चौथा अध्याय · कथा 45
बन्दी नेतसी को छुड़ाना
” नाथोजी उवाच- बीकानेर का प्रसंग पूर्ण हुआ तब शिष्य वील्हाजी की जिज्ञासा को शांत करते हुए कहने लगे-
तोडै सोलंकी राज करै नेतसी। जिण नु चारण गीत कह्या। कूड़ा विडदावण घणा दीन्हा। महलूखान नवाब अजमेर के थाणै सुण्या। मन मां अहंकार कीयों। चड़ि अर तोड़ो मारयों। अदि कीवी नेतसी स पकड़यौ। अजमेरी आंणौ। चारण कनां सुं उलटा गीत कहाया। नेतसी राठौड़ा ने ओठी मेल्ह्या। मामा कागद बाच्या। जोधपुर टीकै राव सांतल। राव सांतल साथ भेलो कीयौ। चद्धडावत रिड़मलो, त जोधावत भेला हुआ। वारै राव जोधपुर थी। बारै अणीकर चड़या। पीही थांवलै थी। नैड़ो कांकोलाव तलाब डेरा किया। दूदै जोधावत नै जाम्भोजी मिल्या था। थांवलै जाम्भोजी प्रगट। राव सांतल दरबार कीयों। सांतिल कहै- सतगुरु मिलै त सांसो भाजै। अमराव कहे- रावजी क्यों सांतलि कहै- रे भाई! सलै आवै कोई नही। लड़ाई करण रो तो बूतो कोई नही। टका द्या तो पणि आपणी काची हुवै। दूदोजी कहै- सांसो जाम्भोजी मेटसी। हालौ जाम्भोजी रै पगै लागा। सोह भेला हुवा। राव सांतल कहै- हमें जाम्भोजी कठे छै। दूदोजी कहे- अठे थांवले छै छड खड़ी असवारी। करत प्रणाम जाम्भोजी र पायै आया। राठौड़ प्रदेखणा दे पाये लागा। जित रे खान की असवारी आई। राठौड़ा के साथ का कोई क्योंई कोई क्योई कहण लागा। सतगुरु कहे- डेरो पासउ करो। चिंता मति करो। खान पासि पतिसाही दल। खान आय कदम पोसी कीवी। जाम्भोजी श्री वायक कहे-
शब्द-66 ओ३म् ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी, रहिया कुपहीया शैतान की यारी।।
शैतान लो भल शैतान लो, शैतान बहो जुग छायो।
शैतान की कुबध्या न खेती, ज्यूं काल मध्ये कुचीलूं।
बे राही बे किरियावन्त कुमती दौरै जायसै, शैतानी लोड़त रलियों।
जां जां शैतान करै उफारूं, तां तां महंत न फ लियों।
नील मध्ये कुचील करबा, साध संगिणी थूलूं।
पोहप मध्ये परमला जोति, यूं सुरग मध्ये लीलूं।
संसार में उपकार ऐसा, ज्यूं घण बरषंता नीरूं।
संसार में उपकार ऐसा, ज्यूं रूही मध्ये खीरूं।
नेतसी सोलंकी टोडे का राजा था तथा राठौड़ जोधपुर नरेश का भानजा था। एक समय एक चारण अजमेर में राजा महलूखान के राज दरबार में पहुँचा और वहाँ जाकर उन्होनें महलूखान के सामने कविता सुनाई।
उस कविता में टोडे के राजा नेतसी की महिमा का बखान था। चारण ने कवि होने के नाते कुछ अधिक ही महिमा का बखान कर दिया। जितना बखान किया, उतना महान् सोलंकी था ही नहीं। लेकिन कवि को कौन कहे? महलूखान के लिए सोलंकी की महिमा सुनना असह्य ही था। कौन राजा ऐसा होगा जो दूसरे छोटे-मोटे राजा की महिमा सुनेगा?
महलूखान ने कहा- मेरे से भी बड़ा अन्य राजा कैसे हो सकता है? यदि बड़ा हूँ तो मैं ही हूँ। महलूखान ने टोडे पर चढाई की और टोडे को जीत लिया। नैतसी को बंदी बनाकर अजमेर ले आये। चारण द्वारा बड़ाई सुनकर नेतसी के साथ अन्याय किया। नेतसी को चारण के सामने उपस्थित किया। और कहा यही है वह तुम्हारे राजा जिनकी तुम मेरे सामने बड़ाई करते थे। अब तुम उलटे गीत गाओ। महिमा का बखान तो बहुत किया, किन्तु अब तुम इसकी हीनता के गीत गाओ। इस प्रकार से महलूखान ने अहंकार वशीभूत होकर चारण से उल्टे गीत गवाये।
नेतसी जेल में बंद हो गया। राज्य छूट गया। किस अपराध के कारण नेतसी को बंदी बनाया गया इसका कुछ भी पता नहीं था। नेतसी ने किसी भी प्रकार से कागज लिखकर अपने मामा के पास जोधपुर भेजा। जोधपुर नरेश ने कागज पढा और अपने साथियों को एकत्रित किया और कहा-कि अजमेर जेल में बंद भानजे को छुड़ाना है। इसीलिए अजमेर पर चढाई करने की तैयारी करो। उस समय बारह राव जोधपुर के अधीन थे। सभी एकत्रित होकर अपने शस्त्रों से सुसज्जित होकर अजमेर पर चढाई के लिए चल पड़े।
अजमेर और जोधपुर की सीमा थांवला गाँव में थी। उधर जोधपुर तथा इधर अजमेर अपनी राज्यसीमा तक तो जोधपुर नरेश बेखटके पहुँच गये। किन्तु अपनी सीमा से बाहर जाने की हिम्मत नहीं हुई। थांवले गाँव के पास ही काकोलाव तालाब के किनारे डेरा डालकर बैठ गए। बारह रावों में दूदा जोधावत साँतल का भाई मेड़ता का राजा साथ था। दूदे की भेंट जाम्भोजी से कई बार हो चुकी थी। इसीलिए दूदा जाम्भोजी की महिमा जानता था।
राव सांतल ने दरबार एकत्रित किया और विचार-विमर्श करने लगे कि ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए? यदि हम सीधे आक्रमण करते हैं तो नेतसी का छूटना असंभव है। न जाने दबा हुआ शत्रु नेतसी को ही न मार दे? क्या पता चले कि हमें ही हार का मुँह न देखना पड़े। हमारे पास शस्त्र, तोपें आदि भी शत्रु की बराबरी नहीं कर सकते।
नेतसी को छुड़ाने के लिए न तो हम झुक सकते हैं, यह हमारी राठौड़ों की मर्यादा है। और न ही टका पैसा ही दे सकते हैं। इससे हमारी कमजोरी जाहिर होती है। हमारी तोपें भी कच्ची हैं। उनका सामना करने में असमर्थ है। यदि युद्ध करते हैं तो बहुत ही खून-खराबा होगा। एक को बचाने के लिए हजारों की जान जायेगी। यह तौ सौदा महंगा पड़ेगा। सांतल को कुछ सदबुद्धि आयी।
इस समय तो कोई अलौकिक शक्ति देवी-देवता ही हमारा साथ दें, तो ही हमारा कार्य बनेगा। हमारी महलूखान से लड़ाई भी क्या है? केवल नेतसी को छुड़ाना ही तो कार्य है। यह कार्य बिना दैविक शक्ति के होना असंभव है। इस समय ऐसा कौन सा देवता है, जिसका हम स्मरण करें, जिससे हमारा कार्य सुलभ हो जाये। “साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे”।
उस समय दूदा राव ने कहा-हे भाई! इस समय प्रत्यक्ष शक्ति तो श्री जय अम्बेश्वर ही हैं। अम्बा शक्ति के भी ईश्वर श्री जम्भेश्वर प्रगट रूप से विद्यमान है। हम उनकी शरण ग्रहण करे। मेरे तो बहुत से कार्य उन्होंने सहज में ही कर डाले हैं। अभी अभी सरियाखान के युद्ध में उन्होंने ही मुझे विजय दिलाई थी।
उनका दिया हुआ खाण्डा जो मैं पास रखता हूँ। यह विजय का वरदान मेरे पास है। उन्हीं कीकृपा से मुझे मेड़ते का राज मिला है। आप उन्हें स्मरण कीजिए। हमारी विपत्ति का कोई न कोई निदान अवश्य ही निकालेंगे।
सांतल ने कहा-वो जम्भेश्वर इस समय कहाँ पर है? दूदे ने बतलाया कि वो तो यहीं थांवले में ही हैं। वैसे तो उनका वचन है-“जहाँ चीन्हों तहां पायो” जहाँ पर भी आप याद करोगे, वहीं पर हूजूर हाजिर हैं। वे तो सभी जगह विष्णु रूप से व्यापक हैं तो यहाँ भी अवश्य ही प्रकट हो जायेंगे। हम उनकी शरण में जायें। वही हमारा उद्धार करेंगे।
सांतल ने कहा-दूदा चलो! जहाँ वे इस समय हैं, वहीं जाकर विनती करते हैं। उसी समय ही श्री देवजी थांवले प्रगट हुए और सांतल आदि राजाओं को दर्शन दिया। सांतल ने उमराओं सहित विनती की। परिक्रमा करके चरणों में दण्डवत प्रणाम किया।
श्री देवजी ने कहा-हे सांतल! आप अपनी मंडली सहित दूर जाकर बैठो। अभी ही अजमेर से महलूखान आ रहा है। तुम्हारी समस्या का समाधान होगा। सांतल ने अपना डेरा दूर लगा लिया। सांतल चिंता मुक्त हुआ। प्रतीक्षा करने लगा कि नेतसी को देवजी कैसे छुड़ाते हैं?
महलूखान के मन में प्रेरणा जगी कि मैंने सुना है कि जोधपुर की सेना थांवले आ गयी है और जाम्भोजी उन्हें वरदान देने के लिए थांवला पहुँच गये हैं। जाम्भोजी सांतल को वरदान देंगे तो निश्चित ही बलवान हो जायेंगे। मैं उनसे युद्ध नहीं कर सकूँगा। जाम्भोजी उन्हें वरदान दे, उससे पूर्व ही मैं उनके चरणों में पहुँच जाऊँ और उनसे वरदान लेकर शक्ति संपन्न हो जाऊँ। वे तो समदृष्टि हैं। इस प्रकार से विचार कर के महलूखान अपने साथ अन्य उमरावों को लेकर हाथी पर सवार होकर थांवले पहंँचा। राठौड़ों के साथ के लोग कुछ ही कुछ कहने 4गे। जैसे यह क्यों आया है? इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते।
महलूखान ने आकर श्री देव के चरणों में प्रणाम किया-श्री जाम्भोजी ने महलूखान को शब्द सुनाया जिसका भाव इस प्रकार से है-हे महलूखान! तुमने अपने जीवन के लक्ष्य को ठीक से समझा ही नहीं है। तुम्हें ईश्वर (परमात्मा) से संबंध जोड़कर, वह ईश्वर मेरा है, ऐसा कहना चाहिए था। किन्तु तुमने तो हाथी-घोड़ा, राज-पाट, महल आदि नाशवान वस्तुओं से यारी जोड़ रखी है। इसी वजह से कुमार्ग पकड़ लिया है।
शैतान लोगों से अपना सम्बन्ध जोड़ रखा है। वे तुम्हारे अपने मित्र तुम्हें डुबा देंगे। शैतान दुष्ट लोगों को ही बढावा देते हैं। उन्हीं से प्यार करते हैं। ये शैतान लोग तो सभी युगों में छाये हुए थे। अब भी शैतान छा गये हैं। शैतान लोगों की खेती (कार्य) ही कुबध करना है। अन्य कुछ भी तो कार्य नहीं है। जिससे दूसरों को दुःख होवे, वही कार्य करना शैतान की खेती है।
समय तो अपने हिसाब से ठीक ही व्यतीत हो रहा है। किन्तु शैतान लोग उसमें कुचिलता करके उसे बदलना चाहते हैं। वे लोग राह (पंथ) को नहीं जानते हैं, न ही कोई क्रिया ही शुद्ध रखते हैं। कुमति लोग दौरे (नरक) में पडेंगे। अच्छाइयाँ आनी तो कठिन हैं किन्तु बुराइयाँ तो जबरदस्ती प्रवेश कर जाती हैं। जहाँ- जहाँ पर भी शैतान लोग अपना कर्तब दिखाते हैं, वहाँ-वहाँ पर उनका कर्तब फलीभूत नहीं होता है। विकास तो नहीं होता, किन्तु विनाश तो हो जाता है।
परमात्मा की लीला रचना में, प्रकृति में विकृति पैदा करना यह शैतान का कार्य है । साधु संत के प्रति स्थूल वार्ता करना। उनसे सत्संग की बात न पूछ करके व्यर्थ की संसार की बातों में रस लेना यही शैतानपना है। जिस प्रकार से फूल में सुगन्धी होती है, उसी प्रकार से स्वर्ग सुख में भी उसी चेतन की सत्ता विद्यमान है। उस चेतन की सत्ता से ही फूल में सुगन्धी और सुख में आनंद की अनुभूति होती है। संसार में रहकर दूसरों का शोषण न करो। किन्तु दूसरों का पालन-पोषण करो। यही उपकार है। इसी उपकार की बदौलत ही वर्षा होती है। उपकार की भावना से ही गाय के पेट से दूध उतरता है। सभी कुछ परोपकार से ही दुनिया फूलती फलती है। इस प्रकार से महलूखान को शब्द सुनाया। खान कहै- नेता क्या है, ज्यान कबूल है। पीरजी बैठूंगा पीछै, छोंडोगा पहला। उभा उभ मंगायो। हथणी चाड़ अर लाया। जाम्भैजी हजूर आंणी बेड़ी काटी। महलूखान कहै- वे नेतसी यौं जाणेगा, कदी मामां का जोर करि कै छूटा। हूँ सो नहीं। पीरजी ने छुडाया है। नेतसी मामां सो मिल्यो। मामा कहै किण तरै छूटो। नेतो कहे-जांभेजी छुटायो। राठौड़ खुशी हुवा।
जाम्भोजी के सामने खान एक पैर पर खड़ा था। कहने अगा- हे महाराज! यह नेतसी तो क्या है? मैं आपके कहने से प्राण भी दे सकता हूँ। हे पीरजी! मैं बैठूँगा बाद में, पहले नेते को छोडूँगा। वही पर ही खड़े खड़े ही नेतसी को मंगवाया। नेतसी को हथणी पर चढा कर हाजिर किया। जाम्भोजी के सामने ही नेतसी की बेड़ी काटी। नेतसी को मुक्त कर दिया।
महलूखान कहने लगा-यह नेतसी यह न समझे कि मुझे मेरे मामा ने छुड़ाया है। मैंने तो जाम्भोजी के कहने से छोड़ा है। नेतसी अपने मामा से जाकर मिला। मामा ने पूछा-कि कैसे छूटे? नेतसी ने कहा कि मुझे तो जम्भदेवजी ने छुड़ाया है। राठौड़ खुशी हुए। बिना युद्ध के ही नेतसी छूट गया, जाम्भोजी ने बड़ी कृपा की है।
महलूखान कहै-पीरजी भिसति कीसी तरै पाइये। खुदाय का दीदार मिलै। ऐसा होह बतावो। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
महलूखान ने पूछा कि हे पीर जी! स्वर्ग कैसे मिले? खुदा का दीदार-प्रेम कैसे मिले? ऐसा उपाय बतलाओ? जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-विसमला-विष्णु कृपालु दयालु रहम करने वाला रहीम है। उनके पास जाने वाला मार्ग तुम्हारे मार्ग से भिन्न है।
कृष्णी माया से मिली हुई इस काया में, हृदय में, जीवों के प्रति अहिंसा की भावना से उस रहमान रहीम से भेंट होगी। अपने मानव जीवन के कर्तव्य को निभाना ही कलमा है। उस रहीम को बाहर न खोजकर के दिल में ही खोजो तो अवश्य ही साक्षात्कार होगा। तभी आप सच्चे मुसलमान होगे।
जितने भी पीर पुरुष इस जमीन पर अवतरित हुए हैं, सभी ने कर्तव्य कर्म करना ही बतलाया है। नेकी से चलना ही सलाम बताया है। जो जीते हुए भी मरे के समान निरंहकारी होता है, वही सच्चा तथा ईमानदार हो सकता है। यही प्रमाण है।
जो हमारे दिल में लीलामय पुरुष परमात्मा विराजमान है। वह तो सभी पर रहम करने वाला है। तुम प्रथम सुपात्र बनो। इतने नियमों पर चलोगे तो भिस्त स्वर्ग की प्राप्ति हो सकेगी।
महलूखान कहै- मुसलमानी के राह मां गोसत का अजाब नहीं। जाम्भौजी श्री वायक कहै-
शब्द-75 ओ३म् जोगी रे तु जुगत पिछांणी, काजी रे तूं कलम कुरांणी।
गऊ बिणासो कहि तानी, राम रजा क्यूं दीन्ही दानी।
कान्ह चराई रनबे बांनी, निरगुन रूप हमें पतियानी।
थल शिर रह्या अगोचर बानी, ध्याय रे मुंडिया पर दानी।
फीटा रे अण होता तानी, अलख लेखो लेसी जाणी।
महलूखान कहने लगा-मुसलमानी धर्म में गोश्त खाने की मनाही नहीं है। जाम्भोजी ने शब्द द्वारा बतलाया-
प्रथम तो वहाँ उपस्थित योगी से कहा-हे योगी तू युक्ति को पहचान, तथा बाद में काजी से कहा-कि तू कुराण में स्थित कलमों को पहचान। कुराण के कलमों में क्या कहा है? कुराण यह तो नहीं कहती कि जीव हत्या करो। गउवों को क्यों मारते हो? गउवों को मारने का आदेश ही होता तो राम रहीम ने दया करके क्यों बचाया? स्वयं कृष्ण ने वन में गऊवें क्यों चराई? गौ वंश का संवर्धन क्यों किया?
अन्य किसी दूसरों की बात यदि तुम नहीं मानते तो मैं वही निर्गुण सगुण रूप से तुम्हारे सामने उपस्थित होकर बतला रहा हूँ। अपनी दिव्य अलौकिक वाणी से युक्त मैं सम्भराथल पर विराजमान हूँ। रे मुंडिया! मैं परोपकार की बात करता हूँ। मुझे स्वार्थ कतई नहीं है। ध्यान से देख, विचार कर।
अनहोनी तो तुम्हारे से होगी नहीं। तुम चाहे कितना भी जोर लगाले। केवल अपनी अल्प बुद्धि एवं ताकत का प्रदर्शन कर के अपने को मूर्खता में ही डालोगे। वह अलख निरंजन हिसाब-किताब, लेखा-जोखा अवश्य ही लेगा। तुम्हारी मन मानी नहीं चलेगी।
महलूखान कहै- मुसलमान कहै वेराह चलह। जाम्भोजी शब्दवाणी कहै-
शब्द-76 ओ३म् तन मन धोइये संजम हुइये, हरष न खोइये।
ज्यूं ज्यूं दुनियां करै खुवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी।
मुग्धां सेती यूं टल चालो, ज्यूं खड़के पासि धनूंरी।
महलूखान कहने लगा- हे देवजी! आप मुझे जो आदेश दोगे, वह मैं शिरोधार्य करूँगा। किन्तु हमारे जाति भाई मुसलमान मुझे काफिर कहेंगे। वे राह चलने का दोष मेरे ऊपर लगायेंगे। मैं कैसे जीवन व्यतीत करूँगा?
श्री देवजी ने शब्द सुनाते हुए कहा-हे महलूखान! सर्वप्रथम व्यक्ति अपना सुधार कर लेता है तो वह दूसरे का भी कर सकता है। सच्चाई को कोई कलंक नहीं लगता। शुद्ध स्वर्ण के तो जंग नहीं लगता। स्वयं अपने आप ही तन को धोइये। स्नानादि शौच क्रिया द्वारा शरीर की सफाई की जा सकती है। उसके पश्चात् मन को भी धोइये। मन शुद्ध,भाव की शुद्धता से रहेगा। व्यर्थ का वाद-विवाद, संकल्प-विकल्प वासनादि ही मन को दूषित करते हैं। इसीलिए शुद्ध भावना से मन को धोइये। इसके बाद इन्द्रियों को वश में कीजिए। मन बुद्धि अहंकार, इन्द्रियाँ आदि सभी तुम्हारे वशीभूत हो जायेगा, तो मन धुल जायेगा। सदा ही प्रत्येक परिस्थिति में ही खुशी बनी रहे। प्रसन्नता ही मुख्य धन है। यही चला गया तो पास में कुछ भी नहीं बचेगा हर हाल में खुश रहो।
आपके नियम धर्म देखकर दुनियां आपसे द्वेष करेगी। आपकी निंदा करेगी। आपको निम्न स्तर का भी बतलायेगी। किन्तु आप अपनी क्रिया पूरी रखो। दूसरों के बहकावे में आकर अपने सिद्धान्त को छोड़ मत दो। संसार में कुछ मुग्ध लोग भी हैं। जो जानते हुए भी शैतानी करते हैं। वे लोग अपने नियम धर्म में बाधा भी डालेंगे किन्तु सावधान रहना। यह पता चल जाये कि मुग्ध आ रहा है उससे बचकर चलो। व्यर्थ का विवाद कर के समय एवं श्रद्धा को हानि पहुँचायेगा। जिस प्रकार से आवाज- खतरे को भांप कर के धनुरी-धनेर पक्षी उड़ जाता है। उसी प्रकार से मुग्धों से दूर रहें।
महलूखान ने नेतसी को मुक्त कर दिया और शब्दों का श्रवण करके वापिस अजमेर चला गया। महलूखान के चले जाने पर श्री देवजी के निकट सांतलराव अपनी मंडली सहित पास में आया और कहने लगा-
राठौड़ आय देवजी के पगै लागा। राठौड़ कहे-जाम्भाजी! म्हे थारा सिख खासा हुवा। तिको म्हे बिसनोई अकर किया। जाम्भोजी कहे-अकर किया बिसनोइयाँ ने रूड़ानां। बिसनोइयाँ कनां पाँचवौ वांटौल्यौ। छत्रीया कह्यो-देवजी! राजा जठे बिसनोई रो मान जो सायै भाजै। तिको तिजाते मां श्री भगवान् सुं वे मुख हुवै। छत्री कहै-जाम्भाजी! देवां मांहै सुधी आराध कुण रो। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
शब्द-70 ओ३म् हक हलालूं, हक साच कृष्णों, सुकृत अहल्यो न जाई।
भल बाहीलो भल बीजीलो, पबणा बाड़ बलाई।
जीव कै काजै खड़ो ज खेती, तामैं ले रखवालो रे भाई।
दैतानी शैतानी फिरैला, तेरी मत मोरा चर जाई।
उनमन मनवा जीवन जतन कर, मन राखीलो ठांई।
जीव के काजै खड़ो ज खेती, वाय दवाय न जाई।
न तहां हिरणी न तहां हिरणा, न चीन्हों हरि आई।
न तहां मोरा न तहां मोरी, न ऊंदर चर जाई।
कोई गुरु कर ज्ञानी तोड़त मोहा, तेरो मन रखवालो रे भाई।
जो आराध्यो राव युधिष्ठिर, सो आराधो रे भाई।
महलूखान के रवाना होने के पश्चात् राठौड़ ने आकर देवजी के चरणों में प्रणाम किया। और कहने लगे- हे जम्भेश्वरजी! हम बहुत से लोग आपके शिष्य हो गये हैं। इसीलिए बिश्नोई लोग अकड़ हो गये हैं कि राजा अब हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, क्योंकि हमारे गुरु भाई हो गये हैं।
हे महाराज! इन लोगों को आप ही समझा दो। जिससे ये लोग हम से टक्कर का रास्ता न अपनायें। नहीं तो मजबूर होकर हमें कठोर कार्यवाही करनी पड़ेगी। जाम्भोजी ने कहा-यदि बिश्नोई आपके सामने अकड़ जाते हैं, तो यह अच्छी बात नहीं है। आप लोग भी बिश्नोइयों को नाजायज तंग न किया करो। ये लोग मेहनती किसान है। खेतों में उपज ज्यादा करते हैं तथा बहुत समय सेवा, भजन, यज्ञ, परोपकार में भी लगाते हैं। इसीलिए इनसे पाँचवाँ भाग लिया करो। क्षत्रिय कहने लगे-हे देवजी! जहाँ राजा आपका शिष्य है। वहाँ बिश्नोइयों का मान बढता है। राजा बिश्नोइयों का आदर करता है। यदि ऐसा न करे तो वह राजा अधिक दिन राज नहीं कर सकेगा। उसका राज उल्ट जाता है। तो उसका सहायक कौन होगा? प्रजा और भगवान् दो ही तो सहायक हैं।
क्षत्रिय कहने लगे-हे जाम्भोजी! देवता तो बहुत हैं। हम उन देवताओं में आराधना किस की करें? ऐसा पवित्र कल्याणकारी कौन देवता है जिससे हमारा कल्याण हो सके? जाम्भोजी ने शब्द सुनाया-
हे क्षत्रियो! हक की कमाई करो। हक की कमाई ही सच्ची कमाई है। कृषि खेती करना हक की कमाई है। जिससे परिश्रम से कमाया जाता है। खेती ही उत्तम है। सुकृत किया हुआ व्यर्थ में नहीं जाता है। उत्तम खेती करो। अच्छी प्रकार से खह्यत में हल चलाओ। तथा अच्छी भली प्रकार से खेत में युक्ति पूर्वक बीज बोवो। जब खेत में धान उग आये, तो उसकी रक्षा के लिए पवित्रता की बाड़ करो। यह खेत तो अनाज प्राप्ति हेतु करो। तथा दूसरी खेती जीव की भलाई के लिए साधना रूपी खेती करो। साधना से आनंद परमानंद प्राप्ति रूपी फल मिलेगा।
अनाज हेतु तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए खेती की रखवाली करनी होगी। खेती को खाने के लिए कुछ दैत्य, कुछ शैतान लोग मौका देख रहे हैं। तुम्हारी सद्बुद्धि को कहीं मयूर नहीं चर जाये। यह मेरा है, मैं ही इसका मालिक हूँ। यह मेरापन ही मयूर है जो साधना एवं खेती को उजाड़ देता है। मन को थिर करके ही खेती की जा सकती है। मन टिकेगा नहीं तो न तो साधना ही बन पायेगी और न ही खेती ही कर पायेंगे। इसीलिए एक मन एक दिल होकर ही कार्य करें।
इस जीव की भलाई के लिए मन को एकाग्र करके कार्य में तत्पर हो जा। इसी से ही सफलता मिलेगी। जब मन एकाग्र हो जायेगा, श्रद्धा भाव स्फु रित होगा तो किसी भी प्रकार की शीत लहर या लू नहीं लगेगी। खेती को नुकसान पहुँचाने वाले हरिण एवं हरिणियाँ तथा हरियावड़ी गाय। तथा मयूर मयूरी चूहे आदि हैं। इनसे बचाव के लिए प्रयत्नशील रहना होगा।
साधना पक्ष में भी मन रूपी हरिण मन की वासना रूपी हरिणियाँ, शुद्ध सात्विक बुद्धि रूपी गाय, अहंकार रूपी मयूर तथा मेरापन रूपी मयूरनियाँ, अचेतनता रूप चूहे, ये सभी साधना तथा खेती में बाधक हैं, इन्हीं से सावधान रहना होगा। तभी खेती कर पायेगा।
हे क्षत्रियो! इस महान् साधना की सफलता हेतु कोई ज्ञानी गुरु धारण करो। वह तुम्हारे मोह को तोड़ देगा। क्योंकि अब तो मोह माया का रखवाला तुम्हारा मन है। जिस प्रकार से राव युधिष्ठिर ने आराधना की, उसी प्रकार से तुम भी आराधना करो। तुम्हें सफलता मिलेगी।
राव सांतिल बूझै देवजी! ऐ बीजा देव पूजीजै छै किं फुरमाया छै क नहीं। जाम्भोजी श्री वायक कहै-
शब्द-71 ओ३म् धशणा धूजे, पाहण पूजे, बेफ रमाई खुदाई।
गुरु चेले के पांये लागे, देखो लोग अन्यायी।
काठी कण जो रूपा रेहण, कापड़ माह छिपाई।
नीचा पड़ पड़ तानें धोकै, धीरा रे हरि आई।
ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता।
बै अपहाने पोह बतावै, बैर जगावै सूता।
भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखंड परवाणो।
बल बल कूकस कांय दलीजै, जामैं कणूं न दाणूं।
तेल लीयो खल चौपे जोगी, खलपण सूंघी बिकाणो।
कालर बीज न बीज पिराणी, थलसिर न कर निवाणो।
नीर गए छीलर कांय सोधो, रीता रह्या इवाणो।
भंवता ते फि रता फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणे तड़े तड़ंगे।
पड़े पखाणे ह् वातो सिद्धि न काई, निज पोह खोज पिराणी।
जे नर दावो छोड्यो मेर चुकाई, राह तेतीसों की जाणी।।
राव सांतल ने पूछा- हे देवजी! ये लोग एक ईश्वर विष्णु परमात्मा को छोड़ कर अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। इनकी पूजा करना आप जैसे अवतारी पुरुषों ने तथा वेद शास्त्रों ने बतलाया है या नहीं? इसके बारे में आप मुझे बतलाइये, कि कल्पित देवता पूज्य हैं या नहीं? तब श्री देवजी ने शब्द सुनाया-हे सांतल! कुछ लोग योग साधना के बहाने छाया चढाते हैं या कांपते हैं या सर्दियों की रात्रि में धूणी धुका लेते हैं। कपड़े नहीं ओढते। सर्दी के मारे कांपते हैं और पूजा पत्थरों की करते है। ऐसा परमात्मा ने तो नहीं फ रमाया। प्रथम तो मूर्तिकार मूर्ति को बनाता है। मूर्ति बनाने वाला गुरु और मूर्ति उसकी चेला। किन्तु निर्माण कर्ता गुरु ही चेला के चरणों में पड़ता है। नीचे गिर कर प्रणाम करता है। यही तो अन्याय है। हे लोगों, देखो! ये लोग सजीव मूर्ति का तो निरादर करते हैं किन्तु निर्जीव पत्थर या काठ कणजो, चांदी, मिट्टी या अन्य प्रकार की मूर्ति बना कर उसको कपड़े के अंदर छिपाते हैं। भोग लगाते हैं, स्नान कराते हैं, सुलाते हैं तथा नीचे पडकर धोक भी लगाते हैं। उन पुजारियों से पूछते हैं कि इस प्रकार से हरि मिलेंगे। तो ये लोग यही कहते हैं कि धैर्य रखो, हरि आयेंगे, दर्शन देंगे।
इस प्रकार से भोली-भाली जनता को भ्रमित करने वाले पुजारी, ब्राह्मणों से तो भार ढोने वाला पशु ही अच्छा है, जो भार तो ढोता है। कुछ हमारा भार हल्का ही करता है। किन्तु ये तुम्हारे पुजारी तो तुम्हारे ऊपर भार डाल कर के और भी बोझिल बना देते हैं तथा बुत (कल्पित मूर्ति) से तो जीते जागते कुत्ते भी अच्छे हैं, जो भूले भटके हुए को मार्ग बता देते हैं। कहीं रात्रि में मार्ग से भटक जाये तो कुत्ते को भौंकता हुआ सुनकर गाँव का पता लग जाता है, और यदि कोई रात्रि में चोर आ जाये तो कुत्ता भौंककर जगा देता है। किन्तु ये बुत नहीं जगा सकेगी। चोर तो इन बुतों को ही उठाकर ले जायेंगे तो भी ये बुत नहीं कहेंगे कि हमें क्यों ले जाते हो?
भूत-प्रेतों की लोग पूजा करते हैं। ये भी वायु प्रधान शरीर वाली जीव योनियाँ हैं। मरने के पश्चात् कुछ जीवों को जन्म प्राप्त नहीं होता तो अधोगति में चली जाती हैं, इनकी पूजा पाखण्ड है। असलियत में पूजा योग्य तो एक भगवान् विष्णु ही हैं, जो सर्व सृष्टि का पालन-पोषण करने वाले हैं।
हे प्राणी! बार बार कूकस (थोथा भूसा) को क्यों दलता है (पीसता है) यह तो पाखण्ड ही है। क्योंकि एक बार दाने निकल गये तो फिर दुबारा दाने उसमें कहाँ से मिलेंगे। तिलों में से तह्यल निकाल लिया जाता है, तो पीछे खली ही शेष रह जाती है। जो केवल पशुओं के खाने योग्य ही रहती है। उस खली की कोई कीमत नहीं है। उसी प्रकार से शरीर से जीवात्मा निकल गयी, तो पीछे केवल शरीर खली समान ही है।
ये भूत प्रेत भी ऐसे ही हैं। भूत प्रेतों की सेवा करना तो कालर भूमि में बीज बोना है। जहाँ पर अनाज नहीं पनपता। बीज ही व्यर्थ में चला जाता है। कल्पित देवताओं की पूजा तो व्यर्थ का ही परिश्रम है। नीचे की पकी जमीन में तालाब खोदने से तो जल ठहरेगा, सभी जीव जल पीयेंगे। सभी का भला होगा। किन्तु कोई अज्ञानता वश धोरे-टीबे पर कोई तालाब खोदे तो वहाँ जल कहाँ ठहरेगा? परिश्रम व्यर्थ ही होगा। ऐसा ही अन्य देवता की पूजा करना व्यर्थ का परिश्रम है, निष्फ ल है।
कुछ साधु संत लोग सिद्धि प्राप्ति हेतु भ्रमण करते हैं, भटक रहे हैं, अज्ञानता से विमूढ हैं। कहीं श्मसान भूमि मे जाकर भूत-प्रेतों की सेवा करते हैं। कई लोग खड़े ही रहते हैं। पत्थरों पर जाकर सिर रगड़ते है। वहाँ पर सिद्धि कहाँ है?
हे प्राणी! तू अपने स्वकीय स्वाभाविक मार्ग की खोज कर। जिस मानव ने अहंकार छोड़ दिया है, मेरापन त्याग दिया है, उसी ने ही तेतीस करोड़ के उद्धार का जो मार्ग है उसी को जाना है। अन्य तो केवल देखा-देखी ही करते हैं। रास्ते से भटके हुए हैं। वे क्या जाने मार्ग को?
राव सांतल ने पूछा-हे गुरु देव! मुझे क्या करना चाहिए? हे महाराज! मैं प्रसन्नचित नहीं हूँ, क्योंकि मैं देखता हूँ कि सभी राजा लोग अपने पुत्रों के साथ राज्य कर रहे हैं, किन्तु मेरे एक भी पुत्र नहीं है। आप कृपा करके मुझे एक पुत्र दीजिए। यदि आपकी आज्ञा हो तो एक विवाह और करूं। मेरे अन्तर में बहुत ही इच्छा है। मैं दुखी हूँ। एक पुत्र हो जाये तो मेरा दुःख दूर हो जायेगा।
श्री देवजी ने कहा-हे सांतल! तेरे घर में मुझे तेरह स्त्रियाँ दीख रही हैं। इनके ही जब नहीं हुआ तो तू तेरह विवाह और भी करले तो भी नहीं होगा। सांतल ने पूछा-हे देव! इसमें क्या कारण है? कि संतान नहीं हो रही है। बालक नहीं हो रहा है। इसमें मुझे कौनसा शाप लगा है?
ऐसा कौन सा पाप मेरे खाते में जमा है, जो संतान नहीं होने देता। हे सांतल! तुम्हारे पोते जमा पाप पुण्य ही नहीं है। बालक तो तभी होगा, जब तुम्हारे पुण्य पाप जमा होगा। या तो कुछ लेना होगा या कुछ देना होगा। यदि किसी का देना है, तो वह आपका पुत्र बन कर के आयेगा और वह तुम्हारी संपत्ति का मालिक बन जायेगा और अपना दिया हुआ वापिस ले लेगा। और यदि आपको कुछ किसी से लेना है तो वह आपका पुत्र बन कर आयेगा और अपना सेवा करके दे जायेगा। अपना कर्जा चुका देगा। इसीलिए हे सांतल! तुम्हारे पूर्व जन्म का न तो कुछ लेना है और नहीं कुछ देना है। इसीलिए संतान नहीं हो रही है।
देव ने कहा- हे सांतल! अपने जीवन के बारे में विचार करो। पूर्व जन्म के कर्म संस्कार तुम्हारे साथ हैं। अब आगे मुक्त होने की बात करो। आप पूर्व जन्म के पुण्य से राजा बने हैं। अब आगे की जिंदगी कहीं नीचे न गिर जाये, ध्यान रखो। इसीलिए सुशील बनो। स्नान करो। मद्य-मांस से दूर रहो। इस प्रकार से जीवन व्यतीत करोगे, तो संसार सागर से पार उतर जाओगे। देवजी की बात सांतल ने स्वीकार की, तथा शुद्ध जांभाणी पंथ का पथिक बन कर उनतीस नियमों का पालन किया। वहाँ से सांतल विदा हुआ। अपने भानजे को छुड़ाकर जोधपुर वापिस चला आया।
सतगुरु देव वहीं थांवला साथरी पर विराजमान थे। उसी समय रणसीसर का रावल अपनी सेना सहित सांतल की सहायता हेतु आया था। सांतल के जाने के पश्चात रावल देवजी के पास आया। रावल के पास चढने के लिए तेजस्वी ऊँट था। जाम्भोजी के नजदीक आकर ऊँट को बैठाया और रावल ऊँट से नीचे उतरा। देवजी के चरण स्पर्श करने हेतु, ऊँट को छोड़कर आगे बढा ही था।
तभी ऊँट चमक कर के भागा। पास में खड़े दूसरे लोगों ने कहा- ऊँट गया, ऊँट गया। जब लोगों ने कहा तब रावल सचेत हुआ किन्तु तब तक तो भाग चुका था। रावल के हाथ से छूट चुका था। देवजी ने रावल को कृष्ण चरित्र दिखलाया। ऊँट के पीछे अपना हाथ लंबा बढाया। आगे ऊँट भाग रहा था पीछे श्री देवजी का हाथ उसे पकड़ने के लिये जा रहा था। मानो बादलों में बिजली चमकती हुई आगे बढ रही थी। देवजी के हाथ ने ऊँट को पकड़ लिया था।
उस समय तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि ऊँट गया किन्तु कर्ता जी के हाथ लंबे हैं। जहाँ तक जायेगा, वहीं तक आगे हाथ तैयार है। रावल तथा अन्य सभी ने यह आश्चर्य देखा। रावल ने देवजी की करामात देखी और कितने दूर से हाथ ने ऊँट को पकड़ा था वह धरती मापी तो अठारह पैण्ड लंबा हाथ श्री देवजी ने बढाया था।
श्री हरि ने भक्तों का भाव देखकर यह आश्चर्य दिखाया था। रावल ने देवजी के चरणों में प्रणाम किया और वहीं पर बैठ गये। रावल अति प्रसन्न होकर देवजी की महिमा का गुणगान करने लगा। हरि हरि बोलते हुए चरण कमलों को स्पर्श करता हुआ अपने को धन्यवादी माना। साथ में जितने लोग थे वे सभी प्रसन्न मुद्रा में थे।
रावल अपने साथियों सहित वहाँ श्री जी के पास ही बैठा ही था कि उसी समय एक रैबारी ऊँट साँढ चराने वाला दूध लेकर आया। सतगुरु ने कहा-बिना हाथ धोये तू दूध ले आया है। एक ऊँटनी ब्याही थी,उसका मल तुम्हारे हाथों में लगा था, उन्हीं हाथों से तू दूध दूहकर लाया है। सतगुरु ने बिना देखे ही यह बात बतलाई थी, किन्तु बात तो सत्य ही थी।
रैबारी ने कहा-बात तो आपकी सत्य है। देवजी ने उस दूध को वापस लौटा दिया और कहा-इन लोगों के लिए दूसरा दूध हाथ धोकर ले आओ। अपना पात्र उस रैबारी को दिया और अपना एक आदमी साथ में भेजा। रैबारी ने दुबारा जाकर पवित्रता से दूध दूहा और देवजी के सामने लाकर रखा।
रावल के सेवकों से कहा-जाओ जल ले आओ। और दूध की खीर बनाओ। सेवकों ने कहा-हे देव! हमारे पास तो बरतन भी नहीं हैं, खीर किसमें बनायें? सिरजनहार ने अरदास सुनी और बतलाया कि जो आपके सामने सरकंडा दिख रहा है, इसके पास जमीन में गडे हुए बरतन हैं खोदकर, निकाल कर ले आओ।
सेवक खोदकर सभी बरतन ले आये। बड़े ही सुंदर चमकते हुए बरतन थे। अभी ही मानो किसी ने रखे हों। इसी समय ही मानो किसी ने बनाए हो। बिल्कुल नये सुंदर। या कोई रखकर भूल गया हो। पात्रों को देखकर पूछा-हे देव! ये पात्र किसने रखे हैं? श्यामजी ने कहा-ये बरतन तो अलौकिक हैं किसी साधारण कारीगर द्वारा निर्मित नहीं हैं। सृष्टि के कर्ता ने ही बनाये हैं। अन्यत्र ऐसे बरतन दुर्लभ ही हैं। कृष्ण चरित्र द्वारा ही ऐसी अनहोनी हो सकती है। यह कृष्णी माया ही है।
अग्नि जलाई और कड़ाही दूध की भर कर के चढा दी। दूध उबलने लगा। रावल जी ने कहाचावल नहीं हैं। बिना चावल के खीर कैसे बनेगी? देवजी! चावल चाहिए। श्री सिद्धेश्वर जी ने कहा-यहाँ बालू मिट्टी में चावल मिले हुए हैं, छान कर निकाल लीजिए। बालू रेत छान कर चावल निकाले। दूध में डाले खीर पक कर तैयार हुई। खीर में महकार आ रही थी। रावल ने देखा कि ऐसी खीर तो कभी न देखी और न ही चखी है, यह तो विचित्र खीर है।
कांसी के बरतनों में खीर परोसी। रावल भगवान् का प्रसाद मान कर जीमने के लिए बैठे। खीर खाते जाते और बड़ाई करते जाते। रावल ने कहा-हे देव! आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। कृपा कर के मुझे भी आपके शिष्यों के साथ सम्मिलित करके बिश्नोई बना लीजिए। जांभोजी ने रावल को पाहल पिलाया, बिश्नोई पंथ में सम्मिलित किया।
रावल ने आज्ञा ली और वहाँ से प्रस्थान किया। रावल अपने घर पहुँचा। रावल की नारी ने देखा कि इन्होंने तो सिर मुण्डवा लिया है। जाम्भोजी का चेला मोडा बन गया है। मुंडित सिर को देख कर रोने लगी। लोगों ने कहा-ऐसा क्यों रो रही हो? मैंने क्या अवगुण किया है, क्या अपराध किया है? भाई भतीजे आकर रावल से मिले। रावल को सिर मुंडित देखकर बहुत दुखी हुए।
उन लोगों से रावल ने कहा-परब्रह्म ही सम्भराथल पर प्रगट हुए हैं। उन देवजी ने मुझ पर दया की है। बड़े प्रेम भाव से मुझे बिश्नोई बनाया है। आप दुःखित होकर रो क्यों रहे हो? वहाँ के गणमान्य प्रधान लोगों ने रावल को निमंत्रण देकर भोजन हेतु बुलाया। ससम्मान रावल को बैठने के लिए बिछौना दिया। भोजन परोसा और कहा-भोजन करो।
रावल ने उनका कहना नहीं माना और कहा-मैं तुम्हारे द्वारा बनाया हुआ भोजन नहीं करूँगा। क्योंकि तुमने शुद्धता (पवित्रता) से भोजन नहीं बनाया है। तुम सभी असंस्कारित जीव हो। मैं जाम्भोजी का शिष्य बिश्नोई हूँ। गृह लक्ष्मी ने पूछा-तो आप किस प्रकार का भोजन करेंगे? रावल जी ने कहा-यह देवजी की आज्ञा है कि मैं बिश्नोई का ही भोजन करूँ। प्रथम तो आप सभी लोग बिश्नोई बनें। तब मैं तुम्हारा भोजन करूँगा।
रावल जी के वचनों को सुना सभी ने, किन्तु उनमें से एक लाहणी जो वरो जाट की बेटी थी, वह बिश्नोई हो गयी। रणसीसर के मंगोवल के साथ विवाह हुआ था। लाहणी का पिता वरो जाट बड़ी बासनी बास में रहता था। लाहणी राव4 के बताये मार्ग पर चल रही थी। बिश्नोई पंथ की पथिक बन कर अपने पति मंगोवल के साथ धर्म का आचरण कर रही थी।
वरो कहने लगा- रावल की मति तो किसी योगी संन्यासी ने हरण कर ली है। उसके देखा देखी मेरी बेटी भी मति हीन हो रही है। कुछ दिनों बाद वरो ने अपनी बेटी को अपने घर पर लाने की सोची। वरों ने अपने बेटे को भेजा कि जाओ अपनी बहन को कुछ दिनों के लिए ले आओ। भाई ने बहन से जाकर पीहर चलने का निवेदन किया-तुम्हारे माता-पिता तुम्हें देखने के लिए व्याकुल हैं। तुम्हे मिले को बहुत दिन हो गये हैं।
माता-पिता ने कहा है कि लाहणी बिश्नोई बनकर बहुत कष्ट उठाती है। प्रातः काल के स्नान से लेकर सभी क्रियाएँ कष्टदायक ही तो हैं। लाहणी अपने पीहर जाने के लिए तैयार हुई, किन्तु रावलजी ने कहा-तू पीहर मत जा। वहाँ तेरे से नियमों का पालन नहीं होगा। तू अपने नियमों पर अटल अपने पति मंगोवल के साथ रह कर ही कर सकती है।
मंगोवल और तुम दोनों ही बिश्नोई बन चुके हो। पवित्र शुचि शीलवंत बन चुके हो। अब तुम लोग उनका भोजन कैसे करोगे? जो तुम्हारे पीहर के लोग अपवित्र हैं। यदि उनके यहाँ भोजन करोगी तो तुम्हारा धर्म नष्ट हो जायेगा। लाहणी अपने माता-पिता से मिलने के लिए उतावली हो रही थी। अपने धर्म- नियमों की रक्षा का वचन अपने पति एवं रावल को देकर अपने भाई के साथ पीहर चली गयी।
वरो का दूसरा भाई भोजो नींबड़ी रहता था। मंगोवल की वार्ता भोजो ने सुनी थी। वह अपनी भतीजद्ध लाहणी को अपने गाँव नींबड़ी ले गया। कुछ दिनों के पश्चात् मंगोवल भी अपनी पत्नी लाहणी को लाने के लिए अपनी श्वसुराल गया। वहाँ पर किसी ने भी मंगोवल का आदर नहीं किया। कुछ अन्य पास पड़ौस के लोगों ने सामान्य आदर किया। मंगो को चारपाई बिस्तर लाकर दे दिया। मंगोवल ने देखा कि चारपाई बिस्तर गंदे हैं। बैठने लायक ही नहीं हैं। देवजी की आज्ञा का स्मरण किया और चारपाई बिस्तर छोड़ कर नीचे धरती पर ही अपना आसन बिछाकर बैठ गया।
अपने दामाद को नीचे बैठा देख करश्वसुराल के लोग जो भी आते हंसी उड़ाते। देखो कैसे हमारा दामाद बैठा है? यहाँ नीचे बैठा हुआ कितना सुंदर दिखता है। मूर्ख लोग फि टीफि टी कहते हुए धिक्कार कर रहे थे। कहने लगे-रीणसी ने ऐसा ही कपूत जन्मा है। सभी ऐसे ही हैं।
जाट कहने लगे-अपने नियम शील स्नान को छोड़ कर यदि हमारा भोजन करेगा तो ठीक है अन्यथा तुम्हारी हालत खराब होगी। जाटों ने मंगोवल को पकड़कर झोंपड़े में बंद कर दिया। किन्तु मंगोवल ने उनका कहना नहीं माना। उन लोगों ने भोजन लाकर जबरदस्ती जिमाने की कोशिश की किन्तु मंगोवल ने उनका भोजन स्वीकार नहीं किया।
जाट कहने लगे-अब इसका क्या करें? हमारा भोजन नहीं करता। या तो आठ प्रहर तक भोजन कर लेगा, नहीं तो हम इसकी हत्या कर देंगे। हमारी लड़की किसी अन्य से विवाह देंगे। साधु सज्जन विपत्ति आने पर भी धर्म नहीं छोड़ते, क्योंकि उनका रखवाला तो स्वयं परब्रह्म परमेश्वर है। दुष्टों ने दुःख बहुत दिया। संकट की घड़ी को मंगोवल ने सहन करके पार की। भक्त के कष्ट को देखकर जाम्भोजी प्रगट हुए और उनके दुख को दूर किया। धैर्य बंधाया और कहा- हे मंगोवल! तुम जाटों को एक परचा चमत्कार बताओ। तभी ये लोग मार्ग पर आयेंगे। जाटों का भाई भोजा मारा जा चुका है। ऐसा इन्होंने सुना है किन्तु भोजा अब तक जिंदा है। नवें दिन आ जायेगा। ऐसा इनको तू बता देना ये लोग तुम पर प्रसन्न हो जायेंगे। ऐसा कहते हुए श्री सिद्धेश्वरजी वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
प्रातः काल ही जाट लोग एकत्रित हुए और मंगोवल से बात पूछने लगे-मंगोवल! तुमने अपने कुल की मर्यादा तोड़ दी। जाम्भोजी से तुम्हें क्या मिला? जाम्भोजी तो परचा बहुत देते हैं। तुम भी उनसे कुछ सीखे हो या नहीं? यदि कुछ जानते हो तो चमत्कार करो और छूट जाओ।
मंगोवल ने कहा- तुम्हारा भोजा घोड़ा बेचने गया था, किन्तु वापिस नहीं लौटा। किन्तु अब नवें दिन लौट आयेगा। जाटों ने आश्चर्य प्रकट किया कि अब तक हमरा भोजा जिन्दा है? वापिस लौट आयेगा? यह तो हमारे पक्ष की सुंदर बात कही। क्या पता ऐसा ही हो? ऐसा कहते हुए मंगोवल को झोंपड़े से बाहर निकाल दिया। हमारे से चूक हुई है। हमें भक्त के प्रति ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमने आपसे द्वेष भाव रखा, आपको सताया, अच्छा नहीं किया।
नवें दिन भोजो लौट आया। सभी ने प्रेम भाव से मिलन किया। सभी जाट मंगोवल से भी प्रेम से मिले और जाम्भोजी एवं उनके भक्तों को भी धन्यवाद दिया। मंगोवल एवं लाहणी को प्रेम से विदाई दी। वो भक्त दंपत्ति अपने गाँव रणसीसर वापस लौट आये। त्रिभुवन नाथ ने सभी का कार्य सिद्ध किया।
बिश्नोई पंथ का प्रारम्भिक काल कंटकों से परिपूर्ण था। अनेक कष्टों को सहन करके भी धर्मवीर लोगों ने इस पंथ को सुदृढ किया। इसकी नींव गहरी एवं मजबूत है। सामान्य तूफानों से हिलने वाली नहीं है। अपने खून से सींच सींच कर इस धर्म रूपी बेल का संवर्धन किया है।