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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह82 / 94

बारहवाँ अध्याय का उतरार्द्ध · कथा 82

सिद्ध कवि सुरजन जी महाराज

वील्होजी के उतराधिकारी शिष्य सुरजन जी योगी कवि,पण्डित,बहुज्ञानी,स्वर ज्ञान के परम ज्ञाता थे। दूसरे शिष्य केशोजी भी सुरजन जी की तरह ही कवि एवं ज्ञानी थे। दोनों ही जाम्भोजी के प्रिय, मानो मन रूप ही थे। सुरजन जी का जन्म समय वि सं- सौलह सौ चालीस और मृत्यु सत्रह सौ अड़तालीस अनुमानित है। भींयासर गाँव के पूनियाँ गोत्र के बिश्नोई थे। बचपन में ही वैराग्यवान होकर वील्होजी के शिष्य बन गये थे।

एक समय सुरजन जी अपनी साधु मण्डली के साथ भ्रमण करते हुए जोधपुर नरेश जसवंतसिंह के पास पहुँचे। जोधपुर के लौह पोल पर सुरजन जी ने अपने गुरु वील्होजी की भांति आसन लगाया। संध्या बेला में आरती एवं साखियाँ मधुर ध्वनि में सुरजन जी ने अपने साथियों के साथ गायीं। ऐसी प्रिय मनमोहक ध्वनि नगरी के लोगों ने सुनी। सवा प्रहर रात्रि व्यतीत होने तक मजीरा झांझ का झणकारा राजा एवं नगरी के लोगों ने प्रथम बार ही सुना था। उस समय तो गाना बजाना पूर्ण करके भगवान् का ध्यान करते हुए सो गये।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठ खड़े हुए शौच स्नानादिक नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर सुरजन जी हवन करने बैठे। वेद रूपी शब्दों की मधुर ध्वनि गाते हुए यज्ञ देवता की प्रसन्नता के लिये आहुति प्रदान की। कानो में वेद मंत्र की ध्वनि सुनाई दे रही थी। जो बहुत ही कर्ण प्रिय थी। नासिका में दिव्य हवन की सुगंधी प्रवेश कर रही थी।

अकस्मात् ही जोधपुर नरेश एवं रानी का मन बुद्धि आकर्षित हुआ। और पूछा कि इधर लोहा पोल पर रात्रि से लेकर अब तक भजन कर रहे हैं वे लोग कौन हैं? उस समय राजा के पास रहने वाला एक आवड़ दान चारण कहने लगा-हे राजन! यह तो बिश्नोई साधुओं का टोला है। न जाने यहाँ पर किस कार्य हेतु आया है। चारण ने तो यह बात उपेक्षा भाव से कही थी, किन्तु जसवंतसिंह कहने लगा-चलो, मिलने चलते हैं। राजा ने भेंट सजाई और प्रेम भाव से मिलने के लिये चल पड़े।

राजा ने चारण के भाव को अनसुना कर दिया। वह राजा पूर्ण धार्मिक विचारों वाला आदमी था। वह धर्म के मर्म को जानने का इच्छुक था। इसलिये संत मिलन हेतु राजा चला। राजा जानता था कि संत के पास जाने में लाभ ही लाभ हैं। चारण भी राजा के साथ ही साथ चला था। राजा ने सुरजन जी के सामने भेंट रखी। और आगत स्वागत करने के पश्चात पूछा -

उसी समय ही वह चारण बोला-खेती तो फल युक्त हो गयी है, किन्तु कैर फूले-फ ले नहीं हैं? यह व्यंग्यात्मक वचन कहा -सुरजन जी ने जवाब देते हुए कहा -यही तो मुझे हैरानी-परेशानी है कि ऐसी हरकत क्यों की जा रही है? फिर वह चारण कहने लगा-आप साधु हो गये, फिर भी हैरान-परेशान हो तब साधु ही क्यों बने? तब सुरजन जी ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए एक छन्द कहा-

ऐक बड़ो हरान,पाव जसराज पखारे।

मेछागढ मेड़ते जाय,जोधाण जुहारे।

महल गया घर मेल,पीव परदेश पधारे।

दिज मूरत देहरा यगाय बजाय सिधारे।

मुवौ न कोई मीर छल,च्यार खूंट काने चड़ी।

हरान आठ एकण समै,हुवा जूं मुरधर बापड़ी।

सुरजन जी ने कहा- मैं हैरान नहीं हूँ। मैं तो सर्वथा आनन्द में हूँ। हैरान तो वही होगा जो नित्य प्रति राजा के पाँवो में पड़ा रहता है। कभी मेछागढ कभी मेड़ते,कभी जोधपुर जाकर दीनता से प्रणाम करता है। अपना घर-परिवार स्त्री को छोड़ कर दो पैसों के लिये भटकता है।

हे चारण! हम क्यों हैरान होंगे? हमें तो द्विज की भाँति दरवाजे तक लोग सामने आते हैं। गा बजा कर स्वागत कर के अपने घर तक ले जाते हैं। हरि का भक्त ज्ञानी ध्यानी, अब तक कोई मरा नहीं है,ये तो सदा सदा के लिए अमर हो गये हैं। चारों दिशाओ में उनके नाम का गुणगान सदैव होता आया है और होता रहेगा।

हे चारण! यहाँ तो तुम्हारे जैसे कोई पराधीन,हैरान होगा। इस मरुधर भूमि में तो एक से एक बढकर महापुरुष हुए हैं। इस धरती को अपनी तपस्या से पवित्र तीर्थ बना दिया है। कहीं-कहीं सोने की थाली में लोहे की मेख होना संभावित-स्वाभाविक है। सुरजनजी ने इस विषय में ओर भी अनेकों छन्द कहे हैं।

उसी समय जोधपुर नरेश के मंत्री दुर्गादास ने कहा -महाराज! कोई अद्भुत परचा दीजिये। आप परमेश्वर जाम्भोजी की शिष्य परंपरा में इस समय सर्वश्रेष्ठ हैं। आप से पूर्व आपके गुरु वील्होजी यहीं पर आये थे। उन्होनें भी अद्भुत परचा दिया था। आप भी तो उनके जैसे ही सिद्ध पुरुष हैं। अवश्य ही कुछ अलौकिक कार्य करके दिखाएँ। सुरजनजी का इशारा जानकर दुर्गादास कहने लगा-

महाराज! इस समय वर्षा का समय आ चुका है। किसान लोग आकाश में बादलों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। किन्तु कहीं भी बादल की एक टुकड़ी भी नहीं दिखाई देती है। वर्षा कहाँ से आये? आप मरूधर में वर्षा करवा दो, तो हम राजा-प्रजा निहाल हो जायेंगे। सुरजनजी वहीं पर ही स्थित हो गये। हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगे- उसी समय ही सुरजनजी ने एक कवित गाया- वह इस प्रकार से हे-

गुड़े बंब निसाण, झील पड़ो गिरवरा।

आजरा पुन पालग आवौ,धूंधले बादले वरसो धरा।

ज्ञान मोरा तणौ ध्यान मोटा धणी। धेन आसीस दो दधारा।

भावनी पीव भरतार ने लाज ही, आज गजराज प्रहलाद धू द्व/ारै।

जगत में भगत की भीड़ भाजै, नीबल से सबल होय रोशने।

कीजियै लांघणै बाल, मायत लाजै।

हुय प्रसन्न मेह करो मोटा धणी, दुनि कर जोड़ आसीस दीजै।

विनती श्याम सुरजन तणी, संभलो कालपै माह कर मेह दीजै।

इस छन्द द्वारा सुरजनजी ने हार्दिक प्रार्थना की तो मेघों के देवता इन्द्र उसी घड़ी प्रसन्न हुए जैसलमेर की तरफ से बादल आये। घने बादल गर्जना करते हुए बिजलियाँ चमकने लगीं। घने बादलों से धरती पर दिन में ही रात्रि का आभास होने लगा। बीच-बीच में चमकती हुई बिजली रात्रि का आभास करवा रही थी। आकाश में बादल आ गये मानो काले पहाड़ ही आ गये हों।

सम्पूर्ण मरुधर देश में एक ही समय बहुत ही वर्षा हुई। सात दिनों तक लगातार ही वर्षा होती रही। सभी तालाब, नदी-नाले जल से परिपूर्ण हो गये। उफनने लगे। इसी प्रकार से अपार वर्षा हुई। दुष्काल की निवृत्ति हुई। नाना प्रकार का अन्न घास आदि उग आया और चारों तरफ हरियाली का ही साम्राज्य हो गया। सुरजनजी को धन्यवाद दिया।

सुरजनजी की कथनी और करनी में अन्तर नहीं था। कहा भी है- सत्य प्रतिष्ठायां क्रिया फल आश्रयत्वम्म9” जो मन वचन कर्म से सत्य में प्रतिष्ठित हो जाते हैं, ऐसे योगी द्वारा की जाने वाली सम्पूर्ण क्रियाएँ फ लवती होती हैं। जाम्भोजी के बताये हुए नियमों पर चलकर सुरजनजी ने सतगुरु की कृपा से सिद्धि को प्राप्त हुए थे। सुरजनजी ने जोधपुर नरेश से अपने राज्य में जीवरक्षा एवं वृक्षों की रक्षा करने का पट्टा लिखवाया था। सुरजनजी वहीं जोधपुर के गाँवों में ही विचरण करने लगे थे। इस बार चतुर्मासा सुरजनजी ने रामड़ावास में ही करने का विचार किया। वहीं रामड़ावास से पूर्व एक तालाब पर झोंपड़ी बनाकर के रहे लगे थे। उस समय उनके पास सवारी के लिए बैलगाड़ी थी। सुरजनजी के बैल स्वेच्छा से जंगल में घास चरते थे। उन्हें कोई नहीं रोकता था। उसी समय ही कापरड़े में पशु मेला लगा था। सुरजनजी ने अपने मोटे तकड़े बैल भी कापरड़े भेज दिये थे। वहाँ पर कोई प्रतियोगिता में सम्मिलित होना था। वहीं पर जोधपुर नरेश के मंत्री दुर्गादास ने सुरजनजी के बैल देखे और उन्हें अच्छे लगे। तब सेवक से छीनकर अपने पास मंगवा लिये। जो अच्छा धन होता है, वह तो राजा का ही होता है। दुर्गादास ने कहाः सुरजनजी की सिद्धि एक बार और देखेंगे। जब जोधपुर में एक छन्द गाकर वर्षा करवायी थी, किन्तु इसका क्या प्रमाण है कि वह वर्षा सुरजनजी ने ही करवायी थी। हो सकता है स्वतः ही हो गयी हो। एक बार यहाँ उन्हें अवश्य ही बुलाना है। इसी बहाने दर्शन लाभ भी होगा ही। उस सेवक से कहा- तुम जाओ अपने सिद्धिवान गुरु को यहाँ बुला लाओ, तभी बैल वापिस मिलेंगे। ऐसी वार्ता सुनकर सेवक वापिस रामड़ावास खाली हाथ लौट आया और दुर्गादास की करतूत सुनाई। सुरजनजी ने दूसरा रथ जोड़ा और कापरड़ै जाकर चबूतरे पर रथ खोला। उसी समय सुरजनजी को आया देखकर दुर्गादास ने हाथ जोड़ा और सादर लाकर आसन पर बिठाया। उसी समय एक चारण कहने लगा- हे महाराज! एक बात बतलाओ? जब इस शरीर को छोड़कर जीव हंस अन्यत्र गमन करता है, तो वह किस पर सवारी करता है? इस समय आप तो रथ पर सवार होकर आये हैं। किन्तु जीव की अंतिम सवारी क्या होगी? सुरजनजी ने एक कवित कहा- मन राज वेहिरयो, उध दोय रे अधर। जड़ी मेख धीरज, पावे देसा सधर। दान मान ज्यूं रथ, कब सवारथ केवटी। सहज शील संतोष, लाज चावड़े लपेटी। खांच सीध बल बिरला, कोउ जमी गहण मांवे ही। तेतीस कोड़ दहै आगलो, कहो रथ दीठो कहीं। दुर्गादास कहने लगा- रथ भारी चालै नहीं, खांचै कहो कुण आज। अहरी रथ सुणिये नही, थेई कह्यो महाराज। सुरजनजी ने बतलायासिंवर खंचियौ वे छुट्यो, वैणासर दूजै पहैर। दधीच हाड़ बाढ़ दीधै, विदिया गुर। मोरधुज मुकंध कंध, दैना के पूगे करण कंध मंडियो। आण मलह्यो कलिजुगे कु किया, भीत कव स्वार्थी रूंखा। जु गाडी बूड़ रही,जुग जुग अवचरै देखे रथ खेवै दई। खांचण वाले बहु भये, जुग जुग बहु प्रकार। जो रथ कूं नित खांचही, ताका सुणो विचार। पांच करोड़ प्रहलाद, नगा छलियो निरमल। सात करोड़ हरचदं, नव कूंता सुतन कुल। खरा कोट खट् दूणा, जीव जपै काल जाती। पांच सात नव कोड़ बाहरा भार पड़यो बहुभांति। सुरदेव धुर हुव स्वार्थी, खैवे राज गिरी किसन। तिणवार शाख सुरजन कै, तूं बाग मेल मोटा विसन। दोहाः ज्ञान सुण्यो प्रसन्न भयै, दुर्गादास सुन ज्ञान।

कछु अस्तुति करत है, जोरत जान जुग पान। इस प्रकार से दुर्गादास हाकिम को परचाया और अपने बैल छुड़वाकर वापिस रामड़ावास चले आये। सुरजनजी ने अनेकों कविताएँ, साखी, छन्द, कथाएँ आदि की रचना की थी। जिनमें प्रमुखतः साखियाँ, गीत, हरजस, दोहा, कवित, कथा चेतन, कथा चिंतामणी, कथा धर्मचरी, कथा हरिगुण, कथा औतार की, कथा परिसिंध, ज्ञान महात्म्य, ज्ञान तिलक, कथा गजमोख, कथा उखापुराण, भोगल पुराण, रामरासौ इत्यादि रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। सुरजनजी उच्चकोटि के साहित्यकार कवि तो थे ही साथ ही साथ धर्म प्रचारक, गायक एवं कथावाचक भी थे। जाम्भोलाव माहात्म्य कथा सुरजनजी ने मेले के अवसर पर आगन्तुक तीर्थ यात्रियों को सुनाई थी। यह कथा गद्य एवं पद्य दोनों में वर्णित है। जिसका सारांश पीछे लिख चुके हैं। सुरजनजी परलोक गमन विक्रम सम्वत् 1748 में जाम्बोलाव पर ही हुआ था। उनके पंचभौतिक शरीर को भींयासर गाँव में लाकर समाधिस्थ किया गया था। अब भी वहाँ पर लाल पत्थर का चबूतरा बना हुआ है। उनके दिव्य जीवन की गाथा कह रहा है।