कवि परिचय — भींवराज
जन्म 1530-1600 मध्य अनुमानित है। इनका दूसरा नाम भींया है। इनको ही जाम्भेश्वर जी ने सोवनी नगरी दिखाई थी। चितौड़ की कथा में भीमराज का नाम आता है। ये काशी में पढ़े हुए शास्त्रज्ञ थे। गुरु जाम्भोजी के शरण में आकर बिश्नोई पंथ में सम्मिलित हुए थे। इनके द्वारा रचित दो साखियां उपलब्ध है।
रे विणजारा न करि पसारा, तांडै हुई तियारी । बारां काज समाहण मनवां, नायक नर निरहारी । नायक नर निरहारी मनवां, खालक खेवण हारा । किरिया ले किरियाणो नाणो, पारि उतर विणजारा ।१।
रे व्यापारी ! अब अधिक पसारा-फैलाव मत कर तुझे तो अति शीघ्र ही आगे जाना है। बिल्कुल तैयारियां चल रही है बारह करोड़ जीवों को पार करने के लिये स्वयं विष्णु ही नर का रूप धारण करके निरहारी बनकर आये है। ये सभी के स्वामी है। इसलिये हे मन ! तूं क्यों संसार के विषयों में उलझ रहा है। संसार के अधिपति इस बार स्वयं ही नौका के खेने वाले केवट बनकर आये है। हे मानव ! तूं गुरु के समीप जाकर उनके द्वारा बतायी हुई क्रियाएं धारण कर। जिससे पुनः संसार सागर में आना ही न पड़े, अब पार उतरने का समय आ गया है ।१।
रे व्योपारी कर दिल इकतारी, वाचा वीर संभाली । ओदरि कोल कियो मन मेरा, उदग्यो दसबंध टाली । दसबंध टाली खरतर चाली, निपज्यो नर निरहारी । इणि विध लाभ हुवै मन मेरा, पारि उतरि व्योपारी ।२।
हे व्यापारी ! अपने मन को हृदय में स्थिर आत्मा परमात्मा से एकाकार कर दे। गुरु के वचनों को स्मरण करके धारण कर। जब तूं गर्भवास में था तो कवल किये थे कि मैं बाहर आकर शुभ कर्म करूंगा किन्तु यहां आकर अपनी कमाई का दसवां भाग देने में क्यों आनाकानी करता है यदि दसवां भाग दान करेगा तो तेरी खेती अधिक ही निपजेगी, स्वयं भगवान तेरे सहायक होंगे इस प्रकार से तेरे को अधिक लाभ ही होगा ऐसा लाभ लेकर संसार सागर से पार उतर जा ।२।
रे मन चंगा तजी कुसंगा, साध संगति मिल चाली । अजर जरो भवसागर तिरियो, जिभिया झूठ जे पाली । तन का तसकर बस कर मनवां, नित उठ न्हाई गंगा । आंण देव अभिमान परिहरि, तो जाणी मन चंगा ।३।
हे मन तूं तो बहुत ही अच्छा है परन्तु कुसंगति के कारण बुराई ग्रहण कर लेता है इसलिये कुसंगति को त्याग दें। साधु संतों के साथ मिलजुल कर चलना काम क्रोध को जला दो और भवसागर से पार उतर जाओ जीभ्या से कभी झूठ न बोलो इस शरीर में यह मन चोरी करने वाला चोर है इस चंचल चोर का ध्यान रखो यह कहीं आपकी कमाई चुरा तो नहीं रहा है। नित्य प्रति जागृत होकर ज्ञान गंगा में स्नान करो। आन देवता भूत प्रेतादिक का परित्याग कर दो। केवल एक विष्णु परमात्मा का ही स्मरण करो। तभी मानों कि मन अच्छा है ।३।
रे मसवासी जप अविनासी, ध्यान धणी सूं लाई । ओलखी अलख अमर गढ़ चालो, जुरा न झंपे कांई । जुरा न झंपे जन की गम नाही, सुरां सुरपति निवासी । भीवराज विसन के शरणै, मन हो गयो मेवासी ।४।
हे श्मशान में निवास करने वाले मानव ! क्योंकि मृत्यु का कुछ भी पता नहीं है। हम सभी लोग यही मानकर चलो कि श्मशान में पहुंच चुके है इसलिये हे मेवासी ! तूं अविनाशी परमात्मा का जप कर। उस अलख परमात्मा को पहचान करके परमात्मा के परम धाम अलख गढ़ में जाना है वहां पर बुढ़ापा आदि रोग दोष नहीं आते है। न तो वहां बुढ़ापा आता और न ही किसी प्रकार का मानसिक दुख ही आ पाता है। क्योंकि वहां तो देवाधिदेव विष्णु का निवास है भीमराजजी कहते है कि मैं तो विष्णु के शरण हूं। मेरा मन तो अब मेवासी वैरागी बन चुका है ।४।