कवि परिचय — आलम जी
आलमजी का जन्म सं. 1530-1610 में अनुमानित है। ये हजुरी कवि थे। जम्भसार में आलमजी की कथा विस्तार से वर्णित की है। इन्होनें अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की है। तथा गायन विद्या में बड़े ही निपुण थे। इनके द्वारा रचित 8 साखियां एवं 12 हरजस प्राप्त है। प्रथम जुमलै की साखी इनकी यह प्रचलित है।
पतवो लिख दो जी हो बांभणां, कह ऊधो समझाय । तुम बिन दूभर जीहो देसड़ो, हरि विन रहयो न जाय ।१।
भगवान श्री कृष्ण गोकुल मथुरा छोड़कर द्वारिका में जाकर स्वर्णमयी नगरी बनाकर वहीं रहने लगे थे। कृष्ण के परम भक्त उद्धवजी वियोग में अति दुखी हुए और ब्राह्मण को बुलाकर श्री कृष्ण को पत्र लिखवाते हुए समझा रहे है कि तुम्हें कृष्ण को पत्र में क्या क्या लिखना है वही आलम जी अपने पतवे में वर्णन करते है। इस प्रकार का पत्र उद्धवजी ने कृष्ण को लिखा था जिसका भावार्थ यहां पर दिया जा रहा है। हे ब्राह्मण ! श्री कृष्ण जी को पत्र में यह लिख दे कि तुम्हारे बिना तो इस देश में जीवन जीना दूभर हो गया है। हरि के बिना तो अब एक क्षण भी नहीं रहा जाता ।१।
कह ऊधोजन गोविन्द कब मिले, वृन्दावन रो राव । रंग रो विनइयो नंदलाल, जांणोजी श्री रंग मिलाव ।२।
उद्धवजी कहते है कि श्री कृष्ण से पत्र द्वारा यह पूछा जाये कि आप वृन्दावन का राजा गोपालक कृष्ण फिर कब मिलेंगे। लीला के नायक नन्दलाल सदा ही अपने रंग में दूसरों को रंजित करने वाले थे। मैं जानता हूं आपकी लीला को एवं आप भी तो हमें जानते है फिर उस मूरली, ध्वनि, नृत्य, गायन के रंग से हमें वंचित क्यों किया ।२।
ऊधो माधोजी सूं यो कह, ऐसी कछु हमें न सुहाय । बिठला बहुदिन जीहो लावियां, रहयो द्वारिका छाय ।३।
उद्धवजी माधव कृष्ण से कह रहे है कि इस प्रकार का खेल खेलकर अकस्मात हमें छोड़कर चले जाना यह हमें तो अच्छा नहीं लगता। वे बीते हुए दिन भी क्या वापिस लौटकर आयेंगे? स्वयं आप यहां आ जाओ तो वे दिन भी लौटकर आ सकते है। किन्तु आप तो द्वारिका में ही छा गये है उन लोगों के ही पूजनीय हो गये है ।३।
मोहनी मूरत जीहो माधवां, चतुर्भुज बसियो म्हारे चित । देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, सगुण श्याम सूं प्रीत ।४।
माधव श्री कृष्ण की मोहनी मूरती हमारे चित में बसी हुई है। वही चतुर्भुज भगवान श्री विष्णु की मूर्ति है। उसे हम हृदय से बाहर कैसे निकाल सकते है। हे भाई देखो ! वही निर्गुण निराकार विष्णु ही नंद का बालक बनकर सगुण श्याम रूप में आये है ।४।
सो संभर सो मथुरा द्वारिका, सब रंग जम्भ अचंभ । कामण गारो छै जीहो कान्हवो, पियो म्हारो पारब्रह्म ।५।
वही वृन्दावन है तथा वही द्वारिका, मथुरा है। इन तीनों में कुछ भी अन्तर नहीं है तथा जो रास लीला वहां वृन्दावन मथुरा में दिखाई वही तो इस समय जाम्भेश्वरजी के रूप में, अचम्भे के रूप में यहां दिखा रहे है। क्योंकि हमारे कृष्ण बड़े ही लीला धारी है। वे न जाने कब क्या करेंगे। यही चरित्र दिखाने के लिये यहां सम्भराथल पर आ गये है। हमारे पति परमेश्वर तो पारब्रह्म ही है ।५।
देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, चंचल चतुर सुजान । मेरो मन लागो हरिजी श्याम सूं, जाको हर मुरली सूं ध्यान ।६।
हे भाई ! देखो नन्द का बालक श्री कृष्ण बड़ा ही चंचल और चतुर सुजान भी है। मेरा मन तो हरिजी से लगा हुआ है और उनका मन मुरली से लगा हुआ है। जिसका मैं ध्यान करता हूं वह नटखट मेरी तरफ न देखकर मुरली की तरफ ध्यान लगा रहा है ।६।
हरिजी रा मीठा मीठा बोलणां, ओ छै म्हारे जीवड़ै रो मूल । तन मन भक्तां सेती रम रहयो, भेद न जाणै मूरखो थूल ।७।
हरिजी श्री कृष्ण मीठे-मीठे बोल बोलते है मैं उनकी बोली पर न्यौछावर होता हूं। यही तो मेरे जीवन का मूल आधार है। वह कृष्ण तो तन मन से अपने भक्तों के साथ रमण कर रहे है। परन्तु यह मेरा मन बुद्धि तो मूर्ख स्थूल है भेद नहीं जान पाते है मैं कैसे इनको मनाऊं ।७।
गोकुल केरो जीहो ग्वालियो, ओ छै म्हारे जीवड़े रो आधार । सोला सहस्र गोपियां में, रहयो छै बालमियो ब्रह्मचार ।८।
मेलो कीजै मन रा माधवा, तेरा जन कोड कराय । बां मिलियां हम जीवै, विन मिलियां मर जाय ।९।
गोकुल में गाय चराने वाले ग्वाल बाल श्री कृष्ण ही मेरे जीवन के आधार है। सोलह हजार गोपियों में रमण करने वाले कृष्ण स्वयं बाल ब्रह्मचारी है कहा भी है कन्हड़ बालो जती ब्रह्मचारी है। हे माधव ! एक बार आकर अवश्य ही दर्शन दीजिये। हम तेरे अपने प्रियजन है हम तुम्हारे से प्रेम करते है। आप मिलोगे तो हम जीवन धारण कर सकेंगे और आप नहीं मिलेंगे तो वे सभी आप के प्रेमी मर जायेंगे ।९।
बाल सनेही म्हारो साहिबो, अति ही पियारो पीव । हरि मुख देखण के कारणै, तलफत छै म्हारो जीव ।१०।
हमारा तो बाल सनेही साहब है, अत्यधिक प्रिय है क्योंकि हमारा स्वामी भी है। ऐसे प्रेम से भरे हुए हरि का मुख देखने के लिये हमारा जीव तड़प रहा है ।१०।
देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, पियो मेरो परम दयाल । आलम प्रभुजी रो लाडलो, गिरधर लाल गंवाल ।११।
हे भाई देखो ! हमारा परम प्रिय कृष्ण बड़ा ही दयालु है। आलमजी कहते है कि उद्धव जैसे प्रिय भक्त भगवान के लाडले है। ऐसे कृष्ण लाल गोपाल को संदेशा पत्र द्वारा भिजवाया था। जिसको आलमजी ने छन्दोबद्ध किया है ।११।