आठवाँ अध्याय · कथा 49
मलेर कोटले में गऊ हत्या बन्द करवाना
जम्भेश्वर जी ने बाजे को काली पोशाक पहनाई और आज्ञा देते हुए कहा- हे बाजा! आप मलेर कोटले जाओ। वहाँ पर बाग में एक खुदा की मस्जिद है। शेख सदू खान नित्यप्रति सैकड़ों गऊवों को मरवाता है। जिसके पाप का कोई पार नहीं है। शेख सदू नित्यप्रति वहाँ पर नमाज पढने आता है नमाज पढ कर गो हत्या करवाता है। जिस पाप से बाग सूख गया है। सूखा बाग देखकर शेखसदू चिन्ता में पड़ा हुआ है। अब समय आ गया है। आप अवश्य ही जाओ। वहाँ पर गो हत्या बन्द करवाओ।
हे बाजा! तुम यहाँ से जाओ। साँय समय में बाग में ही जाकर आसन लगाना। प्रातः काल वहाँ पर हवन करना। तुम्हारे बाग में प्रवेश करने से ही वह सूखा हुआ बाग हरा-भरा हो जायेगा। यही प्रमाण मानना। हवन करने के पश्चात् बावर्ची में जाना। ये आठों टके, जो तुम्हारे पास हैं ये देग में डाल देना। ये टके डालकर सिद्ध मन्त्र का उच्चारण करना। अग्नि देवता को मेरी आण देकर कहना कि तपे नहीं। ठण्डी हो जाये तथा करद जो कश्यप कुल में उत्पन्न हुआ है, उन्हें भी कश्यप कुल की आण देना और कहना कि तू कश्यप कुल में उत्पन्न हुआ है। इसलिये काटो मत। फिर बाग में जाकर आसन लगा लेना।
जब तुम्हारे पास शेख सदू आवे तो उसे समझाकर यहाँ पर मेरे पास ही ले आना। बाजोजी ने जाम्भोजी की आज्ञा शिरोधार्य कर वहाँ श्री देवजी को नत मस्तक होकर परमात्मा का स्मरण करते हुए रवाना हुए। थोड़े ही समय में मलेरकोटले (पंजाब) पहुँच गये। वहाँ जाकर जैसा जाम्भोजी ने कहा था, उसी अनुसार बाजोजी ने कार्य किया। बाजोजी ने देखा कि सुखा बाग हरा-भरा हो गया है। जो व्यक्ति मन, बुद्धि, इन्द्रियों का संयम कर के जो भी संकल्प करता है, वह पूर्ण होता है। बाजो का संकल्प भी पूरा हुआ और बाग में बैठे हुए हवन कर रहे थे।
एक काजी दौड़ा हुआ शेखसदू के पास गया और कहने लगा-हा अल्ला! अब क्या करे? हमारी रोजी रोटी बन्द हो गयी। शेखसदू ने पूछा कि क्या हुआ? हुआ क्या? न तो अग्नि तप रही है,जल ठण्डा पड़ा हुआ है। हम तो मारे गये। नहीं करद काट रहा है। न जाने क्या हुआ? शेखसदू ने पूछा आगे क्या हुआ? कोई फकीर अवलियापीर तो तुम्हारे यहाँ नहीं आया था। यह अग्नि बाँधना, करद का न चलना तो इन सिरफि रे फ कीरों की करामात होती है।
काजी ने कहा-हाँ। एक काली बरदी साँई के वेश में आया तो था। देगों के पास ही खड़ा था। कुछ देख रहा था। फिर वहाँ से करद के पास भी गया था। वहाँ खड़ा खड़ा होठ हिला रहा था। न जाने उसने क्या पढा होगा? हो सकता है उसी ने ही कुछ किया होगा। शेखसदू ने पूछा-अब वह कहाँ गया होगा? किसी ने बतलाया कि वह तो बाग में बैठा हुआ हैं। शेखसदू ने बाग की तरफ देखा तो आगे बैठे हुए हैं। शेखसदू जाकर चरणों में गिर पड़ा।
बाजोजी सकुचाते हुए कहने लगे हे शेख ! तू मेरे चरणो में क्यों गिर रहा है। यह बाग मेरे से हरा-भरा नहीं हुआ है। इसको हरा-भरा करने वाला तो बागड़ देश में सम्भराथल पर श्री जाम्भोजी विराजमान हैं। उन्हीं के चरणों में गिरो। वहीं तुम्हारा भला होगा।
इस प्रकार से बाजोजी की करामात देख कर के खान ने आदेश दिया कि अति शीघ्र चलो। बागड़ देश में जाम्भोजी के दर्शन करके जीवन लाभ लेगे। खान की आज्ञा मान करके अनेक घोड़े,हाथी सवारी हेतु तैयार किये। शेख सदू बाजेजी के साथ सम्भराथल पर श्री देवजी के पास आये।
जाम्भोजी ने भी सुपात्र अधिकारी जान कर आदर ही किया। जीव कर्मो के अनुसार भटक जाता है। किन्तु जब भी सचेत हो जाये तभी ही भला हो जाये। दुराचारी से भी दुराचारी, पापी से भी पापी यदि भगवान् की शरण में आ जाये, तो भी भगवान् कहते हैं कि मैं उसे साधु ही बना देता हूँ। साधु समान ही समझता हूँ।
शेख सदू ने पूछा हे देवजी! स्वर्ग जाने का मार्ग बताओ? नरक की तो बात सुनने से ही डर लगता है। ऐसा शब्द सुनाइये जिससे दोजक से छूट सकें। श्री देशजी ने शब्द सुनाया-
शब्द-112 ओ३म् जंके पंथ का भांजणा, गुरु का नींदणा, स्वामी का दुस्मणां।
कुफर ते काफ रा, कुमली कुपातूं, कुचिला कुधातूं।
हड़हड़ा भड़हड़ा, दाणबै दूतबा, दाणबे भूतबा।
राकसा बोकसा, जाका-जन्म नहीं पर कर्म चंडालूं।
और कूं जिभै कर आप कूं पोखणा, जिंहि की रुवा ले दीजैसी।
दौरैं घुंप अंधारौं, तान बे तानबा, छान बे छानबा।
तोड़ बे तोड़बा, कूक बे पुकारबा, जाकी कोई न करबा सारूं।
हे खान! ईश्वर ने सनातन पन्थ चलाया है। प्रकृति द्वारा जो कुछ भी निर्मित है, वह वैसा ही रहे। उसको तोड़ना, मारना ,विकल्प पैदा करना ही पन्थ को तोड़ना है। गुरु स्वामी ईश्वर द्वारा बताये हुये मार्ग को छोड़ कर मर्यादा का उल्लंघन करना, गुरुकी निंदा अपमान करना है। स्वामी ही तो सृष्टि के कर्ता-धर्ता हैं। उन्हीं से दुश्मनी करना है। ऐसे लोग अनीति पर चलने वाले काफिर हैं। धर्म विनाशक हैं। अशुद्ध, कुपात्र, कुचील, तन-मन-धन से उनका जीवन बर्बाद है।
यह लोक बर्बाद हुआ, तो समझो पर लोक भी गया। ऐसे लोग दानव हैं। भूत प्रेत सदृश हैं, राकस है किन्तु बिल्कुल ही बोकस खाली है। उनका जन्म तो भले ही उच्च कुल में हुआ है किन्तु कर्म से चाण्डाल है। जो औरो को मार कर अपना पालण-पोषण करते हैं। उनकी जीव आत्मा दौरे (नरक) में डाली जाएगी। घुप अन्धकार होगा। वहाँ पर तानेगे तोड़ेगे,छानेगे,वहाँ पर भयंकर कष्ट में रोऐगा, पुकारेगा,किन्तु कोई सहायता नहीं करेगा।
हे शेख! यदि तुम ऐसा जीवन व्यतीत कर रहे हो, तो देखलो इसका फल भी ऐसा ही भयानक होगा। इसलिये यदि भिस्त चाहते हो तो जीव हत्या करनी छोड़ दो। जो जीवों को मारेगा तो जीव भी अनेकानेक रूप में आकर बदला तो अवश्य ही लेंगे।
“जीवो जीवस्य भोजनम्” जीव जीव का भोजन बनता है। यही तो चौरासी लाख जीव योनियो में भटकने की पंरपरा है। जो कभी समाप्त होने वाली नहीं है।
इस प्रकार से जाम्भोजी ने बाजे को मलेर कोटला भेज कर गो हत्या बन्द करवायी। यज्ञ का फल प्रदान किया। शेख सदो सतपन्थ का अनुगामी बना। अपने साथ सत्रह जीव मुक्ति को प्राप्त करवाये। सदा सदा के लिये जीव हत्या बन्द करवा दी। ऐसे श्री देव जम्भेश्वर को यदि सदा ही स्मरण करें, तो हमारा हृदय पवित्र होगा। ज्ञान ध्यान में अग्रसर हो सकेंगे।
बाजोजी तरड़ ने पूछा-जांभोजी! धरती ता उचौ कित एक उचौं सूरेज थै, केतो एक उचों चांद छः केता एक उंचा तारा थै,जाम्भोजी श्री वायक कहे-
शब्द-89 ओ३म् उरधक चन्दा निरधक सूरूं, नवलख तारा नेड़ा न दूरू।
नव लख चन्दा नव लख सूरूं, नव लख धंधूं कारूं।
तांह पररै तेपण होता,तिंहका करूं विचारूं।
हे बाजा! चन्द्रमा धरती के समीप ही है। सूर्य धरती से अधिक दूर है। नव लाख तारे कुछ तो नजदीक हैं, तथा कुछ बहुत ही दूरी पर हैं। सूर्य और चन्द्रमा के बीचो-बीच कुछ तारे हैं तथा कुछ शनि आदि तारे तो सूर्य से भी बहुत दूरी पर हैं। तो कुछ तारे चन्द्रमा से भी बहुत ही नीचे है। सूर्य चन्द्रमा ताराओं के बीच की दूरी भी नव लाख योजन है। यह ब्रह्माण्ड अनन्त है। इससे ग्रह नक्षत्र भी अनन्त हैं। इन सभी से ऊपर तो पुरुष परमात्मा विराजमान है। उस परमात्मा का घेरा तो सभी से बड़ा है। उसी में ही सभी समा जाते हैं।
हे बाजा! मैं तो उस पुरुष परमात्मा की बात करता हूँ। उसी की प्राप्ति हो जायेगी तो समझो सभी कुछ जान लिया। और कुछ भी जानने के लिये अवशेष नहीं रहा। इस प्रकार से थोथा बाजा बजने वाले बाजे को सुदृढ किया और दान की महत्ता बतलायी। युक्ति पूर्वक जीवन जीते हुए मुक्ति का मार्ग बतलाया। बाजोजी मुक्ति के अधिकारी बने,और सच्चे भक्त बन कर अपना उद्धार किया।