलाया है। जैसा कहना, वैसा ही आचरण बतलाया है। तीर्थो में जाकर स्नान करना बतलाया है। दान, तप, शील, शुद्ध भाव इन चार नियमों पर चलने का आदेश दिया है।
झाली ने यह वार्ता सुनी तो कहने लगी-ये तो सभी हिन्दुओं के मुख्य धर्म हैं। ऐसी वार्ता सुनकर अति प्रसन्न हुई। कहने लगी-हे भाई लोगो! तुम्हारे पर गुरु की अपार कृपा है। तुम्हारे सिर पर भगवान् का हाथ है। कौन क्या बिगाड़ सकता है? रानी के मधुर वचनों को सुनना तो बिश्नोइयों के लिए अमृत तुल्य प्रतीत हुआ।
बिश्नोई कहने लगे-पार ब्रह्म परमात्मा स्वयं सम्भराथल पर प्रगट रूप से विराजमान हैं, जो सभी के चित्त में बस गये हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो जगत प्रकाशित करने के लिये सूर्योदय ही हो गया।
सृजनहार स्वयं शिव रूप से सम्भराथल पर प्रगट हुए हैं। स्वयं सृष्टि के कर्ता ने दिव्य शरीर धारण किया है। जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। वार्तालाप कर सकते हैं। परमात्मा धरती, आकाश, सप्त पताल आदि में सभी जीवों को संभाला है।
तब रानी ने पूछा-वह पूर्ण पुरुष किस देश में प्रगट हुआ है? बिश्नोइयों ने कहा-उत्तम बागड़ देश धोरों की धरती सम्भराथल पर प्रगट हुए हैं। उनसें भेंट-मिलन सभी जातियों के लोगों की होती है। दर्शन करने हेतु जमात वहाँ पर एकत्रित होती है। अनेकानेक जिज्ञासा प्रगट करते हैं। उनका दर्शन-स्पर्श करके लोग अपना कार्य सिद्ध करते हैं। लोग उत्तम सौदा व्यापार कर रहे हैं। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सभी सेवा करते हैं। दया स्वरूप देव की पहचान ही है। चारों तरफ चाव (उत्साह) फैला हुआ है। राव,रंक,पातस्याह,अनेकानेक सच्चे मार्ग के अनुनायी बने हैं। बिश्नोई कहने लगे-हम भी उसी जमात के लोग हैं। श्री देव का दर्शन, स्पर्श, पाहल लेकर कृतार्थ हुए हैं। बिश्नोइयों ने जब विधि पूर्वक वार्ता का बखान किया और झाली ने प्रेम पूर्वक श्रवण किया । रानी ने अन्तर्भाव से सतगुरु को पहचान लिया कि है तो साक्षात् सिरजनहार ही। प्रगट रूप से रानी ने कहा-
हे भाई लोगो! देवजी तो दया रूप हैं। आप लोग प्राण मत त्यागो। मेरे अन्तर में आर्त भाव जग गया है। मैं इस समय प्रार्थना कर रही हूँ कि विपति स्वयं जाम्भोजी ही मिटावे। आप लोग भी भगवान् से अर्ज करो कि इस विपत्ति से किस प्रकार से छूटें?
रानी कहने लगी-देवजी का प्रताप पक्का है। यदि वो जगात-कर दिलावे तो देना है यदि वो नहीं दिलायेगें तो हम आप से डाण नहीं लेंगे। किन्तु यह बात उनसे पूछने से ही प्रमाण होगी। बिश्नोई बन्धुओं ने रानी से अरदास की कि तब तक हमारे बैल बिना घास के भूखे कैसे रहेंगे। गुरु से पूछ कर आने में तो कुछ दिन लगेंगे। हम लोग अपना दुःख आपके सामने कह रहे हैं।
उनकी विनती सुन कर रानी के मन में प्रेम भाव जगा और बैलों को चरने के लिये घास वाला जंगल सौंप दिया। और कहा-यहाँ पर तुम्हारे बैल घास चरेगे, सुखी रहेंगे। आप लोग सम्भराथल पर उनसे पूछकर आओ। मेरे लिये श्री देवजी क्या आज्ञा देते हैं, यही पता करके आना है। रानी कहने लगी -जीवों के मालिक की यदि इच्छा होगी तो हमारे राज्य में धन की कोई कमी नहीं रहेगी। वो ही देने वाले हैं और दिलाने वाले भी वही हैं। उनका दिया हुआ हम कितना ही खर्च करेंगे, तो भी कम नहीं पड़ेगा। रानी साधु संतो की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझती थी। इसी दया भाव से बकसीस प्रदान कर दी। शायद इसी आशा से कि देवजी हमें इनसे डाण अवश्य ही दिलायेंगे। इसलिये घास वाला खेत दे दिया। बिश्नोइयों ने रानी का विश्वास हासिल किया और बैल घास चरने लगे।
रानी कहने लगी आप जल्दी ही देवजी के पास जाओ। दो तो जाम्भाणी जायेंगे और दो व्यक्ति विश्वास पात्र राज दरबार से जायेंगे। ये चारों जाकर जाम्भोजी से संदेशा लेकर अति शीघ्र आयेंगे। न जाने कितने दिन लगे होंगे, किन्तु शीघ्र ही देवजी के पास सम्भराथल पर चारों लोग पहुँच गये।।
रानी द्वारा दी हुई भेंट देवजी के सामने रखी और अरदास करते हुए कहा-हे देव! चित्तौड़ के राणा सांगा ने हमसे डाण माँगा है। झाली रानी ने हमको यहाँ पर भेजा है। हमें क्या करना चाहिये? इसमें आप ही प्रमाण हैं। देवजी ने उन लोगों को बिठाया और सान्त्वना दी। मैं अवश्य ही कुछ बतलाऊँगा तब तक आप बैठें।
गंगा पार से बिश्नोइयो की एक जमात सतगुरु के चरणों का दर्शन स्पर्श करने हेतु चली। बिश्नोई आनन्द में अभिभूत होकर चले थे। मार्ग में एक रात्रि भीयें के गाँव में निवास किया। वहाँ भीयें से भेंट हो गयी। भींयां वाराणसी में विद्या पढा था। भींयें ने पूछा कि आप लोग कहाँ जा रहे हो? बिश्नोइयों ने कहा-कि हम लोग बागड़ देश जा रहे हैं। वहाँ पर साक्षात विष्णु का ही अवतार हुआ है। उनका दर्शन,स्पर्श,शब्द,श्रवण करके जीवन का लाभ उठायेंगे।
भींयें ने विद्या तो पढी थी, किन्तु हृदय का ताला अब तक खुला नहीं था। कुतर्क करने में वह चतुर था। श्रद्धा विश्वास नहीं था। मैं पण्डित हूँ। इसलिये सभी का पूज्य हूँ। यही अहंकार भींयें को ज्ञान से दूर हटाह्म था। वह व्यर्थ का बकवास करता था। बिश्नोइयों से ज्ञान की वार्ता करने लगा।
भींयां कहने लगा-आप लोगों को किसी ने भरमाया है। ये बातें आपने किसी अनपढ योगी साधु द्वारा सुनी होगी कि सम्भराथल पर अवतार हुआ है। आप लोग सार तत्त्व नहीं जानते। आप लोगों ने शास्त्र नहीं पढे हैं। कलयुग में तो एक ही अवतार होगा, वह भी कलयुग के अन्त में, जो कलयुग की करणी करता है वह कलयुग से पार कैसे होगा?
बिश्नोई कहने लगे हे भींयां! हम अधिक व्यर्थ की वार्ता आप से कर के समय बर्बाद नहीं करना चाहते। आप ही हमारे साथ ही चलो। वहाँ आँखों से देखोगे तो स्वयं ही पता चल जायेगा। बिश्नोइयों की बात स्वीकार करके भींयें ने हाथ में पुस्तक ले ली और कहने लगा -
हे बिशनोइयों! मैं प्रण करके साथ चल रहा हूँ। आप लोग भी अपने प्रण के पके रहना। कहीं बीच में ही प्रण नहीं त्याग देना। इस प्रकार से विवाद करते हुए वह दिन व्यतीत हो गया। इसलिये उस दिन जमात उसी गाँव में ही रुक गयी। भींयें की धर्म पत्नी कहने लगी-हे पतिदेव ! हठ छोड़ दो। विवाद न करो। ये हमारे जमीनदार लोग हैं। जैसा ये कहते है, वैसा स्वीकार क्यों नहीं करते? ऐसा वचन अपनी नारी का सुनकर भींया नाराज हुआ, किन्तु अपना हठ नहीं छोड़ा।
प्रातःकाल बिश्नोइयों की जमात के साथ ही भींयों अपने पुस्तक शास्त्र लेकर गाड़ी पर बैठ गया। बहुत दिन चलने के पश्चात् भींयो जमात के साथ सम्भराथल पर पहुँचा। सभी ने अपनी अपनी भेंट गुरुदेव के सामने रखी। चरण स्पर्श किया। किन्तु भींये ने अहंकार वश न तो प्रणाम किया और न ही कुछ भेंट ही रखी।
भींया सतगुरु के सन्मुख हुआ और “ द ” का अर्थ पूछा। सतगुरु ने “द” के चार अर्थ बताये। पहला अर्थ दान, दूसरा अर्थ दयाभाव, तीसरा अर्थ अपने इष्ट देव का स्मरण, चौथा अर्थ उस व्यक्ति की देव लोक में भी प्रतिष्ठा है जो “द” के अर्थ को जानता है।
भींये ने पूछा-कलयुग में तो एक ही अवतार होगा। वह भी कलयुग के अन्तिम में। आप स्वयं को अवतार कैसे कहते हैं? मैं पुस्तक पढता हूँ। विचार करता हूँ। कलयुग में अन्य कोई अवतार नहीं है। जाम्भोजी ने कहा-अन्य अवतार तो शास्त्रों द्वारा प्रगट हैं, किन्तु यह सम्भराथल सोवन नगरी पर तो यह गुप्त अवतार है।
भींयो कहने लगा-इस सोने की नगरी को आपने आँखों से दिखाले तब मैं मानूँगा। अन्यथा कहने मात्र से क्या होता है? आँखों से देखने से ही प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। मुझे पक्का विश्वास एवं श्रद्धा होगी, तो मैं आपको तीनों लोकों का राव अवतार मानूँगा।
जम्भेश्वर जी अपने साथ में रणधीर बावल, दूसरा धैर्यवान खींयों,तीसरा सैंसोजी राठोड़, चौथा दूजैण माल, तथा पाँचवाँ स्वयं भींया लौहार। इन पाँचों को चौकस-सावधान करके साथ चलने के लिये तैयार किया। सद्गुरु के ये पाँचों लोग भाय आये अच्छे लगे इसलिये इन्हें सोवनी नगरी दिखाई।
श्री देवजी सम्भराथल पर हरि कंकेहड़ी वृक्ष के नीचे विराजमान होते, वहाँ से पूर्व की ओर इन पांचो को ले गये। जहाँ पर तालाब है। जहाँ से मिट्टी निकालते हैं। ठीक उसी जगह पर ले गये। प्रथम तो उनसे कहा- एक मन एक दिल से सतगुरु में स्थिर हो जाओ। जब उनकी चंचल वृत्ति शाँत हो गयी, तब उन्हें वहीं पर मिट्टी हटायी तो नीचे परदे दिखाई दिये। जिनके पीछे अवश्य ही कुछ छिपा होगा। पड़दे के पीछे भारी किवाड़ जड़ा हुआ दिखाई दिया। वहाँ बिना सूर्य ही प्रकाश दिखाई दिया, मानों सूर्य उदय हो गया हो। वहाँ पर सोने के फाटक लगे हुए देखे। सोने की ही दीवारें थी।
देवजी ने कहा-हे भींया ! ये तुम्हारे ही घड़े हुए हैं। किन्तु सोने के ताले जड़े हुए दिखाई दिये। सतगुरु की महिमा कौन वर्णन कर सकता है? उनकी शक्ति को कौन सहन करेगा। आगे बढ नहीं सके। सतगुरु ने कहा-ताक में ताली रखी है,आप खोलिये और अन्दर प्रवेश कीजिये। किवाड़, तो अवश्य ही जड़े हुए हैं, किन्तु चाबी-ताली मेरे पास है। उसे लीजिये और अन्दर प्रवेश कीजिये। भींया कहने लगा-हे देव! यदि हमारे से ही किवाड़ खुल जाते, तो आपको कौन पूछता? हम तो कभी के प्रवेश कर गये होते। आपने ही जड़े है। और आप ही खोलिये। जब तक आप वचन नहीं दोगे, तब तक ये किवाड़ खुलेंगे नहीं। श्री देवजी ने उघाड़ दिये और उनके मन की भ्रान्ति को मिटाकर सोनवी संभरानगरी दिखाई। सहज भाव से ही सतगुरु ने ताला खोला। दरवाजे उघाड़े और सहज में ही पाँचों जनों को अन्दर प्रवेश करवाया।
वहाँ किसी प्रकार का सूर्य, चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं था। श्री देवजी के शरीर का ही पूर्ण प्रकाश हो रहा था। देव ज्योति के प्रकाश से अनेक महल मन्दिर आवास गृह देखे। भींये ने सोनवी नगरी और उनके स्वामी श्री जम्भेश्वर को आँखों से देखा और कहनह्य लगा -
अब आप मुझे भी बिश्नोई करो। मैंने खोजते-खोजते मालिक को प्राप्त कर लिया है। यही सम्भरा नगरी और वही विष्णु अवतार है। मैंने सत्य को जान लिया है। ये तो साक्षात् सृष्टि के कर्ता-धर्ता सभी कुछ हैं। शास्त्रों की गति से परे हैं।
वहाँ पर सतगुरु ने आज्ञा प्रदान की कि मैं जो वस्तुएँ तुम्हें यहाँ से ले जाने के लिये कहूँ, वही आप पाँचों लोग उठा लें। अन्य कोई वस्तु उठाना नहीं। सद्गुरु ने कहा-एक सोने की मूण-मटका, दूसरी झारी,तीसरी माला,चौथी सुलझावणी, और पाँचवाँ स्वर्ण कलश। ये पाँचों वस्तुएँ लेकर देवजी के पीछे-पीछे स्वर्ण नगरी से बाहर आ गये।
न जाने रणधीर बावल के मन में क्या आया,अनायास ही एक सोने की सिला (सिलम) हाथ में उठा ली और उसे देखते ही देखते बाहर निकल आये। रणधीर ने बाहर आकर अपने ही हाथ में पराई वस्तु देखकर पछतावा किया कि मैं बिना पूछे यह अलौकिक वस्तु ले आया। किसी ने देखा ही नहीं और नहीं मुझे किसी ने रोका ही। अन्तर्यामी श्री देवजी ने सभी कुछ जानते हुए मुझे रोका नहीं। अवश्य ही इसमें कुछ राज होगा।
जाम्भोजी ने कहा-रणधीर! बिना पूछे क्या ले आया जो पछता रहा है? रणधीर ने क्षमा याचना की परन्तु श्री देवजी ने कहा-डरो मत! इसे तू परोपकार के कार्य में लगाते रहना। किन्तु है तो तेरी मृत्यु ही। जरा बच के रहना।
भींये के मन में आनन्द हुआ। पाँचों लोगों को लेकर श्री देवजी वापिस सम्भराथल आये। लोगों ने अलौकिक वस्तुएँ देखी, तो उन पर अलग-अलग जो जिसकी थी, उसी का ही नाम था। बीकानेर का राजा लूणकरण पूर्व जन्म से ही सेवक था इसलिये स्वर्ण कलश राजा लूणकरण को देने का आदेश दिया,क्योंकि वह उन्हीं के नाम से ही था।
इस प्रकार से परब्रहा परमात्मा ने परचा दिया और भींयो को बिश्नोई बनाया। भींया सेवक साधु हुआ और जाम्भोजी की स्तुति की। सद्गुरु मिल गये। जन्म-जन्म के पाप कट गये। अन्तर्यामी तो दिल की बात जानते हैं सेवक अधिकारी को पहचानते हैं।
पूरबिये जो चित्तौड़ से आये थे, उनसे देवजी ने कहा-आप से रानी अवश्य ही पूछेगी तो उनसे यही मेरा शब्द कहना, जो मैं यह सुनाता हूँ। इससे रानी को पिछले जन्म की बात याद आ जायेगी। इस प्रकार से “आतर पातर ” शब्द सुनाया-
शब्द में बतलाया कि-आप लोग रानी से कहना कि मैं पूर्व जन्म में कृष्ण था। और द्वारिका स्वर्णमयी मेरी नगरी थी। वहाँ मेरे साथ अति पवित्रा रानी रुक्मिणी थी। वो भी सीता का ही अवतार थी। मन्दिर महल,द्वारिका स्वर्णमयी मेरी नगरी थी। सोने के महल थे तो क्या मैं उनसे मोह करता ?
इस समय तो मैं अकेला हूँ। यहाँ बागड़ देश में रात्रि होते ही सर्दी पड़ने लगती है। सूर्योदय होने पर भयंकर गर्मी पड़ती है। यहाँ पर प्राकृतिक प्रकोप तो देखिये। गर्म ठण्डी हवाएँ अबाध गति से चलती रहती हैं कभी सूखा पड़ जाता है, तो कभी अत्यधिक वर्षा होती है। ये असहनीय हैं। किन्तु यहाँ पर दुनिया शाले भी टिकने नहीं देते हैं। कोई न कोई दुःख दर्द लेकर खड़े ही रहे हैं। प्रतिदिन कोई न कोई औचाट-विघ्न लेकर खड़े ही रहते हैं। कई-कई भले आदमी भी हैं, किन्तु अधिकतर तो निगुरे लोग ही हैं, जो गहरी गहरी गालियाँ देते हैं।
जिस शरीर पर त्रेता-द्वापर में मल मल के सुन्दर वस्त्र पहना करते थे, उसी शरीर पर अब ऊन के वस्त्र पहने जाते हैं। उस समय हाथों में हीरों की माला थी किन्तु इस समय तो काठ के मनको की माला है बारह करोड़ प्राणियों के उद्धार हेतु मैं यहाँ पर आया हूँ। मेरा वहाँ स्वर्ग लोक से यहाँ आना हुआ है।
वियोग हुआ है। पिछली बातें याद करता हूँ तो मैं भी रोता हूँ। विलाप करता हूँ। उस समय त्रेता युग में वनवास हुआ था केवल चौदह वर्ष का ही, किन्तु लक्ष्मण सीता साथ थे। मुझे धैर्य कौन बंधायेगा? मगरे के चीड़ी-मणिये, काच-कथिर कहाँ! हीरे के मनको की बराबरी कर सकते हैं। हीरा तो हीरा ही होता है। काच तो अपने स्थान पर निकृष्ट ही है
वियोग तो पड़ता ही आया है। आगे भी पड़ता ही रहेगा। किन्तु वियोग दुःख में दुःखित न होवे वही शूरवीर है। जो पहले कभी दुखिया थे, वे अब सुखी हो जायेंगे, राज करेंगे। यह तो समय का फेर है।
पूर्ण पुरुष तो वही है। जो अपने कर्तव्य पर डटा रहे। जो युद्ध भूमि में जाकर शूरवीर कहा जाये वही सच्चा शूरवीर है। यहाँ सम्भराथल पर गर्मियों में तो अंगीठी की तरह यहाँ पृथ्वी का वातावरण तप जाता है जेठ के महीने ठण्डा जल उपलब्ध नहीं होता है। न तो यहाँ सोने के लिये पलंग है और नहीं बिछाने के लिये सेज ही है। गले में हीरों की माला भी नहीं है। जो न ही थी। इन प्राकृतिक सांसारिक परिस्थितियों से शिम्भू घबराता नहीं है न ही सुख का लोभ ही है। और न ही किसी प्रकार का मोह भी है। यह तो संस्कार की बात है। कभी किसी से संयोग तथा कभी किसी से वियोग होना निश्चित ही है।
हम अयोध्या में बाल्यावस्था में खेल खेलते थे। घोड़ों को नचाते थे, उस समय भाई लक्ष्मण मेरी आज्ञा में चलता था। उस समय वनवास में सीता लक्ष्मण साथ में रहते थे। जब सीता का हरण हुआ तो उस समय हनुमान साथ में थे। अपने सुख दुख की वार्ता कर लेता था। किन्तु इस समय तो मेरे साथ कोई नहीं है। मैं अपनी सुख दुःख की बात किससे कहूँ।
श्री देवजी ने यह शब्द रूपी भेंट झालीराणी के पास भेजा क्योंकि इस शब्द को सुनते ही पूर्व जन्म की प्रीति संस्कार जग जायेंगे। अपने आप को पहचान लेगी कि मैं कौन हूँ? अन्य भेंट भी सोनवी नगरी से लायी हुई दी। प्रथम शब्द,दूसरी झारी,तीसरी माला,चौथी सुलझावणी। श्री देव ने कहा-ये चारों वस्तुएँ रानी को देना। रानी अपने पीव परमेश्वर को परख लेगी।
देवजी ने कहा-यह झालीरानी का जीव सीता का है। पूर्व जन्म में यह सीता थी। साथरियों ने पूछा-हे महाराज! तीन लोक की माता सीता चित्तौड़ के राज दरबार में राणी बन कर क्यों आयी? उसने मृत्यु लोक में क्यों जन्म लिया? श्री देवजी ने कहा-जब पंचवटी में वनवास का समय व्यतीत कर रहे थे, उस समय रावण का मामा मारीच कपट का मृग बन कर के आया था। उस समय सीता छली गयी थी। अन्त समय तक सीता के दिल से वह मृग निकल नहीं सका था। यह मेरा है, मुझे प्राप्त हो जाये। यही भावना सीता की बनी थी।
इसलिये वही मारीच यह सांगा राणा है, जो रानी का बेटा ष्न कर आया। मारीच मृग भी सीता के सौन्दर्य को देखकर मोहित था कि यदि ऐसी सुन्दर मेरी माँ होती तो कैसा था? यह मेरी माँ बने। इसी भावना से मारीच भी बेटा बना और सीता झालीराणी बन कर आयी। “अन्त मति सो गति”
इस विषय में कभी भी आश्चर्य नहीं मानना। शिवजी के साथ सती दक्ष की बेटी थी। किन्तु दूसरे जन्म में उसी ने हिमाचल राजा के घर जन्म लिया। तथा सीता भी ऋ षियों के खून से जन्मी थी। वह राजा जनक की बेटी बनी। कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी साधारण से राजा भीम के घर जन्मी थी। जीव ही प्रेम के आवेग में भगवान् की पत्नी बन जाता है। इसी प्रकार से सीता भी सांगाराणा की माँ बन गयी। किन्तु अब इसे ज्ञान हो गया है।
त्रेता से लेकर अब तक ये जीव स्वर्ग वासी थे। अब जन्म ले लिया है, क्योंकि वासना ही जन्म का कारण बनती है। अब आगे पुनः जन्म नहीं होगा। इस समय मैं झालीराणी को बोध कराऊँगा। इसलिये झाली को झारी माला आदि भेज रहा हूँ। यह मेरी सौगात (भेंट) है। राणी इस समय अपने को विधवा ही समझती है। भक्तिमती राणी को यह स्मरण दिलाना है कि तेरा पति परमेश्वर है तू कभी अनाथ नहीं हो सकती। सदा ही सनाथ है।
सद्गुरु ने चारों वस्तुएँ देकर साथ में अपने दो सेवकों को भी भेजा। और उन्हें समझाया कि प्रथम तो राणी को ये वस्तुएँ भेंट देना। फिर राणा को भी सचेत करना, क्योंकि सांगा मारीच का जीव होने से अश्रद्धालु है। उसी को तो मैंने राम रूप धारण कर मारा था।
श्री देव के आदेश को स्वीकार कर के छः जने चित्तौड़ को रवाना हुए और उमंग के साथ चलते हुए कुछ ही दिनों में चित्तौड़ पहुँच गये। रानी अति आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी। महलों पर चढ-चढ कर सम्भराथल की तरफ देखती थी।
बिश्नोइयों ने चित्तौड़ शहर में प्रवेश किया, तो रानी ने छः सेवक आते हुए देखे। अच्छी प्रकार से देख कर निश्चय किया और मन ही मन में कहा-आ तो गये। न जाने समाचार क्या लाये हैं? साथ में घोड़ा-गाड़ी भी है। लगता तो ऐसा ही है कि कार्य सिद्ध कर के आये हैं।
रानी ने अपने विश्वास पात्र सेवकों को भेजा और कहा कि उन लोगों को सीधे महल में ही बुला लाओ। रानी ने देखा कि कोई राजा आया होगा, किन्तु ये तो भगवान् के भक्त आये हैं। सिर पर टोपी पहनी हुई है। इनको यहाँ महल मे ही बुला लाओ। अवश्य ही कोई अच्छी खबर लेकर आये है। जाम्भोजी के सेवक प्रथम राज दरबार में पहुँचकर सांगा को भेंट स्वरूप वस्तुएँ प्रदान की और कहा -
आप स्वयं निरंजन परमेश्वर ने ये भेंट आपके लिये भेजी है और कहा है कि हे राजा! आपने बिश्नोइयों से डाण माँगकर अन्याय किया है। आप इनसे डाण मत लीजिये। ये सेवक भक्त हैं, जो कुछ आपको चाहिये, मैं आपको दूँगा। जो दूँगा, वह अखूट होगा। आप भक्तों से डाण लेते हैं। इसे बन्द करे। यह आपके लिए ठीक नहीं है। राणा ने भेंट स्वीकार की। तब दूसरी राणी की विशेष भेंट उनको प्रदान की। राणी अपने पति परमेश्वर की भेजी हुई भेंट प्राप्त कर के बड़ी प्रसन्न हुई। अपने पूर्व जन्म की स्मृति हो आयी।
रानी ने पूछा-अन्य कोई मेरे लिये क्या आज्ञा फरमाई है? सेवकों ने जाम्भोजी द्वारा दिया हुआ शब्द पढ कर सुनाया। और कहा कि यही बस आपके लिये सौगात है। राणी ने सेवकों को अन्दर बुलाया और उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद दिया। राणी ने भेंट स्वीकार करते हुए शब्द को बार-बार पढा।
अपने पूर्व जन्म की याद करके सिर धुनने लगी और अपनी सहेली से कहने लगी-हे सखी ! अब मुझे पूर्व की याद हो आयी है। थोड़ी सी भूल की वजह से मेरा हरण हुआ था। मेरे पति राम को कितना कष्ट हुआ। मैंने लक्ष्मण की बात मानी नहीं। मेरा मेरे पति से वियोग उस समय हुआ था। इस समय भी मैं मोह माया की वजह से जन्म लेकर आयी हूँ। सत्य ही फरमाया है श्री देव ने अब मेरे पति परमेश्वर साक्षात् विष्णु सम्भराथल पर विराजमान हैं।
मुझे ज्ञान हो चुका है। अब मैं एक बार दर्शन अवश्य ही करूँगी। या मुझे यहीं पर आकर दर्शन देंगे। मैं निहाल हो गयी हूँ। मैं तो संसार के मोह-माया में पड़कर भूल ही गयी थी कि मैं कौन हूँ? अब मुझे ज्ञान हुआ है। रानी को विलाप करते हुए देखकर सहेली कहने लगी-
हे बिश्नोइयों! आपने कोई छल, कपट, कोई जादू-टोना किया होगा। जिससे रानी इस प्रकार से विलाप कर रही है। बिश्नोइयों का रानी की सहेली के साथ वाद-विवाद को सुन कर रानी सचेत होकर कहने लगी- आप हमारे देवता हैं। उठकर चरणों में गिर पड़ी।
सेवकों ने कहा-हे मात! उठ जाओ! हमारे चरणों का कोई प्रभाव नहीं है। यह तो उन्हीं के चरणों की सेवा का फल है, जो आज हम आपका दर्शन कर सके। अन्यथा हमारे में इतनी योग्यता कहाँ है?
राणी कहने लगी-वह देवता कहाँ रहते हैं? उनका दर्शन सुलभ होगा कि नहीं? आप ही सुनाइये वे देवता कैसे हैं? इस शब्द पत्री द्वारा मुझे ज्ञात हुआ है कि देवजी दुःखी हैं, तो संसार में सुखी कौन है ? सेवक कहने लगे जैसा आपको पत्र द्वारा बताया है, वैसे ही देवजी रहते हैं। किन्तु दुःखी नहीं हैं। सिरजन हार ने बतलाया है कि जैसे वैसे ही सुखी हैं वे झूठ नहीं बोलते। जिस प्रकार से चीटिंयो के बिल पर ऊँट को बाँध देते हैं, तो वह सुखी कैसे हो सकता है।
देवजी दुनिया का भला करने के लिये उदास रहते हैं। उन्हें भोग वस्तु की इच्छा नहीं है। धरती की भाँति धैर्यवान हैं। दुनिया का दुःख दूर करने के लिये एक पैर पर खड़े रहते हैं। रानी अपने पूर्व जन्म को याद करके कहने लगी।
मैंने कौन सा अपराध किया था कि राम ने मुझे त्याग दिया था। यदि त्यागना ही था तो मुझे सीता रूप में बनाया ही क्यों था? यदि अपनी भार्या बना ली, तो फिर क्यों त्याग किया? राम लक्ष्मण द्वारा खींची हुई कार को लोप दिया था। लक्ष्मण की मर्यादा थी, शक्ति थी। उसका आपने उल्लंघन किया है, जिस वजह से आपको वियोग सहन करना पड़ा।
रानी ने अपने पूर्व जन्म की कथा सुनी तो आंखो में आंसू निकल आये। रोने लगी। ऐसी वार्ता संतो से सुनकर रानी अपने आप को पहचान गयी। रानी ने शब्द श्रवण किया, लंबी श्ंवासे ली और कहने लगी-हे देव! आप मुझे अपने से विलग क्यों कर रहे हो? रानी बार-बार प्रणाम करती हुई आँखों में आँसू भर लाई। शरीर रोमांचित होने लगा। अधिक कुछ कहने में समर्थ नहीं हो सकी।
हे देवजी! मैं तो आपकी जन्म जन्म की दासी हूँ। हे कर्त्ता! आपने मुझे गर्भवास में क्यो भेजा? यहाँ पर तो मैं और मेरा के मोह चक्कर में आपको तथा अपने को ही भूल गयी थी। मैं अपने पति से वियोग को प्राप्त हो गयी थी। अब तो मेरा जन्म-मरण मिटा दीजिये। और सदा के लिये अपने पास बुला लीजिये। मैं तो जीव हूँ। आप मेरे परमेश्वर है। राणी ने सांगा को बुलाया और कहा-बेटे! ये बिश्नोई मेरे गुरु भाई हैं। तुम इनके चरणों में प्रणाम करो। जाम्भोजी ने मेरी इच्छा पूर्ण की है। तुम्हारी भी करेंगे। इन बिश्नोइयों से अपनी सीमा में किसी प्रकार का डाण नहीं लेना। हे बेटा! तू तो पूर्व जन्म का मारीच था जो राम के बाण से मारा गया था। मैं सीता थी। मेरा बेटा बनने की मरते समय तुम्हारी वासना थी। वह वासना अब पूरी हो गयी है। अब तेरा भी जन्म सफल हुआ है, और मेरा भी। ये जाम्भोजी स्वयं राम विष्णु कृष्ण हैं।
राणा साँगा ने बिश्नोइयों का आदर किया और पाँचों कपड़े पहनाए। उन्हें डाण माफ कर दिया। जाम्भोजी को सिरजन हार अम्बेश्वर मान कर के शिष्य बनना स्वीकार किया। जाम्भोजी के नियमों में चलने का प्रयास करने लगा। उनके साथ ही रायसल और वरसल भी बिश्नोई बने। झालीराणी के साथ अन्य बहुत से लोग बिश्नोई बने और अपने जीवन का कल्याण किया।
विधि से चलने पर सद्गुरु ने उन्हें स्वर्ग का अधिकारी बनाया। बारह करोड़ प्राणियों में ये भी प्रह्लाद पंथी जीव ही थे, जिन्हें सचेत किया। साँगा राणा एक समय सम्भराथल आये और देव दर्शन करके अपने को कृत्य कृत्य माना। अपने राज्य में बिश्नोई बसाने की प्रार्थना की? तब जम्भेश्वर ने कहा-जो बिश्नोई व्यापारी पूर्व देश के हैं, वे लोग जो तुम्हारे राज्य में आये थे, उन्हें ही आप अपने राज्य में बसालो। इस प्रकार से चितौड़ राज्य में बिश्नोइयों के गाँव बसे थे। वे गाँव-भीलवाड़ा, पुर, दरीबा, संभेलिया और मांडल आदि। सोने की मूण जेसलमेर के राजा जेतसी को दीगयी। उस पर उहीं का नाम था।