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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह59 / 94

नवां अध्याय · कथा 59

मूलो पुरोहित के प्रति शब्दोपदेश

एक समै देव जी दीवाण्य मूलौ पुरोहित आयौ। मूलो दूहो कह- मूल रो वचनविण्य

बोल्या समझै नहीं, बोल्या बड़पण जाय।

अबूझा सूं बोलणों, कारी लगै न काय।।

जाम्भोजी श्री वायक कह-

शब्द-103 ओ३म् देख्या अदेख्या सुण्या असुण्या, क्षिमा रूप तप कीजै।

थोड़े मांहि थोड़ेरो दीजै, होते नाहि न कीजै।

कृष्णद्ध मया तिहूँ लोका साक्षी, अमृत फूल फ लीजै।

जोय जोय नांव विष्णु के दीजै, अनन्त गुणा लिख लीजै।

मूलो पुरोहित पहले राव माल देव के साथ लोहावट की साथरी पर आया था। जाम्भोजी के चमत्कारों से परिचित हुआ था। अब की बार दुबारा घर-परिवार के झगड़े से दुःखी हो कर आया था। उन्होंने एक दोहा कहा-जिससे यह मालूम पड़ता है कि मूला अति दुःखी था। न तो अपने दुःख की बात किसी से कह सकता था और न ही कहे बिना रह ही सकता था। यदि किसी से कहे तो भी उसकी समस्या का कोई समाधान नहीं था। अंदर ही अंदर घुटन महसूस करते हुए जाम्भोजी के पास सम्भराथल पर आया था और इस प्रकार से कहने लगा- हे देव! मैं कुछ नहीं बोलता हूँ, तो वे लोग समझेंगे कैसे? अपनी बात मैं बोल कर ही बता सकता हूँ, और यदि सच्ची बात बोलता हूँ तो झगड़ा होता है। अपने ही परिवार से झगड़ा करना ठीक नहीं है। झगड़े से मेरी मान-मर्यादा बड़प्पन समाप्त हो जाता है।

अज्ञानी मूढ़ों से कुछ कहना ही व्यर्थ है। उस बोलने से कुछ भी नहीं होगा। इसलिए मूला कहने लगा- ऐसी दशा में मुझे क्या करना चाहिये? आप ही प्रमाण है। श्री देवजी ने मूले को लक्ष्य करके सभी के प्रति शब्द सुनाया-

हे मूला! जो कुछ तुम आँखों से देखते हो, वह तो अनदेखा करो। उसे देखकर उसे संस्कार रूप में जमने न दो। अन्यथा बीज की भांति वह अंकुरित हो जायेगा। देखा हुआ अनदेखा कर दो। संसार में रहोंगे तो अच्छा-बुरा सभी कुछ सुनोगे, किन्तु तुम्हें सुना हुआ भी अनसुना कर देना चाहिये। कानों के द्वारा सुना हुआ शब्द भी भीतर जाकर संस्कार के रूप में स्थिर हो जाता है और अप शब्द सुना हुआ तो संस्कार के रूप में बैठा हुआ सदा ही दुःख देता रहेगा। देखना-सुनना भी जीव को प्रदूषित कर देता है। इसीलिए अशुद्ध देखना- सुनना दोनों ही वर्जित है। शुद्ध देखना, सुनना हृदय को पवित्र कर के सदा ही आनंदित करता है।

हे मूला! क्षमा कर देना ही तपस्या है। अपने आप को संयमशील बना लेना ही सब से बड़ा तप है। संसार के लोग तो उत्तेजित करने की कोशिश करेंगे ही, किन्तु आप शांत रहिये। अपने आप के अहंकार को निवृत्त कर दे। यही बड़ी तपस्या ज्ञान प्राप्ति का साधन हो सकेगा। यदि आपके पाद्य थोड़ा है, तो थोड़ा ही दीजिए। आपके पास होते हुए याचक को ना न कहे।

दान कई प्रकार से किया जाता है। विद्या दान, भक्तिदान, द्रव्यदान, गोदान, वस्त्र दान, इत्यादि दिया जाता है। जिसको आवश्यकता है, आप उसकी आवश्यकता को पूर्ण करने में समर्थ हैं, तो अवश्य ही पूर्ण कीजिए। यह आपका सात्त्विक दान होगा। आवश्यकता पूर्ण की जा सकती है, किन्तु इच्छा किसी याचक की अब तक पूरी नहीं की जा सकी है। आवश्यकतानुसार माँगने वाला सुपात्र है तथा इच्छा पूर्ति हेतु माँगने वाला कुपात्र है। कुपात्र को दान देना तामसी है। उसका फल शुभ नहीं मिलता।

भगवान् कृष्ण की माया फूलती और फलती है। जिस प्रकार से सुखेत में बोया हुआ बीज फ लित होता है। यह माया तीन लोकों की साक्षी है अर्थात् तीनों लोकों का विस्तार इस माया से ही हुआ है। यह माया चंचला है। न जाने कब किस के पास जायेगी, धनवान बना देगी? तथा न जाने कब किससे मुंह मोड़ लेगी और कंगाल बना देगी?

हे मूला! अब तू विष्णु का नाम सचेत हो कर ले। यही तुम्हारे साथ जायेगा। शुभ घड़ी, संध्या बेला में लिया हुआ नाम अनंत गुणा होकर फूलता-फलता है। अन्य जंजाल छोड़ दे, यही तुम्हारे लिए ठीक रहेगा।

अमोसरय एकै संसारी दुहो कह्यौ-

सुणी असुणी करां, दीठी कर अदीठा।

पड़दो फाड़े न बोलिय, ज सीर बल अभिवाण।

मूल की मनसां निसा हुई, परच्य पाय लागौ।

उसी समय उपस्थित एक संसारी व्यक्ति ने एक दोहा कहा- हे देव! आप जो कहते हैं वह ठीक है। हमें संसार में युक्ति पूर्वक जीवन यापन करने के लिए ऊ टपटांग, अप्रिय सुनी-सुनाई बात अनसुनी कर देनी चाहिये और गलत आचरण आँखों से देखा हुआ भी अनदेखा कर देना चाहिये। तथा हमें सत्य प्रिय हितकर ही बोलना चाहिये। कभी ऐसी बात न कहे, जिससे गुप्त बात का पड़दा उठ जाये। कुछ बातें छिपाने योग्य होती हैं। उनको छुपाना ही चाहिये। तथा कभी अग्रगण्य बन कर चौधराहट नहीं करना चाहिये। यदि कार्य सुधर गया, तो उसका यश चौधरी को न देकर स्वयं अपने ऊपर लेंगे। और यदि बिगड़ गया तो सभी लोग अग्रगण्य पुरुष को ही दोष देंगे। मूला जो इच्छा लेकर आया था, जिस बात का समाधान चाहता था, वह इच्छा उसकी पूर्ण हो गयी। उसे समाधान मिल गया। श्री देवजी को प्रणाम किया। पुरोहिताई के अहंकार को गिरा कर के शुद्ध पवित्र मानव बन कर के शांति को प्राप्त हुआ। नाथोजी उवाच- हे वील्ह! मैंने वहाँ पर देखा कि उपस्थित जन समूह को जाम्भोजी ने एक पहेली सुनाई वह इस प्रकार से पहली सतगुरु जमात्य सं कही।

करषण संथाने पाप की जंत,खल संथान मुच्यते।

खल संथाने पाप की जंत,सो ग्रह संथाने मुच्यते।

ग्रह संथाने पाप की जंत गुरु संथाने मुच्यते।

गुरु संथाने पाप की जंत,से बजर लेप लिपते।

श्रब संथाने पाप की जंत,ते बुडत भवसागरूं।

सद्गुरु ने जमात से पहेली इस प्रकार से कही-कृषक खेती करता है। अन्न आदि पैदा करता है,खेती करने से अनेक जीवों की हत्या एवं कष्ट होता है। उससे जो पाप होता है, वह तो जब खला यानि अनाज लूण चूण कर के निकालते हैं, तब वह पाप समाप्त होता है। तथा धान निकालते समय गाहटा आदि करने में जो पाप होता है, वह अनाज घर लेजा कर रोटी बना कर सभी को खिलाते हैं, तो उस पुण्य से पाप नष्ट हो जाता है। घर में अनाज पीसना, रोटी बनाना,आदि से जो चूल्हे चोके में होने वाला पाप वह गुरु स्थान में जाकर दान-पुण्य करने से, सुभ्यागतो को भोजन देने से उस पाप से मुक्त हो जाता है। गुरु स्थान में जाकर कोई दुर्भावना करे, मानसिक पाप करे तो वह बज्रलेप हो जाता है। छूटना असंभव है। सभी स्थानों में सर्वत्र पाप ही पाप करे, तो वह अवश्य ही संसार सागर में डूब जायेगा। इसलिये सावधान होकर सर्वत्र पाप से अवश्य ही बचें।

नाथोजी उवाच-उसी समय ही वहाँ उपस्थित गोरा बागड़ियाणी पूछ-जाम्भाजी! थोड़ा आखर घणो नफो हुवै असा सिखावौ। जाम्भोजी पहेली कह -

सीनान दान कण किया,होम जाप मेव चुं।

एक बोल जुग च्यारी,देव दान प्रजकुं।

गोरा कहने लगी-हे देवजी! हम लोग अनपढ है ज्यादा अक्षर हमें याद नहीं रहते, थोड़ा अक्षर होवे ऐसा अक्षर ज्ञान हमें बतलावे।

जाम्भोजी ने पहेली सुनाई-प्रातःकाल में स्नान करना, सुपात्र को दान देना, शुद्ध आचरण करना, हवन करना, विष्णु का जप करना, सत्य प्रिय मधुर वचन बोलना, चारों जुगों से चले आ रहे एक ही नियम में स्थिर रहना। देव पूजा करना यही दान है।