अब चलो रे लालजी, मधकर नहि छै रहण को जोग । जासूं तेरो रीझबो, ओह बिराणों लोग ।१।
यहां पर साखी में कवि ने अपने ही जीवन को मधुकर भंवरा कहा है। और अपने जीव रूपी भंवरे को समझाते हुए कहते है कि हे मधुकर ! अब तो यहां से चलो, यहां रहने योग्य यह देश नहीं है तथा समय भी आ चुका है। यहां से आगे अपने घर पहुंचेगा तभी तेरी तृप्ति हो सकेगी यहां तो सभी पराये हो चुके है ।१।
कूड़ भरोसो कुटुम्ब को, कांची तूं न कमाय । जब जम की फांसी पड़े, काहूं तै सरै न काय ।२।
अपने कुटुम्ब परिवार के लिये झूठ कपट का सहारा लेकर पाप कमाई न करें जब यमदूत गले में फांसी डालकर ले जायेंगे तो तुम्हें छुड़ाने वाला कोई नहीं होगा ।२।
जहां जम पहरा दिया, मूरखां पकड़ वैसाय । कूवे केरे कुम्भ ज्यूं, गल बंध्यो आवै जाय ।३।
वहां ले जाकर यम के दूत पहरा देंगे मूरख को पकड़ करके बैठा देंगे सभी प्रकार की आजादी छीन जायेगी जिस प्रकार से घड़े के मूंह में रस्सी बांधकर कूवे में लटकाकर जल निकालते है तब बार-बार अन्दर जाना बाहर आना लगा रहता है उसी प्रकार से इस जीवात्मा को भी बार-बार जन्म-मरण का नारकीय दुख दिया जायेगा ।३।
लाल सुरंगी बाड़िया, सुफल फली फलियां । जिनके बीच निपनीयां, अति अल बेलड़ियां ।४।
हे भंवरा ! यहां सूखे देश में क्या कर रहा है, यहां से आगे कदम रखेगा तो लाल सुरंग वाली अनेक फूलों की बगीचियां है उन बागों में अच्छे फल फूल एवं फलियां पुष्प खिले हुए है। तथा उन्हीं बागों के बीच में अनेकों नयी कोपल वाली बैलें लगी हुई है ।४।
पान फल फूल सुगन्धियां, एह गुण बेलड़ियां । चल मधुकर उन देसड़े, मन माने रलियां ।५।
वहां उन बेलों पर पत्र पुष्प फल बड़े ही सुगन्धि वाले लगे हुए है सभी लताऐं गुणों वाली है। हे मधुकर ! उस देश में चलो और आनन्द मनाओ ।५।
इण कुमलाण पोह पसारी, बैठो देखे मांहि । सत सुकरत पोह पसारयो, कुंवल कुंवल विगसाहि ।६।
इन मुरझाये हुए फूलों में क्या रखा है यहां का तो ऐसा ही नियम है कि जो पुष्पित होगा वह अति शीघ्र ही कुम्हलानें का मार्ग पकड़ लेता है। यहां पर बैठ गया तो फिर मुरझाये हुए फूलों के मध्य बैठा ही रह जायेगा। इसलिये सत्य सुकर्म करके आगे जाने का मार्ग पकड़ वहां पर खिले हुए अनेक कमल के फूल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे है। जो सदा ही खिले हुए रहते है ।६।
लाल सुरंग गोरियां, सजण लियो उर लाय । विसन भगत मन भावना, भंवर रहया रंग लाय ।७।
आगे स्वर्ग लोक में तो अनेक अप्सराऐं देवगण सुन्दर सौम्य वेश में आपके स्वागत के लिये तैयार खड़े है, जाते ही हृदय से लगा लेते है, वहां पर विष्णु भक्त भी बहुत ही प्यारे है वहीं पर भंवरा आनन्द से खुशी मनाओ ।७।
सहज मण्डल जित धमकही, भाजै भरम भीलियां । अमी कचोला वै पीवै, भाव सूं फल फलियां ।८।
सहज में ही दसवें द्वार की अनहद नाद एवं ज्योति वहां प्रगट हो जाती है। बिजली का चमत्कार एवं नाद ध्वनि की गर्जना स्पष्ट सुनायी एवं दिखाई देनें लगती है। ऐसी स्थिति में साक्षात्कार हो जाने पर भ्रम एवं भेदभाव रूपी कालुष्यता मिट जाती है। वहां पर अमृत के प्याले लोग पीते है। गर्जना के बाद अमृत वर्षा होती है। इसलिये यह फल तो शुद्धभाव से ही फलीभूत होता है ।८।
केल करे काम केदला, कंवल वइन विगसाय । अनहद रिमझिम करै, भंवर भगत भणकाय ।९।
वहां पर इच्छाओं का समुदाय भी पूर्ण हो जाता है। उस पूर्णता की पराकाष्ठा में आनन्द से क्रीड़ा करते है अर्थात् इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। जब सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है तभी मुख कमल विकसित हो पाता है। अनहद नाद ध्वनि का श्रवण तथा अमृत वर्षा की रिमझिम होती है। वहीं पर भंवरा भी अपनी गुंजन प्रगट करता हुआ खुशी प्रगट करता है ।९।
होद सरोवर तट छल्यो, हंस करै रे किलोल । चल मधकर उण देसड़े, भाजे मन री भोल ।१०।
वहीं पर होद तथा सरोवर पूर्णतया भरे हुए है और हंस उनमें मोती चुगते है, किलोल करते है। हे मधुकर ! उस देश में चलो, जहां मन की सम्पूर्ण भ्रान्तियां मिट जाती है ।१०।
मधुकर अब संभल तूं, सुकरत पांखड़ियां । सोई दर्शन म्हारै श्याम को, दीसै आंखड़ियां ।११।
हे मधुकर ! अब तूं संभल जा और अपनी सुकर्म रूपी आंखों को अच्छी प्रकार से विकसित कर, तुझे अपने श्याम के दर्शन इन्हीं आंखों से करना है इसलिये प्रयत्नशील हो जा ।११।
मधुकर अब सांभल्य तूं, काट चल्या जम फंद । आपणै प्यारा कै कारणै, ज्यों मिल करां आंणद ।१२।
हे मधुकर ! अब तूं संभल जा यम दूतों के फंद यानि मोहमाया को काटकर आगे चले यही सभी कुछ अपने प्यारे स्वामी के लिये करना होगा यहां पर पहुंचने पर दुखों से छुटकारा मिलेगा तथा आनन्द की प्राप्ति हो सकेगी ।१२।
चल मधु कर वहां देसड़े, जहां अपणो नहीं कोय । जिण खंड सूर नहीं ऊगवै, मूवां न सुणियो कोय ।१३।
हे मधुकर ! उस देश में चलो जहां पर अपना कोई नहीं है अर्थात् जहां पर अहंभाव, मेरा तेरा आदि मोहमाया नहीं है। वह ऐसा अखंड लोक है जहां सूर्य अस्त एवं उदय नहीं होता है, वहां तो परमात्मा की स्वयं ज्योति का ही प्रकाश है। और न ही वहां कभी मृत्यु ही आती है ।१३।
अच इमृत अति नाद रस, मन मधुकर होय सुरंग । उड आलम मधुकर भंवर, मिल्यो गुरु जम्भ अचंभ ।१४।
अति पवित्र नित्य अमृत तो परमात्मा का नाम ही है वह रसीला भी है। जिसे लेकर के स्मरण करके मन रूपी भंवरा सुरंग आनन्दित हो जाता है। आलमजी कहते है कि हे भंवरा ! अब तो यहां से उडकर आगे बढ़, तुझे तो सतगुरुदेव जाम्भोजी मिले है जो कि साक्षात् अचंभा ही है इसलिये आगे बढ ।१४।