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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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नवां अध्याय · कथा 61

जाम्भा सरोवर तीर्थ का महात्म्य

वील्हो उवाचः- हे गुरुदेव! आपने पीछे बतलाया था कि जाम्भोजी ने गंगा को सम्भराथल के नीचे एक धारा के रूप में बहते हुए देखा था। उसी समय साथरियों ने पूछा कि-अब वह धारा कहाँ गयी? तब श्रीदेवजी ने बतलाया था कि वह धारा तो जाम्भा तालाब पर पहुँच जायेगी। वही गंगा समान तीर्थ होगा। उसमें स्नान करने का फल गंगा सदृश ही होगा। इस समय में आपसे जाम्भोलाव का माहात्म्य एवं तीर्थों की महिमा सुनना चाहता हूँ।

नाथोजी उवाचः-हे शिष्य! जहाँ पर भी पवित्र जल में स्नान किया जाता है, वह तीर्थ कहलाता है। जल तो सभी जगह विद्यमान है, किन्तु तीर्थ की महिमा को तो वही जल प्राप्त होता है, जहाँ पर कभी किसी महापुरुष, संत, ऋषि ने तपस्या यज्ञादिक शुभ कार्य किये हों। वैसे तो जाम्भोजी ने “अड़सठ तीर्थ हिरदा भीतर कह करके हृदय के भीतर ही बतलाया है, किन्तु बाह्य तीर्थ भी लोकाचार के लिये हैं। ताज्य नहीं हैं। सेवनीय ही हैं। जिन साधारण लोगों को भीतर के तीर्थों का कुछ पता नहीं है, उनके लिए बाह्य तीर्थ भी बतलाया गया है, आवश्यक भी है। हृदय के भीतर के तीर्थों में स्नान तो कोई बिरला ही कर पाता है। तीर्थो में शिरोमणि गंगा स्नान है। श्रीदेवजी ने गंगा का महत्व बतलाया है। पाहल गति गंगा तणी जेकर जाणे कोय। गंगा दूर देश में स्थित है। यहाँ के लोगों को गंगा का स्नान मिल सके, इसके लिए जाम्भोजी महाराज ने जाम्भोलाव तीर्थ बतलाया था।

एक समय सम्भराथल पर विराजमान श्रीदेवजी के सम्मुख बैठे हुए रणधीर आदि भक्तों ने श्रीजी से पूछा था, तब जाम्भोजी ने जाम्भोलाव का माहात्म्य बतलाया था। हे वील्हा! वही मैंने श्रीमुख से सुना था। वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो-पवित्र जाम्भोलाव ज्ञान गंगा में भी स्नान करेंगे तो पवित्र ज्ञानी हो जाओगे। नाथोजी उवाच- सेवकों ने सतगुरु से पूछा-हे देव! तीर्थ कितने हैं? उनमें कौनसे तीर्थ में जाकर स्नान करें जिससे पापों से मुक्त हो सकेंगे। यहाँ पर तो गंगा,यमुना, सरस्वती, प्रयाग, काशी, अयोध्या, मथुरा, रामेश्वरम्, द्वारावती, जगन्नाथ, केदार, बद्री, पुष्कर आदि अनेकों तीर्थ है। इनमें से जो श्रेष्ठ है उसी में ही हम स्नान करें। जिससे मुक्ति को प्राप्त हो जावें। जाम्भेश्वरजी ने तीर्थों का बखान करते हुए इस प्रकार से कहावैसे

तो अड़सठ तीर्थ हृदय भीतर ही हैं। उनकी खोज करो। अन्यत्र कहाँ कहाँ भटकोगे? पैर घिसाओगे। शरीर,धन,बल की ही हानि होगी। आप लोग हृदय तीर्थ में ही स्नान करो और यदि इस उच्च स्नान करने में समर्थ नहीं हैं, तो मैं तुम्हें यहीं देश फलोदी में ही तीर्थ बतलाता हूँ।

सेवकों ने पूछा-हे देव! यहाँ फलोदी देश की भूमि किस प्रकार से पशित्र होकर तीर्थ बन गयी। यह बतलाने की कृपा करें। इस भूमि पर किसने तपस्या की, किसने यज्ञ किये हैं और कौन पार पहुँच सका है। यदि ऐसी यह पवित्र भूमि है, तो अब तक छिपी हुई कैसे रही? प्रगट क्यों नहीं हो सकी? वेद पुराणों में इसकी चर्चा क्यों नहीं हुई? चारों युगों में ऋ षियों से छिपी क्यों रह गयी? तथा यह भूमि पवित्र किस प्रकार से हो गयी?

श्री जाम्भेश्वरजी ने बतलाया-सातवें कल्प में ब्रह्म सरोदक नाम से तीर्थ था। यहाँ पर ब्रह्माजी ने यज्ञ की रचना की थी। वहाँ पर अदासी हजार ऋषि लोग आये थे। उनमें मार्कण्डेय, दत्त, लोमश आदि प्रधान थे। छः महीने तक लगातार हवन हुआ। विशाल वेदी में परनालों से घृत की धारा द्वारा आहुति प्रदान की थी। वहाँ पर सर्वदेव महेश,इन्द्र तथा विष्णु आये थे। उनके चरण कमलों की रज से यह भूमि पवित्र हुई थी और यज्ञ से यह स्थल तीर्थ बन गया था।

दूसरी बार में भगवान् शिव ने यहाँ पर यज्ञ किया था। दस महीने तक यज्ञ हुआ था। इन्द्रादिक देवता स्वयं यज्ञ में सम्मिलित हुए थे। उसमें अपार घृत सामग्री की आहुति दी गयी थी। देव मुनियों ने जयजयकार किया था। यज्ञ पूर्ण हुआ। देवताओं तथा ऋ षियों ने शंख बजाया। देवताओं ने फूलों की वर्षा की गन्धर्वों ने मधुर ध्वनि में गायन किया था। स्वर्ण कलश जल से परिपूर्ण करके सुशोभित वेदी पर रखा था। इस प्रकार से यज्ञ सम्पन्न हुआ था।

तीसरा यज्ञ यहाँ पर पाण्डवों ने किया था। वनवास काल में पाण्डवों ने वेदव्यासजी से पूछा था कि ऐसा कोई स्थल बतलाओ, जहाँ जाकर के हम यज्ञ करें। हमारी इच्छा पूर्ण होवे। वेदव्यासजी ने जांगल देश में, काम्यक वन में, यहीं जाम्भोलाव स्थल को ही बतलाया था। पाण्डवों ने यहाँ पर दिव्य वेदी-यज्ञकुण्ड बनाया था। यज्ञ में अन्य मुनियों के अतिरिक्त श्रीकृष्ण स्वयं भी पधारे थे। ब्रह्माजी ने स्वयं श्रीमुख से वेद मंत्रों का उच्चारण किया था। वेदव्यासजी ने भागवत कथा का गान किया था। लगातार अठारह महीने तक यज्ञ किया था। यज्ञ से तीनों लोक तृप्त हुए थे। श्रीकृष्ण ने पांचायण शंख बजाया था। ऐसी यह दिव्य भूमि यज्ञ से अति पवित्र है।

यह बात सत्य है कि वेद पुराणों में इस स्थल की चर्चा नहीं हुई है। यहाँ पर अन्य भी अनेकानेक पापियों का उद्धार हुआ है। श्रीदेवजी ने श्रीमुख से जाम्भा सरोवर का महात्म्य बतलाया था। उसी समय ही साथरियों ने श्रीदेवजी से इच्छा प्रकट की कि यदि ऐसा पवित्र स्थल है तो आप हमें अवश्य ही उस स्थल का दर्शन करवाइये। हम भी वहाँ जाकर यज्ञ तपस्या तथा मिट्टी निकाल करके अपने को पवित्र करेंगे। आप भी वहाँ पर उपस्थित होंगे, तो हमारा सौभाग्य अनन्त गुणा फलीभूत हो जायेगा।

साथरियों की प्रार्थना स्वीकार करते हुए श्रीदेवजी सम्भराथल से भक्तों सहित रवाना हुए प्रथम दिन जांगलू के पास ही जंगल में आसन लगाया। रणधीरजी ने कहा- हे देवजी! हमारे बैल प्यासे हैं! जल कहाँ मिलेगा? श्रीदेवजी ने हरे-भरे वृक्ष दिखाते हुए कहा कि- यहाँ से थोड़ी दूर पर ही ये वृक्ष दिखाई देते हैं। वहाँ शुद्ध जल मिलेगा। रणधीरजी ने कहा-महाराज! वहाँ पर तो जल नहीं हैं। इस भूमि को मैं जानता हूँ। जाम्भोजी ने कहा-हे भक्त! अवश्य ही जाओ। वहाँ जल मिलेगा। बैलो को लेकर जल हेतु पहुँचे तो वहाँ जल से तालाब भरा हुआ मिला। बैलों को जल पिलाया और शुद्ध जल लेकर वापिस आये। सद्गुरुदेव की लीला को धन्यवाद दिया।

हे वील्हा! वह वही जगह है, जहाँ देवजी ठहरे थे। वह जांगलू की साथरी एवं जल की प्राप्ति हुई है वह बरसिंगवाला तालाब। एक रात्रि विश्राम जांगलू की साथरी करके दूसरे शाम को खींदासर में निवास किया। जहाँ पर रूपे को भण्डारी बनाकर भेजा था। वहाँ के लोगों ने आदर सत्कार किया। रूपे सिंवर ने अपने को धन्यवादी माना।

तीसरे दिन शाम को जाम्भोलाव पहुँचे। उस पवित्र स्थल को तीर्थ बनाया। वहाँ पर खुदाई का कार्य विक्रम सम्वत् 1566 मिगसर कृष्ण पक्ष पुष्य नक्षत्र पंचमी बृहस्पतिवार को प्रारम्भ किया। जैसलमेर के राजा जैतसी को समाचार मिला कि हमारे इष्ट देवता आजकल फलोदी के पास आये हैं। परोपकारार्थ तालाब खुदाई का कार्य करवा रहे हैं। जैतसी भी पुण्य कार्य में भाग लेने के लिए अपने सेवकों सहित जाम्भोलाव श्रीदेवजी के निकट पहुँचे। प्रणामादि मर्यादा का पालन करते हुए जाम्भोलाव तालाब खुदाई में अपनी भागीदारी सुस्थिर करने के लिए श्रीदेवजी से प्रार्थना की। जम्भेश्वरजी की आज्ञा अनुसार तालाब खुदाई के कार्य में जैतसी संलग्न हुआ।

राजा स्वयं सेवा कार्य करता था। प्रजा तो उन से ही आगे बढ़कर कार्य करने में उतावली हो रही थी। दिन भर मिट्टी निकालते, पाल बंधाई का कार्य करते, सांय को श्रीदेवजी कमलासन पर विराजमान होते। उनके पास जमात एकत्रित होती। उस पवित्र जाल वृक्ष के नीचे बैठकर जनता को सदुपदेश देते। सेवाकार्य एवं सत्संग श्रवण करके उस पवित्र स्थल पर जनता अपने आप को कृतार्थ अनुभव कर रही थी।

श्रीदेवजी ने बतलाया कि यह पवित्र सरोवर है। इसकी खुदाई करने में महान पुण्य है। यहाँ पर सिद्धों में शिरोमणि कपिल मुनि ने तपस्या की थी। यहीं पर सांख्य शास्त्र की रचना की थी। आप लोग यह जाल वृक्ष देख रहे हैं। इसी के नीचे कपिल मुनि का आसन था। इसी तालाब में ही स्नान करने एवं श्रद्धापूर्वक मिट्टी निकालने से ही फल मिलता है।

करोड़पति सेठ फलोदी का श्रीचंद एवं उनके तीन पुत्रों तथा एक कन्या की दुर भाग्यवश दुर्गति हो गयी थी। स्वयं ब्रह्माजी का लिखा हुआ लेख यहाँ स्नान करने से दुर्भाग्य से सौभाग्य में बदल गया था। विपत्ति एवं दुर्भाग्य से सौभाग्य में बदलने वाला यह स्थल है।

कर्णमाल ऋषि का तपस्या क्षेत्र भी यही था। यहीं से उनको ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अपने किए हुए कुकर्मों के मेल को यहीं पर स्नान ध्यान करके धो डाला था।

एक जीव हिंसक सुखनियां भी भटका हुआ यहाँ पर आ गया था। प्यासा था। जल पी लिया। मिट्टी निकाली एवं स्नान किया। उसकी बुद्धि शुद्ध हुई। सदा-सदा के लिए इस तीर्थ के प्रभाव से जीव हत्या करनी छोड़ दी। पूर्व जन्म के कुछ अच्छे कर्म थे, वे यहीं आने पर फल देने में समर्थ हो गये। जिसके प्रभाव से वह दयालु मानव बन करके भगवान् का प्रिय भक्त हो गया था।

इस तीर्थ पर वस्त्र दान का फल उत्तम है। पूर्व जन्म में द्रौपदी अपनी सहेलियों के साथ इस तीर्थ में स्नान करने के लिए आयी थी। उसी समय ही एक ऋषि तालाब में स्नान कर रहे थे। उनके पास उस समय लंगोटी के लिए वस्त्र नहीं था। उन कन्याओं को देखकर संकोच के मारे जल से बाहर नहीं आ सके। द्रौपदी इस बात को समझ गयी। उसने अपने चीर में से एक टुकड़ा फाड़कर ऋषि की तरफ फेंक दिया। ऋषि लंगोटी पहन करके वहाँ से प्रस्थान कर गये। उसी वस्त्रदान के प्रभाव से द्रौपदी का चीर बढ़ा था। दूसरे जन्म में वही वस्त्र का दान देने वाली कन्या द्रोपदी के रूप में जन्म लेकर आयी। कौरवों की सभा में दुशासन द्वारा चीर हरण हुआ था। उस वस्त्र दान के प्रभाव से द्रोपदी का चीर बढ़ा था। श्रीदेवजी जनसमूह को जाम्भोलाव का महात्म्य बतला ही रहे थे कि उनके सामने अलूजी चारण हाथ जोड़ उपस्थित हुए और प्रार्थना करने लगे-

वेद जोग्य वैराग खोज, दीठा नर नंगम।

सन्यासी दरवेश सेष, सोफी अरू जंगम।

विथा वियापी मोही आज, आसा कर आयो।

पाणी पियो एक बार, पेट सुख परचो पायो।

पांचवा वेद संभल्या शब्द, चार वेद होता चलूं।

केवली जम्भ सांभल कवल, आज साच पायो अलूं।

अलूजी जोधपुर राज्य के रहने वाले थे। चारण गोत्र के प्रसिद्ध कवि थे। उन्हें जलोदर रोग हो गया था। इलाज करवाने के लिए अनेकों जगहों पर भटका था। अलूजी ने सुना था कि एक वैद्य मुलतान में रहता है। वहाँ पर भी गये। किन्तु कुछ भी कार्य सिद्ध नहीं हुआ। एक वर्ष तक दवा का सेवन किया, किन्तु व्यर्थ ही गया। वहाँ से चलकर लाहौर आये। वहाँ पर एक सूफी से दवा ली, किन्तु उदर रोग तो दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही गया। वहाँ से चलकर काँगड़े पहुँचा। वहाँ पर एक सिद्ध नाथ रहता था। उनसे आशीर्वाद जंतर मंतर करवाया, किन्तु जलोदर तो बढ़ता ही गया। वहाँ से चलकर इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँ पर एक मुल्ला से ईलाज करवाया, किन्तु कुछ भी फल नहीं मिला। वहां से चलकर मथुरा में आये। वहाँ एक गोसाई मुनि का नाम सुना था। उनके पास एक महीना तक रहे, किन्तु रोग घटा नहीं। बढ़ते ही चला जा रहा था। वहाँ से चलकर जयपुर गये। वहाँ एक संन्यासी के चरणों में श्रद्धा अर्पित की। वहाँ से अजमेर आया किन्तु कुछ भी लाभ नहीं मिला। वहाँ से चलकर मण्डोर आया। एक नाथ के चरणों में सिर झुकाया। रोग निवृत्ति की प्रार्थना की। उनकी सेवा की, किन्तु रोग की निवृत्ति नहीं हो सकी। वहाँ से चलकर पोकरण होते हुए फलोदी आया। दो तपस्वियों को अपनी कर्मों की रेखा दिखाई। उनसे पूछा कि अमर रोग कटेगा या नहीं। उन्होंने 16 दिन अपने पास रखा। जब मरने की तैयारी हो गयी, कहीं कोई जीवन की आशा ही नहीं बची, तब अलू को चारपाई पर डालकर जाम्भोलाव लाये। यहाँ एक बार सिद्ध तीर्थ में स्नान किया।

श्रीदेवजी जाल वृक्ष के विराजमान थे। उसी समय ही हे वील्हा! मैंने अलूजी को स्तुति करते हुए देखा था। अलूजी अपनी घोर निराशा प्रकट कर रहे थे। जीवन आशा छोड़ चुके थे। आंखों में अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। हाथ जोड़ते हुए श्रीदेवजी के सामने लम्बे गिर चुके थे।

श्री जम्भदेवजी ने अपने शिष्यों से कहा-जाओ सरोवर से जल ले आओ। जल द्वारा श्रीदेवजी ने स्वयं ही अलूजी को स्नान करवाया। दो घूंँट जल पिलाया। अलू पूर्ण स्वस्थ हो गया। स्तुति करने लगा। सदा-सदा के लिए अलू रोगों से निवृत्त होकर अनेक छन्दों द्वारा श्रीदेवजी की स्तुति की थी। अलू की व्याधि मिट गयी। अन्न-जल ग्रहण करके स्वस्थ हुआ। अब केवल व्याधि ही नहीं मिटी, जन्म-मरण रूपी व्याधि भी मिट गयी। अलू जी चारण जाम्भोजी के शिष्य कवि हुए अपनी वाणी को जाम्भोजी की स्तुति द्वारा सफल किया।

जैसलमेर की यात्रा में तेजोजी चारण जाम्भोजी के साथ गये थे। वहीं पर ग्वाल चारण ने बिश्नोइयों के बारे में कुछ प्रश्न पूछे थे। उनका समुचित जवाब तेजोजी ने ही दिये थे। तेजोजी को कुष्ठ रोग हो गया था। जाम्भोजी तालाब खुदवा रहे थे। तेजोजी जाम्भोलाव पर जाम्भोजी के सम्मुख हुए थे। वहाँ जाम्भोलाव पर स्नान करने के लिए तेजो ने कोशिश की थी, किन्तु कुष्ठ रोग होने से वहाँ के लोगों ने स्नान करने नहीं दिया। जाम्भोजी ने अपने चेले निहालदास को बुलाया और कहा-सरोवर से जल की झारी भर ले आओ। इन्हें स्नान कराओ। जल स्नान से रोग की निवृत्ति होगी। तेजो के कुष्ठ रोगी शरीर पर जल डाला। जैसे ही शरीर पर जल गिरा कुष्ठ रूपी मैल को जल ने धो डाला। तेजोजी ने देखा काया कंचन जैसी होकर दमकने लगी। कवि तेजो ने हाथ जोड़े और स्तुति करने लगे-हे जम्भेश्वर, परम दयालु, कृपालु, आप की जय जयकार हो। आप तो सत्चित् आनन्द स्वरूप स्वयं ही अपनी इच्छा से ही मूर्त रूप धारण करके आये हैं। स्वयं संतोषी होते हुए दूसरों का पालन-पोषण करने वाले जमात के नियन्ता स्वामी हो। हे देव! हम आपकी क्या महिमा गायें? आप तो सत्य स्वरूप हो। हम सांसारिक लोग तो अनेक पापकर्मों के बन्धन में बंधे हुए कैसे सत्य की स्तुति कर सकते हैं।

आपने मुझे कोढ़ रूपी नरक से बाहर निकाला है। आप कल्पवृक्ष स्वरूप हो। आपके पास जो आ जाता है, वह खाली हाथ नहीं जाता है। जो सुरधेनु की सेवा करे, तो वह मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होती है। यदि कोई अपने पास पारस मणि रखे, तो उसकी दरिद्रता स्वतःही मिट जाती है। मैं आपकी शरणागति हो चुका हूँ। आप मुझे जो आज्ञा दोगे, वही मैं करूँगा। ऐसा कहते हुए तेजो गुरु के चरणों में गिर पड़ा।

हे देव! रक्षा करो। श्री देवजी ने तेजे को उठाया और कहा-इस कुष्ट को झड़ने में अन्य किसी का कोई प्रभाव नहीं है। यह तो इस सागर जल में स्नान का ही प्रभाव है। तुमने तन-मन-धन अर्पण कर कह्य अहंकार को छोड़ कर के श्रद्धा पूर्वक स्नान किया है। तुम्हारी पवित्र श्रद्धा एवं विश्वास ही तुम्हारा रोग दूर करने में सहायक है।

इसी प्रकार से कोल्हजी चारण भी फलोदी के ही रहने वाले थे। इनके मस्तिष्क में कीड़ा था। दिमाग में भंयकर पीड़ा चल रही थी। कोल्ह जी ने भंयकर पीड़ा झेली थी। अनेकों जगहों पर भटका भी। जहाँ पर भी जिसने भी पीड़ा हरने का उपाय बतलाया वही पर ही कोल्हजी गये थे। किन्तु किसी से भी कुछ कार्य नहीं बना। मगज में कीड़ा था, वह अन्दर ही अन्दर खोखला करता गया। धीरे-धीरे भंयकर पीड़ा से कोल्हजी की दोनो आँखें चली गयी। दिखना बन्द हो गया। इस प्रकार तीन वर्षो तक अन्धे हो कर ही समय व्यतीत किया। फिर भी दर्द तो कम नहीं हुआ।

कोल्ह जी का समय अच्छा आया। एक समय जैसलमेर में कवि अलूजी से भेंट हुई। तब कोल्ह ने अपना दुखड़ा कह सुनाया। अलू ने बतलाया-हे भाई! आजकल जाम्भोजी महाराज फलोदी के पास ही कपि4 सरोवर खुदवा रहे हैं। तुम भी मेरी तरह ही उनकी शरण में चले जाओ। आजकल जैसलमेर के राव जेतसी भी वहीं पर सेवा कार्य कर रहे है वहाँ जाने से मेरा जलोदर रोग मिट गया था, और रावल जेतसी के भी पेट में फोड़ा हो गया था, उसकी भी निवृत्ति हो गयी है। तुम तो पास में ही रहते हो। एक बार अपना चारण कवि पने का अहंकार छोड़कर उनकी शरण में तो जाओ। यदि अकेले नहीं जा सकते तो मेरे साथ चलो।

एक बार सरोवर में स्नान करना, तुम्हारे चक्षु खुल जायेगें। तुम्हारी व्याधि की निवृत्ति हो जायेगी। ऐसा कहते हुए अलूजी ने कोल्हजी का हाथ पकड़ कर जाम्भोलाव ले आये। जाम्भेश्वर जी कमलासन पर विराजमान थे। उनकी दिव्य वाणी कोल्ह जी ने सुनी और अपने को धन्य धन्य कहा -

कोल्हजी कहने लगे हे देव! मुझे बचाओ। मेरी रक्षा करो त्राहि माम। मैं अपना पन त्याग के आपकी शरण आया हूँ। ऐसा कहते हुए श्री चरण कमलो में दण्डवत प्रणाम किया। सभी को छोड़ कर, हे देव मैंने आपकी ही शरण ली है। आप मेरे दिव्य चक्षु मुझे वापिस लौटा दीजिये। ये मेरी आँखें मस्तिष्क रोग से चली गयी हैं।

जाम्भोजी ने कहा-जाओ, एक बार सरोवर में स्नान करो, तुम्हारी आँखें खुल जायेंगी, तुम्हारा सम्पूर्ण दुःख मिट जायेगा। कोल्ह वहाँ से उठ खड़े हुए। तीर्थ स्थल में जाकर जल में डुबकी लगायी, बाहर निकला तो आँखें खुल गयी थी। पहले से कहीं अधिक सुन्दर दुनिया दिखने लगी थी। दूसरी डुबकी लगाई, फिर आँखें खोली और देखा कंवल सदृश नयन खुल गये थे। इस प्रकार से आँखें खुली,करोड़ों जन्मों के पापों का नाश सागर में स्नान से हुआ। कोल्ह जी ने स्तुति की -

तुमे सुरा सुख दियण,तुम्हे असुरा संघारण।

तुमे जगत पति जगदीश,तुमे सिध साध सुधारण।

तुमे जग जीवा जीव,तुमे केवल अरू कामी।

तुमे त्रिगुण पति आद,तुमे तत अंत्रजामी।

सकल सिरजत सांइया,करतार आप आया कले।

वीनती कोल बल बल विसन,सांरग धर सम्भराथले।

कोल्ह अल्हू की आरती,सुणी जंभ भवनेश।

कुष्ट गयी चक्षु खुले,रहयौ न दुख लवलेश।

जंभसागर में नहात ही कोट रोग विलाय।

नाथो कहै सतगुरु मिले,जीव ब्रह्य मिल जाय।

कान्ह जी चारण राज कवि थे। अन्न-धन-लक्ष्मी के भण्डार भरे थे। किन्तु सभी कुछ होते हुए भी पुत्र नहीं था। जिस कारण से सदा ही उदासीन रहते थे। बिना पुत्र के धन-दौलत, मान-सम्मान, गृहस्थी को प्रिय नहीं लगते। जिस गृहस्थ में संतान ही नहीं, वह घर नहीं श्मसान ही होता है।

वैद्य हकीम,ओषध आदि से इलाज करवाया, किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। भोपा-भरड़ा, कल्पित देवताओ की भलीभांति उपासना की, किन्तु निष्फ ल हुआ। देवी-देवता, गोगा,भैंरू आदि के थानों पर भी गया, मस्तक झुकाया, मन्दिर बनवाने तथा स्वर्ण कलश चढाने की प्रतिज्ञा की, किन्तु वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। अनेक योगी, ब्रह्यचारी,सन्यासी,नाथ आदि के पास भी गया, अपनी व्यथा कथा भी कही,सभी ने अपनी मति के अनुसार कुछ कहा, परन्तु सन्तान की प्राप्ति नहीं हो सकी। इस प्रकार से आठ वर्ष तक अनेकों उपाय किये किन्तु किसी से भी कार्य नहीं हुआ।

एक समय कान्होजी अपने जाति भाई अलू जी के पास जाय बैठा। उदासीन होकर सर्वथा निराश था। अलू जी ने कहा-ऐसे जीवन से निराश न होइये, मेरे कहने से एक बार अवश्य ही जाम्भोलाव जाइये और वहाँ पर सपत्निक स्नान कीजिये तथा वहाँ के जल का आचमन कीजिये। तुम्हारे कोई पूर्व जन्म के किये हुए पाप ही तुम्हारे संतान न होने के कारण हैं। वह पाप कटने का सरल उपाय जाम्भोलाव तालाब में स्नान करना एवं जल पान करना, मिट्टी निकालना है।

अलू जी की बात पर श्रद्धा विश्वास कर के कान्ह जी चारण सपत्नीक अमावस्या के दिन जाम्भा सरोवर गये और तीर्थ में स्नान, दान,आचमन किया। वापिस लौट आये। नवें महीने कान्ह जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जो पाप बाधा डाल रहा था, वह सिद्ध सरोवर के प्रताप से नष्ट हो गया। इस प्रकार से समय समय पर चार बार जाम्भोलाव पर गये और कान्होजी को चार पुत्रों की प्राप्ति हुई।

कान्ह जी के पुत्र बड़ा हुआ, प्रथम पुत्र के विवाह में श्री जाम्भोजी को निमंत्रण देकर बुलाया था। जाम्भोजी ने निमन्त्रण स्वीकार लिया था। कान्ह जी के पुत्र को आशीर्वाद देने गये थे। कान्हजी ने अनेक प्रकार से श्री देवजी का सम्मान किया और कहने लगे-

हे देवजी! आपकी कृपा का ही यह प्रसाद है। मैं तो सर्वथा उदासीन होकर गृहस्थ धर्म से उदासीन ही हो गया था। मेरी आशा निराशा में बदल गयी थी। बिना पुत्र के कुल का विनाश हो जाता है। आपने कृपा करके मेरे को कुलदीपक प्रदान किया।

अब आप शुभ कमल सदृश हाथ मेरे तथा मेरे कुलदीपक ऊपर रखिये। आपकी अहैतुकी कृपा सदैव बनी रहे। मेरा कुल परिवार आपकी भक्ति करता रहे। यही मैं याचक आपसे याचना कर रहा हूँ।

एविधी अस्तुति जंभ की,अल्हू कान्ह जन कीन्ह।

चारण चार जीव बाणवैं,विष्णु धर्म इन लीन्ह।

पुत्र काज जेहि जाचिया,तेही दीन्हा सब त्याग।

अड़सठ धर्म हृदय धरै,नाथा भये बड़ भाग।

नाथोजी उवाच-तीर्थो का प्रभाव प्रत्यक्ष रूपेण देखने को मिलता है। जो व्यक्ति श्रद्धा-भाव से तीर्थों में स्नान करता है, उसको शुभ फल की प्राप्ति अवश्य ही होती है। तथा जो तीर्थ जल ठहरने की भूमि जल ग्रहण करने योग्य बनाने हेतु मिट्टी निकालता है, उसके पुण्य का तो कोई आर पार ही नहीं है। हे वील्ह! मैं तुम्हें एक विचित्र कथा सुनाऊँगा। जिससे तुम्हारी अज्ञानता नष्ट हो जायेगी तथा जीव अजर अमर है यह ज्ञान होगा। यह शरीर जीर्ण-शीर्ण होकर मरता है। तब वह अपने कर्मो के अनुसार ही फल भोगता है। श्री जाम्भोजी के सानिध्य में जैसलमेर के राव जेतसी तालाब खुदवायी का कार्य करवा रहे थे। उस समय श्री जाम्भोजी वहीं जाल वृक्ष के नीचे कमलासन पर विराजमान थे। दिन भर के सेवा कार्य से निवृत्त होकर सांयकाल में श्री देवजी के पास आकर मन बुद्धि की खुराक ज्ञान की प्राप्ति करते थे।

एक समय हे वील्हा! मैंने देखा कि जेतसी जाम्भोजी से इस प्रकार से पूछ रहे थे। जेतसी उवाच-हे देव मैं कई दिनों से लगातार अनेक लोगों को देख रहा हूँ। सभी की प्रकृति भिन्न भिन्न है। फिर भी कुछ हद तक एकता भी है। परन्तु इन्हीं लोगों के बीच एक स्त्री की रीति अलग ही है, अन्य स्त्रियाँ अपने समुह में रहती हैं, बातें करती हैं और तालाब से मिट्टी निकालती हैं,उनकी मुझे कुछ भी शिकायत नहीं है क्योंकि वे तो सामान्य हैं।

एक स्त्री उन से अलग रहती है, घूँघट में मुँह छुपाये हुए पूरे दिन अबाध गति से तालाब से मिट्टी निकालती है। किसी से बात ही नहीं करती,नहीं किसी को अपना मुंह ही दिखाती। हे देवजी! यह मुँह छिपाना, घुँघट निकालना तो यह बतलाता है कि इसने कोई अपराध किया होगा जो मुँह दिखाने योग्य नहीं है अन्यथा तो मुँह ढकना क्यों? उसी समय अन्य लोगों ने भी कहा -

“एक विसनोवण्य घुँघट काढ माटी काढ,वीसनोई कह -जांभाजी !आकुण जीव थ,पहल जमवार मथुरा नगर मां राणी थी। अण अकरम कुमाणा फेरय लादण हुई, बुढ खीलहरी क घरे कणी साध इह क उपरे पाणी आण्यौ थो। साध दवा दीन्ही,मिनख जमवार आई। अब माटी काढिसी। आवा गुवण्य खंडत होयसी। जाम्भोजी श्री वायक कह -

शब्द-110 ओ३म् मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटमदे राणी।

तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी।

मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा दांणी।

कवले चूकी वचने हारी, जिहिं औगुण ढ़ांची ढ़ोवे पांणी।

विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी।

एक बिश्नोई स्त्री घुंघट निकाले हुए तालाब से मिट्टी निकाल रही थी। कुछ बिश्नोई सभा में आये और कहने लगे-हे जाम्भोजी। पहले जन्म में यह जीव कौन था? जाम्भोजी ने बतलाया-पहले जन्म में यह मथुरा नगर की राणी थी। इसने पाप कर्म किये थे। जिससे यह बूढे खिलेरी के ?ार पर भार लादने वाली घोड़ी बन कर आयी। इस पर पानी को ढो कर बूढो पिलाया करते थे। किसी सुपात्र साधु ने इसका लाया हुआ जल पिया था,उसने इसको आशीर्वाद दिया था। जिससे कुछ पाप इसके हल्के हुए और यह मानव जीवन में आयी। इस समय मिट्टी निकाल रही है। इसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जायेगे। जन्म-मरण के चक्कर से छूट जायेगी।

उपस्थित जन समुदाय के प्रमुख राव जेतसी ने पुनः पूछा-हे देव! इसके पूर्व जन्म की कथा विस्तार से बतलाइये,आप तो अन्तर्यामि परमेश्वर सर्वज्ञ हैं। हम तो जीव होने से अल्पज्ञ है। श्री जम्भेश्वर जी ने शब्द द्वारा विस्तार से बतलाया-यह मथुरा नगर की शिरोमणि रानी थी। जब इसका पति स्वर्गवास हो गया तो यही पूर्ण पटरानी होने से राजा बन गयी। इसी के हुक्म से राज काज चलता था।

एक समय गुजराती तीर्थ यात्री गंगा यमुना में स्नान तीर्थ करने के लिये मथुरा में आये थे। तथा अन्य तीर्थ यात्री खुरासाण से भी यही एकत्रित हो गये थे। मथुरा की आसा नाम की पटराणी ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि जो कोई भी मथुरा में प्रवेश करे, उससे कर अवश्य ही लेना है। ये तीर्थ यात्री यमुना के किनारे आसन लगाये हुए थे। डाणी डाण कर लेने वाले राज पुरुषों ने आकर उनसे भी कर मांगा और कहा महारानी के आदेशानुसार पहले कर दीजिये,पीछे यमुना में स्नान करे। वे तीर्थवासी लोग कहने लगे हम व्यापारी नहीं हैं। जो आप हम से कर माँग रहे हो हम तो तीर्थयात्री हैं। तीर्थ यात्रियों से डाण नहीं लिया जाता और न ही हम देंगे।

उन राज पुरुषों ने रानी के सामने जाकर निवेदन किया कि ये लोग तो व्यापारी नहीं है। तीर्थयात्री है। इनके साथ कैसा व्यवहार किया जावे? रानी ने कहा-क्या हुआ जो तीर्थ यात्री हैं तो इनके पास धन है या नहीं? यदि धन है तो किसी भी प्रकार से प्राप्त करो। यहाँ तो सभी व्यापारी ही ऐसा ही बहाना बाजी करते है। हे सेवको! मुझे धन चाहिये हीरा मोती माणिक आदि चाहिये, जाओ लूट ले आओ।

रानी के कहने अनुसार ही उन राज सेवको ने उन तीर्थ यात्रियों से माणिक, मोती, हीरा, स्वर्ण मुद्रा आदि लूट ली। रानी को लाकर समर्पित कर दिया। रानी ने उस लूट के धन को अपने काम लिया।

हे शिष्यो! वह रानी थी, उसने प्रजा पालन का कार्य धर्म नीति से करने का वचन जनता को तथा भगवान् को दिया था। भगवान् को साक्षी मानकर शपथ ली थी। किन्तु उन वचनों को तो लोभ के वशीभूत होकर तोड़ दिया था। उस जन्म में तो पाप के धन को खाकर, दूसरे के हक को छीन कर, जीवन सुख से बिताया, क्योंकि जीव कर्म करने में स्वंतत्र है। इस जीवन में कुछ भी करने में समर्थ है किन्तु “मूवा परहथ सारूं” मरने के बाद दूसरे के हाथ चढ जाता है, उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।

इसी पाप से दूसरे जन्म में वह बूढ़े खिलेरी के घर पर भार लादने वाली घोड़ी बनी। उसने पीठ पर पानी ढ़ोकर के पानी पिलाया। कुछ पुण्य इसको भी मिला, और संत की कृपा से इस जन्म में यह स्त्री बन करके आ गयी है। जो जीव जैसा कर्म करता है, उसका भोक्ता भी वही होता है किन्तु व्यक्ति को जब जब भी पाप कर्मों का फल दुःख आता है, तो विष्णु भगवान् को दोष देता है। हे प्राणी! विष्णु को दोष क्यों देता है? यह सुख दुःख तुम्हारे कर्मों का ही फल है।