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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह65 / 156

हरजस साखी राग सुहब 65

अब चलिये जारे म्हारा पंथियां, पंथड़ै मत लाय बार

कवि: आलम जी

कवि परिचय — आलम जी

आलमजी का जन्म सं. 1530-1610 में अनुमानित है। ये हजुरी कवि थे। जम्भसार में आलमजी की कथा विस्तार से वर्णित की है। इन्होनें अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की है। तथा गायन विद्या में बड़े ही निपुण थे। इनके द्वारा रचित 8 साखियां एवं 12 हरजस प्राप्त है। प्रथम जुमलै की साखी इनकी यह प्रचलित है।

अब चलिये जारे म्हारा पंथियां, पंथड़ै मत लाय बार । सनेसो म्हारो श्री रंग नै, कहियो जाय अबार ।१।

हे धर्म मार्ग के पथिक ! अब तुम्हें सतपंथ मिल गया है, इस पर चलने में देर मत करें। हमारे श्री रंगजी का संदेशा भक्तों को जाकर अति शीघ्र ही सुनाओ ।१।

पंथी दोय सुलखणां, सकल कला चंद सूर । ऐह पटंतर देह नै, हरि नैड़ा बसै की दूर ।२।

संसार में दो सुलक्षणों वाले पथिक सूर्य और चन्द्रमा है जो सदा ही अपने पथ पर चलते हुए अपनी सम्पूर्ण कलाओं से अपने स्वामी को संदेश दे रहे है। हरि चाहे नजदीक बसता हो चाहे दूर ये सूर्य और चन्द्रमा ही शरीर धारी पटु संदेश वाहक हरि के सेवक है ।२।

कोई बतावो हरि आप तो, सांई हमारो पांथलियां । आरती बूठा मेह ज्यों, पूसै मन रलिया ।३।

हमारा सुपथिक तो वही है जो हरि के आने का संदेशा हमें बतला दें। उस समय हमारी प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही नहीं रहता जिस प्रकार से वर्षा की प्रतीक्षा करने वाले प्यासे लोगों के लिये वर्षा का आगमन हो जाता है तो आनन्द का आर-पार नहीं रहता ।३।

निरधनियां धन बाल्हमो, आरती आरती याह । यो हरि हम को बाल्हमो, ज्यूं चंद कमोदनि याह ।४।

निर्धनी गरीब को जिस प्रकार से धन प्यारा होता है। वियोग में दुखी व्यक्ति के लिये प्रिय मिलन सुखदायक होता है तथा जिस प्रकार से कुमोदनी कमलनी चन्द्रमा को देखकर प्रफुलित हो जाती है ठीक उसी प्रकार से हरि का मिलन हमें अति प्रिय तथा आल्हाद जनक है ।४।

जां देशां फल ना घटे, आवै श्याम दिसाह । जीऊ तो प्यारो मिलै, पछम रो पातिशाह ।५।

उस देश में रहने से कोई हानि नहीं है जिस देश में श्याम के दर्शन सुलभ हो सके उस देश में रहकर जीवन यापन करेंगे तो परम प्रिय का मिलन होगा। इसलिये इस पश्चिम देश मरूभूमि में रहना युक्त ही है ।५।

सेत दीप ऐराक खण्ड, बसै पछम रै देश । सो जन पग पाहल लेऊ, ल्यावै बहु सन्देश ।६।

यह देश ही नहीं श्वेत द्वीप, इराक खण्ड आदि पश्चिम देशों में भी हमारे श्याम सुन्दर श्री जाम्भेश्वर जी भ्रमण करते है। जो भी व्यक्ति उनकी शरण ग्रहण करके चरणामृत पाहल लेते है वे ही आकर हमें संदेश दे रहे है ।६।

दुल दुल घोड़ी साखती, आयो श्याम नरेश । त्रिलोका रो पेखणों, सुरनर सकल नरेश ।७।

स्वयं श्याम श्री कृष्ण ही इस बार धर्म नियम रूपी घोड़े पर सवार होकर तथा ज्ञान रूपी खड़ग लेकर आये है यहां आकर तीनों लोकों को देख रहे है अर्थात् ईश्वर सर्वज्ञ है जो तीनों लोकों को हाथ में रखे हुए आंवले की तरह देख रहे है। ऐसे दिव्य शरीर धारी जो देव मानव का मिला जुला रूप नरेश है ।७।

आलम जोति झिग मिगै, मेघाडंबर छाति । कोड़ी तेतीसां रो पेखणो, परसां निकलंक पाति ।८।

आलमजी कहते है कि परमात्मा की महिमा दिव्य है। ऊपर मेघ सदृश हरि दिव्य कंकेहड़ी का वृक्ष है और नीचे विराजमान स्वयं देवजी ज्योति स्वरूप होनें से झिगमिग हो रही है मानों आकाश में बिजली चमक रही है। ऐसे तेतीस करोड़ देवताओं के दृष्टा श्री गुरुदेव के दर्शन करें जो निष्कलंक तथा अति पवित्र है ।८।