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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह67 / 156

साखी छन्दां की (विणजारिया) -67

पहलै पहरै रैणि का विणजारियां, तै जलम लियो संसार वै

कवि: रैदास (रविदास) धतरवाल

कवि परिचय — रैदास (रविदास) धतरवाल

जन्म वि. सं. 1530-1600 के मध्य अनुमानित है। ये गृहस्थ बिश्नोई जाम्भोजी के शिष्य थे। सत्संग सुनने और सुनाने के प्रेमी थे। यत्र-तत्र भ्रमणशील भी थे। इनके द्वारा रचित तीन हरजस एवं एक साखी है। इनकी यह प्रसिद्ध साखी विणजारियां दी जा रही है। इस साखी से ही इनका आचार-विचार एवं कवित्व का पता चलता है।

पहलै पहरै रैणि का विणजारियां, तै जलम लियो संसार वै । वाचा चूको आपणी विणजारिया, तेरी बालक बुद्धि गंवार वै । बालक बुद्धि गंवार न चेत्यो, चूको माया जाल वै । अब पीछे क्या होय पछिताया, जल पहिले न बांधी पालवै । बीस बरस को भयो अयांणों, थंभ न सक्यो भार वै । जन रविदास कहै विणजारा, तैं जलम लियो संसार वै ।१।

मानव यहां संसार में व्यापार करने के लिये आया है। इसलिये यहां पर कवि ने व्यापारी विणजारा शब्द से संबोधन किया है तथा यदि सचेत न हो सका तो समझो उसके लिये रात्रि ही है जिस प्रकार से रात्रि के प्रहर व्यतीत होते है। उसी प्रकार आयु भी व्यतीत होती जा रही है। इसलिये यहां पर कवि ने रैणिका शब्द का प्रयोग किया है। बालक का जन्म होता है तो वह जीवन का प्रथम प्रहर है हे व्यापारी ! तुमनें प्रथम अवस्था में तो प्रभु का स्मरण किया नहीं क्योंकि तेरी बालक बुद्धि थी वहीं से ही तुमनें अपने किये हुए वचनों को तोड़ना प्रारम्भ कर दिया। क्योंकि ना समझ होनें से माया जाल में भटक गया, अब वृद्धावस्था में यदि सचेत होकर पछतावा कर रहा है तो उससे क्या होगा ? जल की बाढ़ आनें से पूर्व ही उसे रोकने के लिये पाल-बंधा बांधना चाहिये था जब बाल्यावस्था से युवावस्था में पहुंच गया था बीस वर्ष का युवा हो गया था तब तो मस्त हो गया अपना भार भी नहीं संभाल सका, अपना पराया का कुछ भी नहीं रहा रविदास जी कहते है कि तुमनें संसार में जन्म कुछ कमाई करने के लिये ही लिया है। इस बात को कभी भूलना नहीं चाहिये था ।१।

दूजै पहरै रैणिका विणजारियां, तूं निरखत चाल्यो छांव वै । बंदे साहिब न जाण्यो विणजारिया, तूं लेय न सक्यो नांव वै । नांव न लीयो ओगण कीयो, इह जीवण के ताण वै । अपणी परायी गिणी न काई, बांधी अबल कुबाण वै । साहिब लेखो लेसी तूं छलि देसी, भीड़ पड़े तुझे तांहवै । जन रविदास कहै विणजारा, तै जलम लियो संसार वै ।२।

अब आगे दूसरे प्रहर में युवावस्था प्रारम्भ हुई तब भी तुमनें सच्चा व्यापार नहीं किया किन्तु अहंकार के वशीभूत होकर अपनी ही छाया को देखते हुए मरोड़ में चलता रहा था हे व्यापारी ! न तो तुमनें साहिब परमात्मा को ही पहचाना और न ही तुमनें परमात्मा का स्मरण ही किया परमात्मा का नाम तो लिया नहीं परन्तु अवगुण-पाप कर्म ही किये थे और वे भी अपनी जवानी के बलबूते पर ही किये थे। न तो तुमनें अपनी वस्तु को समझा और न ही परायी को परायी समझा प्रथम दर्जे की बुराई अपने में तुमनें डाल ली। उस समय तुमनें यह नहीं सोचा कि साहिब हिसाब पूछेंगे तब छला जायेगा, तेरे उपर भी कभी आपत्ति आयेगी तब उसका जवाब देना कठिन हो जायेगा रविदास कहते है कि रे जीव ! तूं अब युवावस्था में तो अपनी छाया देखता हुआ चल रहा है ।२।

तीजै पहरै रैणिका विणजारियां, तेरा ढीला पड़या प्राण वै । काया इवांणी क्या करै विणजारियां, गढ़ भीतर बसै अजाण वै । वसै अजाण काया गढ़ भीतर, अहलो जलम गमायो वै । अब की बेर न सुकरत कियो, बहोड़ी न यह तन पायबै । छीनी देह काया कुमलानी, तूटण लागा तेरा ताण वै । जन रविदास कहै विणजारा, तेरा ढीला पड़या प्राण वै ।३।

आगे जीव का तीसरा प्रहर प्रारम्भ हो जाता है वह भी रात्रि की तरह ही है। तीसरे प्रहर में जवानी चली जाती है तो शरीर का अंग प्रत्यंग ढीला पड़ जाता है काया विचारी क्या करें। इसे तो समय अनुसार बदलना ही है। परन्तु इस काया में बसने वाला जीव व्यर्थ में ही इस मानव शरीर से हाथ धो बैठता है अबकी बार यदि सुक्रत नहीं किया तो दुबारा तो यह शरीर नहीं मिलेगा वृद्ध हो जाने पर काया क्षीण हो जाती है, तेरी शक्ति दिनों दिन समाप्त होती जाती है। रविदास कहते है कि हे विणजारा तेरे प्राण दिनोंदिन ढीले पड़ते जा रहे है ।३।

चौथे पहरै रैणिका विणजारिया, तेरी थरहर कांपी देह वै । आयो हंकारो श्याम को विणजारियां, छोड़ी पुराणी थेह वै । छोड़ी पुराणी हुयो अयांणों, बालद लाद सवेरियां । जम के आये पकड़ चलाये, बारी पूगी तेरियां । चाल्या अकेला पंथ दुहेला, कांसूं करै सनेह वै । जन रविदास कहै विणजारा, तेरी थरहर कांपी देह वै ।४।

अब आगे अन्तिम चौथा प्रहर आ गया तब तेरी देह थर-थर कांपने लगी एक दिन हंकारो-मृत्यु आयेगी और इस जीव को पकड़कर ले जायेगी और यह शरीर प्राचीन देह की भांति पड़ी रहेगी। पुरानी देह को छोड़कर अकेला ही खाली हाथ चला जायेगा। जिस प्रकार से व्यापारी अपनी वस्तु का व्यापार करके चला जाता है। यम के दूत आ जाते है वे पकड़ कर ले जाते है क्योंकि अबकी बार बारी आयी हुई थी कौन बचा पाता यहां से अकेला ही चल पड़ता है आगे मार्ग भी बहुत ही कठिन दुखदायी होता है, उसे पार करना ही पड़ता है। अब आगे प्रेम भी तो किससे करें। रविदासजी कहते है कि इस प्रकार से व्यापारी की काया कांपने लगती है कुछ भी व्यापार नहीं कर पाता ।४।